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महाराणा प्रताप सिंह जी की जीवनी

Story Highlights

  • नाम: प्रताप सिंह
  • जन्म: ९ मई १५४०
  • मृत्यु: २९ जनवरी १५९७ (५६ साल)
  • पत्नी: महारानी अजबदे
  • वंश: सिसोदिया पिता: उदय सिंह ॥ 
  • माता: महारानी जैवन्ता बाई
  • धर्म: हिन्दु राज
  • समय: २४ साल ३२७ दिन
  • जानिए कब और कैसे और कहाँ हुआ महाराणा प्रताप का जन्म
  • प्रताप का महाराणा के रूप में संकल्प
  • मेवाड की हल्दीघाटी में हुआ हल्दीघटी का युद्ध
  • हल्दीघाटी का युद्ध 1
  • हल्दीघाटी का युद्ध-2
  • महाराणा प्रताप के सभी 17 पुत्र के नाम
  • महाराणा प्रताप के सभी 11 पत्नियों के नाम
  • जानिए महाराणा प्रताप के बारे में कुछ जाने-अनजाने किस्से
  • महाराणा प्रताप और चेतक के विषय में कुछ बातें

महाराणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की द्वादशी 9 मई 1540 ई में राणा उदय सिंह के निवास कुम्भल गढ़ दुर्ग में माता महारानी जयवन्ता कुँवर के गर्भ से हुआ था। महारणा प्रताप सिंह ने 11 शादियाँ की थी। उनके कुल 19 संतान थी। इस वर्ष  महाराणा प्रताप जयंती रविवार 28 मई 2017 को मनाई जाएगी।

उन्होंने कहा था–“हमारा देश भारतवर्ष जैसा है वैसा रहेगा, हमारा हिन्दू धर्म जैसा है वैसा रहेगा पर जल्द ही एक ऐसा समय आएगा जब इन मुगलों का नामों निशान इस भारत की पवित्र मिटटी से मिट जाएगी- महाराणा प्रताप“

महाराणा प्रताप बचपन से ही साहसी, वीर, स्वाभिमानी तथा स्वतंत्रता के पुजारी थे। सन 1572 ई में उन्होंने मेवाड़ की गद्दी संभाली। परन्तु इस समय ही उन्हें हल्दी घाटी युद्ध का समाना करना पड़ा। अभूतपूर्व संकटो का सामना करने के पश्चात भी महाराणा प्रताप ने धैर्य तथा साहस का साथ नही छोड़ा। हल्दी घाटी के युद्ध में उन्होंने अपने पराक्रम को दिखाया वह भारतीय इतिहास में असामान्य है। महाराणा प्रताप उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। उनकी वीरता और दृढ़ संकल्प के कारण उनका नाम  इतिहास के पन्नों में अमर है। उन्होंने कई वर्षों तक मुग़ल सम्राट अकबर के साथ संगर्ष किया और उन्हें कई बार युद्ध मैं भी हराया। वे बचपन से ही शूरवीर, निडर, स्वाभिमानी और स्वतंत्रता प्रिय थे।स्वतंत्रता प्रेमी होने के कारण उन्होंने अकबर के अधीनता को पूरी तरीके से अस्वीकार कर दिया। यह देखते हुए अकबर नें कुल 4 बार अपने शांति दूतों को महाराणा प्रताप के पास भेजा। राजा अकबर के शांति दूतों के नाम थे जलाल खान कोरची, मानसिंह, भगवान दास और टोडरमल।
महाराणा प्रताप को स्वतंत्रता प्रिय था अतः उन्होंने अकबर की अधीनता को नही स्वीकारा। अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा लिया कि जब तक अपना राज्य मुक्त नही करवा लूंगा, तब तक राज्य सुख का भोग नही करूंगा। महाराणा प्रताप अरावली के जंगलो में भटकते रहे।हालांकि, महाराणा प्रताप मुगलो की विशाल सेना को पराजित नहीं कर पाए, परन्तु समस्त विश्व के समक्ष उन्होंने जो वीरता का आदर्श प्रस्तुत किया वह असाधारण एवम सम्मानीय है। इतिहास इस बात की साक्षी है कि यदि राजपूतो को भारीतय इतिहास में सम्मानपूर्ण स्थान मिला तो इसका श्रेय महाराणा प्रताप को जाता है।
महाराणा प्रताप जन्मभूमि की स्वतंत्रता के संघर्ष के प्रतिक है. वे एक कुशल राजनीतिज्ञ, आदर्श संगठनकर्ता और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तत्पर रहने वाले महान सेनानी थे. अपनी संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए उन्होंने वन वन भटकना तो स्वीकार किया मगर मुग़ल सम्राट अकबर के सामने अधीनता स्वीकार नहीं की. महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के ऐसे महानायक है, जिनकी अनन्य विशेषताओ पर भारतीय इतिहासकारों ही नहीं, पाश्चात्य लेखकों और कवियों को भी अपनी लेखनी चालायी है. प्रताप स्वदेश पर अभिमान करने वाले, स्वतंत्रता के पुजारी, दृढ़ प्रतिज्ञ और एक वीर क्षत्रिये थे. सम्राट अकबर ने अपना समस्त बुद्धिबल, धनबल और बाहुबल लगा दिया था, मगर प्रताप को झुका नहीं पाया था. प्रताप का प्रण था की बाप्पा रावल का वंशज, अपने गुरु, भगवान, और अपने माता-पिता को छोड़ कर किसी के आगे शीश नहीं झुकाएगा. प्रताप अपनी सारी जिंदगी अपने दृढ़ संकल्प पर अटल रहे, वे अकबर को ‘बादशाह’ कह कर सम्बोधित कर दे ऐसा असंभव माना जाता था, उनका मनना था की “अकबर एक तुर्क है और हमेशा एक तुर्क ही रहेगा, मुग़ल पहले हमारे साथ मित्रता का हाथ बढ़ाते है फिर अपनी बुरी दृष्टी हमारे घर की स्त्रियों पर डालते है”, और ये हम सभी भी जानते है की उनका सोचना बिलकुल सही है. महाराणा प्रताप ने अपनी जीवन में एक भविष्यवाणी की थी जो की बिलकुल ही सही हो गयी, वो ये था कि “ हमारा हिन्दू धर्म जैसा है वैसा ही रहेगा, हमारा भारतवर्ष देश जैसा है वैसा ही रहेगा, पर एक दिन ऐसा आएगा की हमारी इस पवित्र भूमि से मुगलों का नामोनिशान मिट जायेगा”. स्वतंत्रता की रक्षा की लिए विषम परिस्थितियों में भी प्रताप ने जो संघर्ष किया, उसकी राजकुलों में जन्मे लोगो के साथ तुलना और कल्पना भी नहीं की जा सकती है . मेवाड़ नरेश होते हुए भी महाराणा का अधिकांश जीवन वनों और पर्वतों में भटकते हुए व्यतीत हुआ, अपने अदम्य इच्छाशक्ति, अपूर्व शोर्य, और रण कौशल, से अंततः मेवाड़ को स्वाधीन करने में सफल हुए.
1572 ई में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की गद्दी संभाली थी।
उन्होंने अपने जीवन के अंत काल तक अपनी मातृभूमि को कलंकित और परतंत्र नही होने दिया। उन्होंने अपने शासन में मुगलो की सेना तथा मुगल सम्राट अकबर को लोहे के चने चबाने पर विवश कर दिया। महाराणा प्रताप आजीवन संघर्ष किया।
मुग़ल का सम्राज्य तो आज विलुप्त हो चूका है, किन्तु महाराणा प्रताप की वीरता आज भी आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कई विदेशी साहित्यकार तथा इतिहासकार ने उनके स्वाभिमान की प्रशंसा की है।

जानिए कब और कैसे और कहाँ हुआ महाराणा प्रताप का जन्म

सिसोदिया वंश के सूरज राणा प्रताप का जन्म 9 मई,सन 1540 (विक्रमी संवत 1597, जयेष्ट सुदी 3, रविवार) को अपनी ननिहाल पाली में हुआ था. उनके पिता राणा उदय सिंह एक महान योद्धा थे. महराणा उदय सिंह की जीवन रक्षा की कहानी पन्ना धाय से जुडी हुई है, उदय सिंह के पिता राणा रतन सिंह के मृत्यु के पश्चात उदय सिंह के बड़े भाई विक्रमादित्य ने राजगद्दी संभाली. विक्रमादित्य अभी थोड़े छोटे थे इसलिए उनकी देखरेख का जिम्मा बनवीर को दिया गया, लेकिन थोड़े ही दिन में बनवीर के मन में राजगद्दी हथियाने के इच्छा जागृत हो गयी. उसने कुछ सामंत को अपने में मिला लिया और जो सामंत उनके विरुद्ध गए उनकी हत्या कर दिया. उसके बाद उसने विक्रमादित्य को भी मार डाला, और फिर चल दिया मेवाड़ के एकलौते वरिश उदय सिंह की हत्या करने. उस समय उदय सिंह सो रहे थे और हाथ में नंगी तलवार लिए बनवीर उदय सिंह को मारने आ रहा था, अचानक से महल में हलचल पैदा हो गयी और ये समाचार पन्ना धाय तक भी पहुँच गयी, उस समय पन्ना धाय ने एक ऐसा बलिदान दिया जो की इतिहास में आज तक किसी ने न दिया होगा, उन्होंने उदय सिंह और अपने पुत्र में से उदय सिंह को चुना और अपने पुत्र को उदय सिंह के स्थान पर लिटा दिया, और उदय सिंह को फूलों की टोकरी में छिपा दिया, जब बनवीर ने पूछा की उदय सिंह कहाँ है, तो उसने अपने पुत्र को उदय सिंह बता दिया और बनवीर ने पन्ना धाय के सामने उसके पुत्र की हत्या कर दिया. पन्ना धाय ने उस फूलों की टोकरी के साथ कुम्भलगढ़ पहुँच गयी. कुम्भलगढ़ में आशा शाह देपुरा को कुंवर उदय सिंह को सौंपकर पन्ना धाय चित्तोड़ वापस चली आई, उस समय उदय सिंह की आयु केवल 15 वर्ष की थी. यहीं पर उदय सिंह ने शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फिर जयवंताबाई से शादी की. प्रताप सिंह इन दोनों के ही पुत्र थे. प्रताप का जन्म ही युद्ध के दौरान हुआ था, एक तरफ उदय सिंह अपनी मातृभूमि को वापस पाने के लिए बनवीर से युद्ध कर रहे थे और इसी शुभ क्षण में भगवान एकलिंग का अवतार लिए प्रताप सिंह धरती में पधारे. उनके जन्म के उत्सव में चार चाँद तब लग गए जब ये खबर आई की महाराणा उदय सिंह बलवीर को हरा वापस चित्तोड़ के किला पर अपना अध्यापत स्थापित कर चुके है, प्रताप के जन्म की उत्सव चित्तोडगढ के किला में ही बड़े धूम धाम से मनाया गया।
प्रताप के जन्म के तीन सौ साल पहले ही मुसलमान हमारी भारत माता पर अपना अधिकार जमा चुके थे पर जैसा की हम सब जानते है पूरा भारत कभी भी गुलाम नहीं रहा है उनमे से एक प्रदेश ऐसा भी था जो स्वतंत्रता की सांसे ले रहा था वो क्षेत्र था “राजपुताना”. राजपुताना भारत माता की एक ऐसा अंग था जहाँ के वीरों ने कभी भी आसानी से गुलामी का रास्ता नहीं चुना था, खासकर ये वीरता के पर्याय बाप्पा रावल के वंशज. ये वंश अपने मातृभूमि के लिए अपनी जान लगा देने वालों में से थे, और ये जाती बहुत ही विचित्र युद्ध कौशल से निपूर्ण थी, जिसका सामना करने से बड़े से बड़े सेना भी डरती थी. इस समय भारत की राजनीती व्यस्था में बहुत ही उथल पुथल हो रही थी, प्रताप के जन्म से पहले दिल्ली में मुहम्मद जल्लालुद्दीन अकबर के पिता हुमायूँ का राज था, जो की मुग़ल वंश से सम्बंधित था, उस समय एक और बड़ी ताकत हुमायूँ को बार बार चुनौती दे रहा था वो था अफगान का शेरशाह सूरी. शेरशाह शुरी ने हुमायूँ को सबसे पहले 25 जून 1539 को चौसा के युद्ध में पराजित किया और इसके बाद 17 मई 1540 में बिलग्राम या कन्नोज के युद्ध में बहुत ही बुरी तरह से पराजित कर आगरा और दिल्ली में अपना कब्ज़ा कर लिया. अभी प्रताप तीन साल के नहीं हुए थे की शेरशाह सूरी ने एक बहुत बड़ी सेना के साथ राजपूताने में आक्रमण कर दिया उसकी सेना ने कई इलाको को जीत लिया और कई घर और गाँव को तहस नहस कर दिया. उसके बाद शेरशाह सूरी ने चित्तोडगढ में आक्रमण किया उदय सिंह के पास उसकी सेना का आक्रमण का जवाब नहीं था उनके पास बहुत ही थोड़ी सेना थी इसलिए उदय सिंह ने युद्ध के बजाये कूटनीति का रास्ता चुना, उन्होंने शेरशाह सूरी के सामने अपने शस्त्र दाल दिया, उनके सारे सामंतों ने इसका विरोध किया पर उदय सिंह ने ये भरोसा दिलाया की वो समय आने पर अपना अधिकार वापस लेंगे. उन्होंने शेरशाह सूरी से संधि कर लिया जिसमे उन्हें आध मेवाड़ देना पड़ा, इसके कुछ दिन बाद ही शेरशाह शुरी की मृत्यु 22 मई 1945 को हो गयी, उस समय मेवाड़ में उदय सिंह और शेरशाह सूरी के सेनापति श्मशखान ही राज कर रहा था. राणा उदय सिंह ने तीन विवाह क्रमशः जयवंताबाई, सज्जाबाई, भटियानी धीरबाई जी से किया था. शक्ति सिंह और सागर सिंह सज्जाबाई के पुत्र थे और जगमाल धीरबाई के पुत्र थे. प्रताप बचपन से ही बहुत ही बहादुर और अपनी वीरता दिखाकर लोगो को अचंभित कर जाते थे, वे जितने वीर थे उतने ही स्वाभाव से सरल और सहज थे. वे बहुत ही साहसी और निडर थे. बच्चों के साथ खेल खेल में ही दल बना लेते थे और ढाल तलवार के साथ युद्ध करने का अभ्यास करते थे. अपने लड़ाकू तेवर और अस्त्र-शस्त्र सांचालन में निपुणता के कारण वे अपने मित्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए थे. उनमे नेतृत्व के गुण इसी अवस्था में जागृत होने लगे थे. प्रताप को गुरु आचार्य राग्वेंद्र का भरपूर साथ मिला उन्हें प्रताप की ताकत और सूज बूझ को सही दिशा प्रदान किया. प्रताप भी अपने गुरु से बहुत सारी शिक्षा प्राप्त की. गुरु राग्वेंद्र ने शक्ति सिंह, सागर सिंह और जगमाल को भी शिक्षा दी. एक बार गुरु ने उन चारों राजकुमारों को तालाब में से कमल का फूल लाने को कहा. गुरु की आज्ञा पाकर चारों राजकुमार तालाब में कूद गए और एक दुसरे के साथ पहले फूल लाने के लिए होड़ करने लगे, की अचानक बीच में ही जगमाल थक गए और डूबने लगे तब प्रताप आगे बढ़कर जगमाल की मदद किये तबतक इधर शक्ति सिंह कमल लेकर गुरूजी के पास पहुँच गए और कहने लगे मैंने सबसे पहले कमल का फूल लेके आया हूँ, गुरु जी बोले प्रताप तम्हारे आगे था पर वो अपने भाई को मदद करने के कारण पहले नहीं पहुँच सका, शक्ति सिंह का सारा हर्ष क्षण भर में ही गुम हो गया. अब गुरु जी ने कहा की अब मुझे देखना है की तुम में से सबसे अच्छा घुड़सवार कौन है ये घोड़े लो और उस टीले में जो सबसे पहले आएगा वो ही विजयी रहेगा. दौड़ शुरू होने से पहले ही जगमाल ने अपने हाथ खड़े कर लिए और कहा मैं नहीं जाऊंगा उस टीले तक मैं थक चूका हूँ, गुरु जी ने जगमाल के मुख में विलाशिता की भावना को परख लिया था इसलिए उन्होंने कहा की कोई बात नहीं जगमाल मेरे साथ ही रहेगा तुम लोग जाओ. प्रताप सबसे पहले उस टीले से लौट आये उसके बाद शक्ति सिंह और सागर सिंह सबसे आखिरी में आया. गुरु जी ने प्रताप की बहुत तारीफ की, इस पर शक्ति सिंह जलभुन गया. शक्ति सिंह भी प्रताप की तरह ही बहुत साहसी था पर प्रताप से तुलना होने पर वो हर बार हार जाता था जो की उसे पसंद नहीं था. एक बार जंगल में गुरु जी चारों राजकुमार को कुछ शिक्षा दे रहे थे की तभी एक बाघ ने शक्ति सिंह को पीछे से झपटने के लिए आगे बढ़ा, शक्ति सिंह डर से हिल भी न पाया था, गुरुवर कुछ कर पाते की प्रताप ने सामने रखा भाला बाघ के सीने में डाल दिया बाघ वही गिर पड़ा, तब शक्ति सिंह के जान में जान आई, शक्ति सिंह ने प्रताप का धन्यवाद किया और गुरु जी ने भी प्रताप की बहुत प्रसंशा की. इस तरह से प्रताप की शिक्षा पूरी हुई. राणा उदय सिंह जब भी प्रताप को देखते थे वो हर्ष उल्लास से भर जाते थे, राणा प्रताप को विश्वास था की उनके बाद मेवाड़ का भविष्य एक सुरक्षित हाथों में जाने वाला है. इसी सोच के साथ लगातार उदय सिंह गुप्त रूप से अपनी सेना को एक जुट करने में लग गए. लगभग 10 साल के लम्बे समय के बाद उदय सिंह ने अफगानों में आक्रमण करने का निर्णय लिया, वे अपने सभी राजकुमारों को किसी सुरक्षित स्थान में पहले पहुंचा देना चाहते थे पर प्रताप जो की अभी केवल 13 साल के ही थे किसी तरह उनको युद्ध की खबर हो गयी, वो इस युद्ध से कैसे अनछुए रह सकते है इसलिए अपने पिता के आज्ञा के बगैर उस युद्ध में कूद गए, थोड़े ही समय में युद्ध शुरू हो गया, और प्रताप इतनी कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा की चमक चारों ओर बिखेरने लगे थे, इस युद्ध में कई राजपूत सिपाहियों ने प्रताप का भरपूर साथ दिए, बहुत ही मुस्किल से किसी तरह इस युद्ध में राणा उदय सिंह विजयी रहे, जब उन्हें पता चला की प्रताप भी इस युद्ध में सम्मिलित थे उनकी आँखे आशुओं से नम हो गयी और उन्होंने प्रताप को गले लगा लिया. अब सम्पूर्ण मेवाड़ में उदय सिंह का राज था. इस तरह से प्रताप सिंह की खायाति पूरे राजपूताने में फैलने लगी, मेवाड़ की प्रजा प्रताप के स्वाभाव से अत्यंत प्रसन्न रहती. क्योंकि कभी कभी प्रताप तो उनकी मदद करने में इतने खो जाते थे की वे भूल जाते थे की वो एक राजकुमार है. और इस तरह प्रताप अपने वीरता की गाथा को बिखरते हुए बड़े होने लगे |

प्रताप का महाराणा के रूप में संकल्प

प्रताप के निर्वासन की खबर सुन कर पुरे मेवाड़ नगरी की प्रजा में आक्रोश से भर गयी, कई लोग प्रताप की गुणगान करते नही थक रहे थे। कुछ गाँव वाले अपने में बात कर रहे थे की प्रताप ही मेवाड़ के असली महाराणा है, उदय सिंह छोटी रानी भटियानी से ज्यादा प्यार करते थे इसलिए जगमाल को राजा बना दिया जो की दिन भर नशे में धुत रहता है। इसपर दुसरे गाँव वाले ने कहा की सही कहा उस दिन 6 मुग़ल सैनिक हमारी गाँव के एक लड़की के साथ दुष्कर्म कर रहे थे तभी प्रताप वहां पहुँच कर अकेले ही उन छः मुग़ल सैनिकों से भीड़ गए और उसका संहार कर उस लड़की की इज्जत को बचाया। इतना सुनते ही दुसरे व्यक्ति ने कहा की हाँ हाँ सही कह रहे हो एक दिन मेरी बैल गाडी खेत में कीचड़ में फंस गयी थी कितनी कोशिश के बाद भी वह नहीं निकला, प्रताप ने जैसे ही मुझे देखा वो एक राजकुमार होते हुए भी मेरी मदद के लिए कीचड़ में घुस आये, एक महराणा होने के सारे गुण प्रताप में मौजूद है, प्रताप ही हमारे महाराणा है और हम उनका निर्वासन कैसे देख सकते है, राजपूताने के कई राजा ने तो अकबर के सामने घुटने टेक दिये है एक प्रताप ही उसको चुनौती दे सकते है, वे हमारे स्वाधीनता के अंतिम आशा है और किसी भी हालत में उनका निर्वासन नहीं होने देंगे।

उदयपुर के कई सरदार जगमाल के इस फैसले से पहले से ही बौखलाए हुए थे, उनकी सलाह के बिन जगमाल ने इतनी बड़ी फैसला कैसे कर लिया था। प्रताप के मामा झालावाड़ नरेश इस फैसले से बहुत ज्यादा क्षुब्ध थे, मेवाड़ के कई सामंतों ने अपनी आक्रोश को उनके सामने व्यक्त किया। झालावाड के नरेश ने अपनी नेतृत्व सामंतों को प्रदान किया और यह निर्णय लिया गया की जगमाल को गद्दी से हटाया जायेगा और प्रताप को मेवाड़ का महाराणा बनाया जायेगा। इतना निर्णय लेकर वो महल की ओर जाने लगे, रास्ते में उन्हें मेवाड़ के गाँव के कई लोग मिले। सामंतों को आता देख सभी लोग ने चुप्पी साध ली, उसमे से एक व्यक्ति ने आगे बढ़ कर कहा की ये हमारे साथ क्या हो रहा है सरदार, हमारे साथ इतना बड़ा अन्याय क्यो हो रहा है ? जहाँ प्रताप को मेवाड़ का राणा होना था वहां एक विलासी बैठा मौज कर रहा है, और हमारे असली महाराणा को निर्वासन? सरदार उनका दुःख समझ रहे थे, इस पर चुण्डावत कृष्ण जो की सामंतों के सरदार थे आगे बढ़ के कहा की हम खुद ही मेवाड़ की राजनीती से विस्मित है और आप सब हमारा विश्वास करे की मेवाड़ के असली उत्तार्धिकारी को ही मेवाड़ का महाराणा बनाया जायेगा ये हम सब का वचन है। इतना बात सामंतों और लोगो के बीच हो ही रहा था की साधारण वेशभूषा में प्रताप अपने घोड़े में कुछ सामन के साथ नजर आये, सभी आश्चर्य से प्रताप को देखते रह गए, सभी को समझते ये देर न लगी की प्रताप निर्वासन के फैसले के अनुसार मेवाड़ को छोड़ कर जा रहे है। सभी लोगों ने प्रताप का रास्ता रोक लिया और फिर चुण्डावत कृष्ण जी ने आगे बढ़कर कहा की “रुक जाइये प्रताप आप मेवाड़ की सीमा को नहीं लांघेगे, मेवाड़ की समस्त जनता आपका प्रतीक्षा कर रहे है”। प्रताप ने अपने घोड़े की लगाम को खींचते हुए कहा की लेकिन चुण्डावत जी जगमाल मेवाड़ का राजा है और उसने मुझे निर्वासन का आदेश दिया है, इसपर चुण्डावत गरजने लगे और कहने लगे की “जगमाल निरा मुर्ख है, उसे राज काज की समझ कहाँ है और ये बात आपको और हम सब को भली भांति अच्छी तरह से पता है। आप ही मेवाड़ के राणा है इसलिए आपको ही मेवाड़ के राजगद्दी में बैठना होगा। उदयपुर के साथ साथ सारे मेवाड़ की जनता और सामंतों की ओर से सन्देश लेकर मैं आपके पास आया हूँ। क्या आपको अपने पिता से किया वायदा याद नहीं चित्तोडगढ अभी भी मुगलों के हाथ में है और आपको ही उसे मुगलों से आजाद करवाना है। इसपर प्रताप ने बड़े ही विनम्रता से कहा को जगमाल मेरा छोटा भाई है उसके विरुद्ध मैं तलवार नहीं उठाऊंगा, मुझे अपने भाई के साथ युद्ध कर राज काज भोगने की कोई इच्छा नहीं है। चुण्डावत निकट आते हुए कहा की आपको वापस चलना ही होगा अन्यथा मेवाड़ आपके बिना अनाथ हो जायेगा, मेवाड़ की जनता ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। उनका धैर्य का बाण टूट जायेगा। प्रताप ने कहा की क्या एक एक भाई को भाई के विरुद्ध विद्रोह करना शोभा देगा, विद्रोह तब होगा जब आप नहीं चलोगे, मेवाड़ की जनता अपना संतुलन खो बैठेगी और विद्रोही सरदार अपने म्यान से तलवार निकाल आएगी, और पूरा का पूरा मेवाड़ गृह युद्ध की चपेट में आ जायेगा। इस तरह काफी देर तक बहस करने के बाद प्रताप को एहसास हो गया की चुण्डावत सही कह रहे है, मेवाड़ को उनकी आवश्यकता है और उन्हें मेवाड़ की उन्हें। वे अपनी जन्मभूमि, मातृभूमि से दूर कैसे जा सकते थे,उन्हें दूर जाना भी नहीं चाहिए, राज्य का अधिकार उन्हें सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि उन्हें स्वाधीनता की रक्षा करने के लिए उन्हें करना ही पड़ेगा, यह एक चुनौती है और इससे भागना अब मात्र एक पलायन होगा। प्रताप और सारे सामंतों ने अपना घोडा उदयपुर की ओर मोड़ लिया। इधर जगमाल प्रताप के निर्वासन से निश्चिन्त हो गया था की उसका एकमात्र कांटा को उसने निकाल फेंका है, वह अब और ज्यादा विलाशभोगी हो गया था, उसके चापलूस सामंत अब राजकोष के धन में सेंध लगाने लगे थे। अगली ही सुबह जगमाल ने अपने सामने चुण्डावत कृष्ण के साथ प्रताप को देखा तो उसे अपने आँखों में विश्वास न हुआ, रात भर पि हुई मदिरा की नशा एक पल में ही ओझल हो गयी। जगमाल सिंहासन में बैठा था सभी चापलूस सरदार अपनी अपनी ओट लिए हुए था। इतने में चुण्डावत ने अपनी गर्जना भरे स्वर में कहा की “जगमाल छोड़ दो ये सिंहासन” जगमाल ने कहा –“चुण्डावत सरदार आप होश में तो है”
“हाँ कुमार” अब हम सब होश में आ गए है। उस दिन हम सब वास्तव में होश में नहीं थे जबब महाराणा उदय सिंह ने तुम्हे राणा बनाया था। तुम इसके तनिक भी योग्य नहीं हो। हमने तुम्हे राणा के रूप में अवश्य ही स्वीकार किया है पर तुम इसके जरा भी योग्य नहीं हो तुमने इस सिंहासन का अपमान किया है। जगमाल क्रोधित हो गया और अपने सैनिकों को आदेश दिया की पकड़ लिया जाए इस चुण्डावत सरदार को। सभी सैनिकों के साथ साथ सभी सरदारों ने भी अपने आँखों को झुका लिया, उनके हाथ तलवार की मुठ में अवश्य थे पर चुण्डावत के विरुद्ध जाना उनके वश में न था, किसी ने भी उस समय अपनी तलवार अपने म्यान से निकालने की चेष्टा तक न की, जगमाल ने सभी सामंतों के तरफ नजर दौड़ाई सभी शांत थे। पुरे दरबार में सन्नाटा छा गया था। जगमाल झट से अपनी तलवार निकाला और प्रताप की ओर देखते हुए बोला अपनी तलवार निकालो प्रताप अभी फैसला हो जायेगा। प्रताप का हाथ झट से तलवार पर गया पर छू कर वापस आ गया, वो चुण्डावत को देखने लगे, जैसे की वो कहना चाहते हो की उन्हें सिंहासन तो चाहिए लेकिन इस तरह नहीं। चुण्डावत समझ गए थे की प्रताप क्या कहना चाहते है इसलिए उन्होंने झट से अपनी तलवार निकलते हुए कहा की सभी लोग अपनी तलवार निकाल कर इसे बता दो की हम सब प्रताप है, चुन्दावत की आदेश सुनते ही सभी ने अपने तलवार को म्यान से बाहर निकाल लिया और जगमाल को घेर लिया। इतने देखते ही जगमाल का सारा नशा पल भर में उड़ गया। सभी सरदारों ने एक स्वर में चिल्लाने लगे की हम सब प्रताप के साथ है। इसे देख कर जगमाल चुण्डावत सरदार कृष्ण के प्रति प्रतिशोध की भावना से धधक उठा वो नंगी तलवार लिए चुण्डावत की ओर लपके और उनमे वार किया, चुण्डावत सरदार पहले से तैयार खड़े थे उन्होंने एक वार में ही जगमाल के तलवार की दो टुकड़े कर डाले। इतना देख कर दो सैनिकों ने जगमाल को पकड़ लिया। उसी समय प्रताप को पुरे विधि अनुसार प्रताप को राणा घोषित किया गया। चुण्डावत ने स्वयं अपने हाथों से उनके मस्तक में टीका चढ़ाया और राजश्री छत्र पहनाया। और उनका अभिनन्दन करते हुए कहा की अब आप ही हमारे आन, बान और शान हो। मेवाड़ ही नहीं पूरा भारतवर्ष आपके शोर्य की वीर गाथा कहे। अपने बाहुबल से एक नया इतिहास लिखो, ऐसी हमारी कमाना है।
प्रताप बहुत गंभीर थे, गंभीर चेहरे में हलकी सी मुस्स्कान को बड़ी मुस्किल से बाहर आने दे रहे थे। फिर कुछ शब्द उभर कर आये, मेवाड़ के महाराणा की जय, हमारे महाराणा प्रताप की जय। सारे दरबार में महाराणा प्रताप की जय जयकार होने लगी। यह जयजयकार इतनी ऊँची थी की सारा महल इस ध्वनि से गूँज उठा था, सभी सामंतों में ख़ुशी की लहर से छाई हुई थी, जयजयकार की आवाज सुनकर जगमाल सिहर उठा था। मेवाड़ की सेना को और जनता को जब ये समाचार मिला की प्रताप अब महराणा बन चुके है तब उनमे ख़ुशी का ठिकाना न रहा, यूँ लगा मानो अनाथ बच्चे को उसका खोया हुआ माता-पिता मिल गए हो। सारी मेवाड़ की धरती महाराणा प्रताप की जय, मेवाड़नाथ की जय से कांप उठी। तभी एक सैनिक ने सलीके से सजाई हुई बप्पा रावल की तलवार को लिए दरबार में उपस्थित हुआ। चुण्डावत ने उस तलवार को उठाई और महाराणा प्रताप के हनथो में दे दी। सारा मेवाड़ में मानो आज कोई उत्सव मनाया जा रहा हो ऐसा प्रतीत होने लगा था। इस तरह से चुण्डावत सरदार ने तलवार देने की रस्म पूरी की। महाराणा प्रताप को तलवार देने के बाद चुण्डावत सरदार ने कहा की –“हे क्षत्रिये कुल दिवाकर ये हमरे पूर्वज बाप्पा रावल की तलवार है जिसे हम सदियों से चितोड़ की देवी मानते है आज वही चितौड़ मुगलों के कब्जे में है। मुगलों ने जब चितौड़ में कब्ज़ा किया था तब वहां के हर एक मंदिर और प्रतिमाओं की टुकड़े टुकड़े कर दिए, वहां के पंडितों और विद्वानों को अपमानित किया, राजपूतों पर मुगलों की अत्याचार की गवाह है ये तलवार, तब से समस्त मेवाड़ मुगलों से पप्रतिशोध के ज्वाला में जल रहा है, चितौड़ की पराजय से मेवाड का मस्तक झुक गया है, मैं ये तलवार इसी आशा के साथ सौंपा हूँ की आप चितौड़ के अपमान का बदला लेंगे और फिर से चितौड़ को मेवाड़ का भाग बनायेगे। ये आपके मस्तक में चढ़ा मुकुट आपके शोभा और वैभव नहीं है अपितु आपके लिए एक चुनौती है, की आप हमारा खोया हुआ स्वाभिमान और स्वाधीनता वापस लायेंगे। प्रजा जनों की रक्षा और विकास की चुनौती भी आप ही की जिम्मेदारी होगी। इसतरह तालियों की गडगड़ाहट के बिच चुण्डावत सरदार कृष्ण का भाषण समाप्त हुआ। फिर महाराणा प्रताप उठे उन्होंने तालियों के बीच सबका अभिवादन किया और फिर अपना तलवार को खींचते हुए कहा की मैं राणा प्रताप बप्पा रावल की इस पूजन्य तलवार की सौगंध खा कर कहता हूँ की इस तलवार को सौंपकर चुण्डावत जी नें जो दायित्व मुझे सौंपा है उसे मैं अवश्य पूरा करूँगा। अपने स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दूंगा। मैं कभी किसी शत्रू के सामने अपना मस्तक नहीं झुकाऊँगा। अपने शत्रु से चितौड़गढ़ को वापस लूँगा और चितौड़ पतन के समय हम पर हुए अत्याचारों का बदला लेना मेरा परम ध्येय रहेगा। इसके बाद प्रताप मौन हो गए और फिर इसके बाद प्रताप ने वो संकल्प लिया जो की प्रताप के जीवन का मुख्य भाग था और जिसके लिए वो हमेशा हमेशा के लिए प्रचलित रहेंगे उन्होंने प्रण लिया की:- ”माँ भवानी और भगवान् एकलिंग (शंकर) की सौगंध खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ , कि जब तक मेवाड़ का चप्पा-चप्पा भूमि को इन विदेशियों से स्वतंत्र नहीं करा लूँगा, चैन से नहीं बैठूँगा। जब तक मेवाड़ कि पुण्यभूमि पर एक भी स्वतंत्रता का शत्रु रहेगा, तब तक झोपडी में रहूँगा, जमीं पर सोऊंगा, पत्तलों में रुखा-सुखा खाना खाऊंगा, किसी भी प्रकार का राजसी सुख नहीं भोगूँगा, सोने-चांदी के बर्तन और आरामदायक बिस्तर की तरफ कभी आँख उठाकर भी नहीं देखूंगा ! बोलिए, क्या आप सब लोग मेरे साथ कष्ट और संघर्ष का जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार है ?” “हम सब अपने महाराणा के एक इशारे पर अपना तन-मन, सब कुछ न्योछावर कर देंगे !” चारों तरफ से सुनाई दिया।“द्रढ़ इरादे वाले लोगों और राष्ट्रों को कोई बड़ी से बड़ी शक्ति भी पराधीन नहीं रख सकती ।” राजगुरु ने कहा — “इस पवित्र ललकार को सुनने के लिए मेरे कान जाने कब से व्याकुल हो रहे थे, प्रताप!””शत्रुओं द्वारा मात्रभूमि के किये गए अपमान का बदला गिन-गिनकर तलवार की नोक से लिए जायेगा । चप्पा चप्पा भूमि की रक्षा के लिए यदि खून की नदियाँ भी बहानी पड़ी, तो मेरे मुख से कभी उफ़ तक न निकलेगा । आप लोगों ने मुझे जो स्नेह और विश्वास प्रदान किया है, प्रताप दम में दम रहते उस पर रत्ती-भर भी आंच न आने देगा ! जय स्वदेश! जय मात्रभूमि ! जय मेवाड़ ! ” उसके बाद सभी उपस्थित सरदारों, सामंतों और दरबारियों ने मात्रभूमि की स्वतंत्रता और रक्षा के प्रति निष्ठावान रहने की शपथ ली । अपने नए महाराणा प्रताप का अभिवादन किया । प्रताप को राणा बनते देख पूरा राजपुताना दो खेमों में बंट गया था, एक ओर वो थे जिन्होंने अपना स्वाभिमान अकबर को बेच दिया था और दुसरे वो थे जिनके पास स्वाभिमान तो था पर सागर जैसे सेना और ताकतवर मुग़ल सामराज्य से लोहा लेने की ताकत न थी इसलिए वैसे राजाओं ने प्रताप के राणा बनने में ख़ुशी जाहिर की ।

मेवाड की हल्दीघाटी में हुआ हल्दीघटी का युद्ध

हल्दीघाटी का युद्ध भारत के इतिहास की एक मुख्य कड़ी है। यह युद्ध 18 जून 1576 को लगभग 4 घंटों के लिए हुआ जिसमे मेवाड और मुगलों में घमासान युद्ध हुआ था। महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व एक मात्र मुस्लिम सरदार हाकिम खान सूरी ने किया और मुग़ल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था। इस युद्ध में कुल 20000 महारण प्रताप के राजपूतों का सामना अकबर की कुल 80000 मुग़ल सेना के साथ हुआ था जो की एक अद्वितीय बात है।कुछ इतिहासकार कुछ ऐसा मानते हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ परन्तु अगर देखें तो महाराणा प्रताप की ही विजय हुए है। अपनी छोटी सेना को छोटा ना समझ कर अपने परिश्रम और दृढ़ संकल्प से महाराणा प्रताप की सेना नें अकबर की विशाल सेना के छक्के छुटा दिए और उनको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।
कई मुश्किलों/संकटों का सामना करने के बाद भी महारण प्रताप ने हार नहीं माना और अपने पराक्रम को दर्शाया इसी कारण वश आज उनका नाम इतहास के पन्नो पर चमक रहा है।

हल्दीघाटी का युद्ध 1

Maharana Pratap history in Hindi 5000 चुने हुए सैनिकों को लेकर मानसिंह व शक्तिसिंह शहजादे सलीम के साथ 3 अप्रैल, 1576 ई. को मंडलगढ़ जा पहुंचे. शहजादा सलीम इस सेना का सेनापति था, परन्तु आक्रमण का पूरा सेहरा मानसिंह के सर पर था. सब जानते थे की ये आक्रमण मानसिंह के पहल में ही हो रहा है. इस सेना में मुग़ल सेना की चुनी हुई हस्तियाँ मानसिंह के साथ में थी- गाजी खां, बादक्शी,ल ख्वाजा गियासुद्दीन, आसफ खां आदि को साथ लेकर मानसिंह ने दो माह तक मांडलगढ़ में मुग़ल सेना का इन्तेजार किया. महाराणा प्रताप को जब यह पता लगा की शक्तिसिंह को साथ लेकर मानसिंह मेवाड़ पर आक्रमण के लिए चल पड़ा है, और मंडलगढ़ में रूककर एक बड़ी मुग़ल सेना का इन्तेजार कर रहा है, तो महाराणा प्रताप ने उसे मंडलगढ़ में ही दबोचने का मन बना लिया, परन्तु अपने विश्वसनीय सलाहकार रामशाह तोमर की सलाह पर राणा प्रताप ने इरादा बदल दिया. रणनीति बने गयी की मुगलों को पहल करने देनी चाहिए और उस पर कुम्भलगढ़ की पहाड़ियों से ही जवाबी हमला किया जाए. अपनी फ़ौज की घेरा को मजबूत करने के लिए महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ से गोगुंडा पहुंचे. उनके साथ उस समय झालामान,झाला बीदा, डोडिया भीम, चुण्डावत किशन सिंह, रामदास राठोड, रामशाह तोमर, भामाशाह व् हाकिम खां सूर आदि चुने हुए व्यक्ति थे. जून के महीने में बरसात के आरम्भ में मुगल सेना ने मेवाड़ के नै राजधानी कुम्भलगढ़ के चरों ओर फैली पर्वतीय श्रृंखलाओं को घेर लिया. कुम्भलगढ़ प्रताप का सुविशाल किला था, जो की प्रताप की समस्त गतिविधियों का केंद्र था. इसी जगह प्रताप का जन्म हुआ था और कहा जाता है की विश्व में चीन की दिवार के बाद सबसे लम्बी दीवारों में से एक है. मानसिंह तथा मुग़ल शहजादा ने सारी जानकारी प्राप्त कर यह रणनीति तैयार की कि प्रताप को चारो ओर से घेर कर उस तक रसद पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाए. कुम्भलगढ़ के बुर्ज से महाराणा प्रताप ने जब मुग़ल सेना और उसकी घेराबंदी का निरिक्षण किया तब वे समझ गए की राजपूतों के अग्निपरीक्षा के दिन आ गए है. जहाँ भी नजर जाते थी बरसाती बादलों के तरह फैले मुग़ल सेना के तम्बू नजर आ रहे थे. मुग़ल सेना का घेरा बहुत मजबूत था, इतना मजबूत था की उससे नजर बचाकर परिंदा भी कुम्भलगढ़ मे प्रवेश नहीं कर सकता था. मुग़ल सेना में अधिक संख्या भीलों और नौसीखिए की थी. तीर कमान, बरछी, भाले, और तलवारे ही उनके हथियार थे. मुग़ल सेना के पास तोपें थे और अचूक निशाना लगाने वाले युद्ध पारंगत तोपची थे. महाराणा प्रताप के पास एक भी टॉप नहीं थी पर उनका एक एक सैनिक अपना सर में कफ़न बंधकर निकला था, जान लेने और जान देने का जूनून प्रताप के हर सैनिक में था. मुग़ल सेना के निरिक्षण के बाद महाराणा प्रताप अपने प्रमुख सलाहकारों एवं सरदारों के साथ अपनी सेना के सम्मुख पहुंचे. और सैनिकों को सम्भोधित करते हुए कहा –“जान लेने और जान देने का उत्सव अब हमारे सिर में है, मुग़ल सेना काले घटाओं की तरह कुमलमेर की पहाड़ियों पर छा गयी है, एक लाख से अधिक मुग़ल सेना ने हमें इस आश को लेकर घेरा है की हम संख्या में कम है और विस्तार देख कर ही डर जायेंगे, परन्तु शायद वो भूल गए है की सूर्य की एक मात्र किरण अत्यंत अन्धकार को विदीर्ण करने के लिए काफी होती है. मुग़ल सेना का सेनापति भावी मुग़ल सम्राट शहजादा सलीम कर रहा है, और उसका मार्गदर्शन कर रहे है देश के दो गद्दार राजपूत मानसिंह और शक्तिसिंह. मानसिंह वो गद्दार है जिसने अपनी बहन को शहजादे सलीम से ब्याह दी और शक्तिसिंह इस मेवाड़ धरती का गद्दार है जो की दुर्भाग्यवश मेरा भाई है, उसे भाई कहते हुए मुझे लज्जा आती है, परन्तु यह सच है की आज उसने राजपूती शान का बट्टा लगाया है, वह मुग़ल सेना के साथ मिलकर अपनी ही धरती और अपने ही भाई में चढ़ाई करने आया है. शक्ति सिंह इस जगह से भली भांति परिचित है. वह घर का भेदी है, अगर आज वो उनके साथ नहीं होता तो हमारे बहुत से रहस्य शत्रुपक्ष को पता नहीं लग पाते, और उस स्थिति का लाभ उठा कर हम शत्रु पक्ष को अनेक तरह से पटखनी दे सकते थे. परन्तु ये हमारे मेवाड़ धरती का दुर्भाग्य है की उसी का एक बेटा विदेशी मुग़ल सेना को लेकर उसी की मनंग उजाड़ने आया है.परन्तु साथियों विजय सिर्फ हमारी होगी क्योंकि ये हमारी स्वाधीनता बचाने की लड़ाई है, और हम अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना खून बहाना भलीं भांति जानते है.हम गिन गिन कर शत्रुओं का सिर काटेंगे. हमारे एक एक सैनिकों को पच्चीस पच्चीस मुग़ल सैनिकों का सर काटना है. हमारा हौसला बुलंद हो, हमारी भुजाओं की ताकत के सामने, हमारे, युद्ध कौशल, व् देशभक्ति के जूनून के सामने एक भी शत्रु सैनिक यहाँ से जीवित बचकर नहीं जा पायेगा. हम एक एक को कुमाल्मेर की पहाड़ियों में दफ़न कर देंगे. आओ प्रतिज्ञा करें की हम एक एक सैनिकों को मुगलों के पच्चीस पच्चीस सैनिकों के सिर काटने है, हमारे जीते जी शत्रु हमारी मातृभूमि पर कदम नहीं रख सकेगा, इसके लिए चाहे हमें कोई भी कीमत चुकाने पड़े. हम इन मुग़ल सेना को बता देंगे की हम भले ही मर जाये पर युद्ध भूमि से पिछे हटना हम राजपूतों के खून में नहीं है. इसप्रकार से महाराणा प्रताप की जोरदार आवाज से सैनिकों में प्रोत्साहन भरा जाने लगा, उनके इस बातों को सुनकर उनके सैनिकों का मनोबल आसमान की उचाईयों में पहुंचा दिया. सबने जोरदार अपने तलवारे खिंची और और बुलंद आवाज में घोषणा की कि अब ये तलवार शत्रु का रक्त पी कर ही म्यान में वापस जाएगी. दोनों ओर की सेना तैयार हो गयी परन्तु हमला नहीं हुआ, महाराणा प्रताप ने मन बना लिया था की पहले मुग़ल सेना पहल करेगी और उसके हमला करते ही हमारी सेना उनपर टूट पड़ेगी परंतू मान सिंह ने यह युद्धनिति तैयार की थी की मुग़ल सेना सीधे हमला कर पहाड़ियों के बीच में नहीं फसेंगी, वो उनको बस कुछ दिन घेरे रखेंगे ताकि उनका रसद उनतक ना पहुँच सके और महाराणा प्रताप की सेना पहाड़ियों से उतरकर खुले मैदान में आ सके जिससे उन्हें हराना ज्यादा आसान हो जाये. शहजादा इस पक्ष में था की आगे बढ़कर उनपर आक्रमण किया जाये ताकि युद्ध जल्दी ख़त्म हो सके.

हल्दीघाटी का युद्ध-2

Maharana Pratap history in Hindi शहजादे सलीम मुग़ल सेना की एक टुकड़ी आगे बढ़कर महाराणा प्रताप में आक्रमण करने का निर्देश दे दिया, मानसिंह ने उसे समझाने का प्रयत्न किया परन्तु वो नहीं माना. मुगलसेना ने जैसे ही हल्दीघाटी के संकरे घाटी में प्रवेश की राणा प्रताप की सेना ने एक एक कर कई मुग़ल सेना को मौत के घाट उतार दिया क्योंकि हल्दीघाटी की प्राकृतिक बनावट कुछ इस प्रकार से थी की केवल एक बार में एक सैनिक अपने घोड़े के साथ आगे बढ़ सकती थी, इस संरचना का लाभ उठा कर राणा प्रताप के सैनिकों ने मुग़ल सेना के कई सैनिकों को मार डाला, उस समय ये देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो, ये युद्ध केवल राणा प्रताप के हाथ में ही है, परन्तु तुरंत ही सलीम ने अपने सेना को पीछे हटने का संकेत दे दिया. अब उन्हें ये समझ नहीं आ रहा था की प्रताप तक पहुँचने का कौन सा मार्ग लिया जाए, ऐसे समय में शक्तिसिंह निकलकर आया और उसने शहजादे सलीम के सामने हल्दीघाटी में सेना को प्रवेश कराने की जिम्मेदारी ली. शक्तिसिंह के मार्गदर्शन में मुग़ल सेना हल्दीघाटी के मार्ग से पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश करने लगी. महाराणा प्रताप ने जब ये देखा की मुग़ल सेना हल्दी घाटी के पीछे वाले रास्ते से आगे बढ़ रही है तो उन्हें ये समझते देर ना लगी की किसने उन्हें ये रास्ता सुझाया होगा. अब राणा प्रताप ने आगे बढ़कर हल्दीघाटी में ही मुगल सेना को दबोचने की रणनीति बनाई. राणा का आदेश पाते ही राजपूत नंगी तलवार लिए, मुग़ल सेना पर टूट पड़े. भीलो का समूह जहर बुझे तलवार से मुग़ल सेना का संहार करने लगी. पहले ही हमले में राणा प्रताप ने मुग़ल सेना के छक्के छुड़ा दिए, देखते ही देखते मुग़ल सेना की लाशे बिछनी लगी. मुग़ल सेना में, मानसिंह सेना की बीचोबीच था. सैयद बरहा दाहिनी ओर, बाई ओर गाजी खां बादक्शी था, जग्गनाथ कछावा तथा गयासुद्दीन आसफ खां इरावल में थे. आगे के भाग में चुना-ए-हरावल नाम का विख्यात मुग़ल सैनिक था जो की कुशल लड़ाकू माना जाता था. राणा प्रताप के सेना में बीच में स्वयं राणा प्रताप और दाहिनी ओर रामशाह तोमर तथा बाई ओर रामदास राठोड था. राणा प्रताप ने मुग़ल सेना पर अपनी सारी शक्ति झोंक दी थी, अतिरिक्त सेना के रूप में केवल पोंजा भील था, जो अपने साथियों के साथ पहाड़ियों में छिपा रहा.. शहजादा सलीम अपने हाथी पर स्वर था. जब उसने देखा की महाराणा प्रताप अपने तलवार से मुग़ल सैनिकों को गाजर मुल्ली की तरह कटता जा रहा है और मुग़ल सेना के पैर उखड़ने लगे है, तो उसने तोंपे चलने का आदेश दे दिया. तोंपो के गोले जब आग उगलने लगे तो राणा प्रताप के सेना के पास मुग़ल सेना के तोपों का कोइ जवाब ना था. उनकी ढालें, तलवारे, बरछे और भाले उनके तोपों के आगे बौने पड़ने लगे. अचानक से लड़ाई का रुख ही बदल गया और राजपूतों की लाशे बिछनी लगी. महाराणा ने राजपूत सैनकों की एक टुकड़ी को आदेश दिया की आगे बढ़कर उनकी तोपें छीन ली जाए, सैंकड़ो सैनिक अपनी जान हथेली में रख कर उन तोंपो को छिनने के लिए आगे बढ़ गए, परन्तु इसके विपरीत तोप के गोले उनगे शरीर की धज्जियाँ उड़ाने लगे. ये देख कर महाराणा को बहुत दुःख हुआ, परन्तु यह एक कडवी सच्चाई थी, तोंपो की मार को परवाह किये बगैर राणा प्रताप की सेना दुगुनी उत्साह के साथ मुग़ल सेना पर टूट पड़ी. स्वयं राणा प्रताप घाटी से निकलकर गाजी खां की सेना में टूट पड़े, जो की बहुत देर से घाटी के द्वार में कहर ढा रही थी, राणा प्रताप ने गाजी खां के सेना की परखच्चे उडा दिए, इस प्रकार मुग़ल सेना और राणा प्रताप के बीच दो दिन तक युद्ध हुआ, परन्तु कोई भी नतीजा निकल कर सामने नहीं आया. दोनों ओर से सैनिकों की लाशे बिछ गयी थी, पूरा युद्ध क्षेत्र लाशो से पट गया था. मुग़ल सेना के तोंपो से निकले गोलों ने राजपूत सेना में कहर ढाया था. संख्या में चार गुनी होते हुए भी मुग़ल सेना राजपूत सेना के सामने टिक नहीं पा रही थी. युद्ध के दौरान कई ऐसे मौके आये जब मुग़ल सेना भाग खड़े हुए, परन्तु उन्हें नया उत्साह देकर वापस युद्ध के लिए भेज दिया गया. हल्दी घाटी के युद्ध में त्तिसरा दिन निर्णायक रहा, अपने जांबाज सैनिकों के लाशों के अम्बार देखकर महाराणा प्रताप बौखला गए थे. Maharana Pratap history in Hindi सवानवदी सप्तमी का दिन था, आकाश में बदल भयंकर गर्जना कर रहे थे.. आज राणा प्रताप अकेले ही पूरी फ़ौज बन गए थे. दो दिन तक वो अपने परम शत्रु मानसिंह को ढूंढते रहे जो युद्ध में मुलाकात करने की धमकी दे गया था. राणा प्रताप का बहुत अरमान था की वो उससे युद्ध करे और अपना शोर्य दिखाए, परन्तु मानसिंह अपने सेना के बीचोबीच छिपा रहा. आज के युद्ध में महाराणा प्रताप ने फैसला कर लिया था की वो मानसिंह को अवश्य ढूँढ निकालेंगे, वो बहुत ही खूबसूरत सफ़ेद घोड़े चेतक में बैठे शत्रुओं का संहार करते करते मानसिंह को ढूँढने लगे. सैनिकों का सिर काटते हुए वो मुग़ल सेना के बीचो बीच जा पहुंचे. उन पर रणचंडी सवार थी, देखते ही देखते उन्होंने सैंकड़ो मुगलों की लाशे बिछा दी. महाराणा के साथ उनके चुने हुए सैनिक थे वो जिधार निकल जाते थे मुग़ल सेना में हाहाकार मच जाता था, मुग़ल युद्ध भूमि को छोड़ भागने को मजबूर हो जाते थे, मुग़ल सेना अब उनसे सीधे सीधे लड़ाई करने में भयभीत हो रही थी, महाराणा मुग़ल सेना को चीरते हुए आगे बढ़ते गए. कुछ दूर जाने के बाद एक एक कर के उनके सहायक सैनिक ढेर होते गए. अब वो मुग़ल सेना के बीचो बीच लगभग अकेले थे, तभी उनकी नजर शहजादे सलीम में पड़ गयी, सलीम एक बड़े हाथी में सवार होकर लोहे की मजबूत सलाखों से बने पिंजड़ा में सुरक्षित बैठा युद्ध का सञ्चालन कर रहा था. महाराणा ने सलीम को देखा और चेतक को उसके ओर मोड़ लिया, सलीम ने जैसे ही देखा की महाराणा उसके ओर आ रहा है उसने अपने महावत को आदेश दिया की हाथी को दूसरी दिशा में मोड़ कर दूर ले जाया जाये, जब तक वो उनके पास पहुँचते एक कुशल मुगल सेना की टुकड़ी ने उन पर जान लेवा हमला किया परन्तु महाराणा प्रताप ने सभी का वार को अच्छी तरह से बेकार कर दिया और सबको मौत के घाट उतार दिया. अचानक से महाराणा की नजर मान सिंह पर पड़ी और उसे देखते ही महाराणा का खून खौलने लगा,मानसिंह हाथी पर सवार था, उसके पास अंगरक्षकों का एक बड़ा जमावड़ा था, मानसिंह के सुरक्षा व्यूह को तीर की तरह चीरते हुए, महाराणा का चेतक हाथी के बिलकुल ही नजदीक पहुँच गया, मानसिंह को ख़त्म करने के लिए महाराणा प्रताप ने दाहिने हाथ में भाला संभाला और चेतक को इशारा किया की वह हाथी के सामने से उछल कर गुजरे, चेतक ने महाराणा का इशारा समझ कर ठीक वैसा ही किया, परन्तु चेतक का पिछला पैर हाथी के सूंढ़ से लटका तलवार से चेतक का पैर घायल हो गया, परन्तु महाराणा उसे देख ना पाए, घायल होने के क्रम में ही महाराणा ने पूरी एकाग्रता से भाला को मानसिंह के मस्तक में फेंक डाला, परन्तु चेतक के घायल होने के कारण उनका निशाना चूक गया, और भला हाथी में बैठे महावत को चीरता हुआ लोहे की चादर में जा अटका, तबतक महाराणा की ओर सभी सैनिक दौड़ पड़े, और मानसिंह महाराणा के डर से कांपता हुआ हाथी के हावड़े में जा छिपा,भला हावड़े से टकरा कर गिर गया, राजा मानसिंह को खतरे में देख माधो सिंह कछावा महाराणा पर अपने सैनिकों के साथ टूट पड़े, उसने महाराणा पर प्राण घातक हमला किये. उसके साथ कई सैनिकों ने महाराणा पर एकसाथ हमला किये जिससे महाराणा के प्राण संकट में पद गए. एक बरछी उनके शरीर में पड़ी और महाराणा लहू लुहान हो गए. उसी समय एक और तलवार का वार उनके भुजा को आकर लगी. परन्तु अपनी प्राणों की परवाह किये बगैर महाराणा लगातार शत्रुओं से लोहा लेते रहे. अपने स्वामिभक्ति दिखा रहा चेतक भी हर संभव महाराणा का साथ दिए जा रहा था, चेतक का पिछला पैर बुरी तरह से घायल हो चूका था, परन्तु अश्वों की माला कहा जाने वाला अश्व दुसरे अश्वों की तरह घायल हो जाने पर युद्ध भूमि में थककर बैठ जाने वालों में से नहीं था. झालावाडा के राजा महाराणा प्रताप के मामा ने जब ये देखा की महाराणा प्रताप बुरी तरह से घायल हो गए है, और लगातार शत्रु से लड़े जा रहे है, तब उन्होंने अपना घोडा दौडाते हुए महाराणा प्रताप के निकट जा पहुंचे, उन्होंने झट से महाराणा का मुकुट निकला और अपने सिर में पहन लिया, फिर राणा से बोले-“तुमको मातृभूमि की सौगंध राणा अब तुम यहाँ से दूर चले जाओ, तुम्हारा जीवित रहना हम सबके लिए बहुत जरूरी है. महाराणा ने उनका विरोध किया परन्तु कई और सैनिको ने उनपर दवाब डाला की आप चले जाइये, अगर आप जीवित रहेंगे तब फिर से मेवाड़ को स्वतंत्र करा सकते है, महाराणा का घोडा चेतक अत्यंत संवेदनशील था, अपने स्वामी के प्राण को संकट में देख तुरंत ही उसने महाराणा को युद्ध क्षेत्र से दूर ले गया. मन्नाजी अकेले ही मुग़ल सेना के बीच घिर चुके थे, मुग़ल सेना उन्हें महाराणा समझ कर बुरी तरह से टूट पड़े, उन्होंने बहुत देर तक अपने शत्रुओं का सामना किया परन्तु अंत में वीर गति को प्राप्त किया. मन्ना जी के गिरते ही राणा प्रताप के सेना के पैर उखड़ गए.

जानिए महाराणा प्रताप के बारे में कुछ जाने-अनजाने किस्से

01. महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था. इतना ही नहीं ये भी कहा जाता है कि महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में 11 शादियां की थीं. उनका वजन 110 किलो और हाइट 7 फीट 5 इंच थी.
02. महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था, जो काफ़ी तेज़ दौड़ता था. चेतक मारवाड़ी नस्ल का घोड़ा था. माना जाता है कि इस नस्ल के घोड़े काफ़ी फुर्तीले होते हैं. महाराणा प्रताप को बचाने के लिए वह 26 फीट लंबे नाले के ऊपर से कूद गया था. महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का एक मंदिर भी बना है, जो आज भी हल्दीघाटी में सुरक्षित है. चेतक के लिए मशहूर हैं ये पंक्तियां…
रण बीच चौकड़ी भर-भर चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा को पाला था
जो बाग हवा से ज़रा हिली लेकर सवार उड़ जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था
03. महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था. महाराणा प्रताप हमेशा दो तलवार रखते थे, एक अपने लिए और दूसरी निहत्थे दुश्मन के लिए | महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो… और लम्बाई 7 फीट 5 इंच थी। यह बात अचंभित करने वाली है कि इतना वजन लेकर प्रताप रणभूमि में लड़ते थे।
04. हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध महाराणा प्रताप और मुगल बादशाह अकबर के बीच 18 जून, 1576 ईसवी को लड़ा गया था. हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक की भी मौत हुई. शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को उनके भाई शक्ति सिंह ने बचाया. हल्दीघाटी की जंग केवल एक दिन चली, जिसमें 17 हजार लोग मारे गए. हालांकि इस युद्ध में न महाराणा प्रताप की हार हुई और न ही अकबर जीत सका.
05. हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक. इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और संघर्ष करते रहे. कहते हैं कि अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए 6 शान्ति दूतों को भेजा था, जिससे युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म किया जा सके, लेकिन महाराणा प्रताप ने यह कहते हुए हर बार उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया कि राजपूत योद्धा यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता.
06. महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित हैं. यह भी कहा जाता है कि अकबर ने महाराणा प्रताप को कहा था कि अगर तुम हमारे आगे झुकते हो तो आधा भारत आप का रहेगा, लेकिन महाराणा प्रताप ने कहा मर जाऊंगा लेकिन सिर नहीं झुकाऊंगा.
07. अकबर महाराणा प्रताप के सबसे बड़े शत्रु थे, लेकिन उनकी मौत का समाचार सुनकर अकबर भी रोने लगे थे. कई इतिहासकार मानते हैं कि हृदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों के प्रशंसक थे. मुगल बादशाह अकबर, महाराणा प्रताप की वीरता से काफी प्रभावित थे.

महाराणा प्रताप और चेतक के विषय में कुछ बातें

चेतक महाराणा प्रताप का सबसे प्यारा और प्रसिद्ध घोडा था। उसने हल्धि घटी के युद्ध के दौरान अपने प्राणों को खो कर बुद्धिमानी, निडरता, स्वामिभक्ति और वीरता का परिचय दिया। यह अरबी मूल का घोड़ा महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय था। हल्दी घाटी-(1576) के प्रसिद्ध युद्ध में चेतक ने वीरता का जो परिचय दिया था, वो इतिहास में अमर है। चेतक की वह बात भी बहुत यादगार है जिसमे उसने मुगलों को पीछे आते देख महाराणा प्रताप की रक्षा करने के लिए बरसाती नाले को लांघते समय वीरगति की प्राप्ति हुई।महाराणा प्रताप के प्रिय बहादुर घोड़े चेतक की मृत्यु भी इस युद्ध के दौरान हुई।चेतक की ताकत का पता इस बात से लगाया जा सकता था कि उसके मुंह के आगे हाथी कि सूंड लगाई जाती थी। जब मुगल सेना महाराणा प्रताप के पीछे लगी थी, तब चेतक प्रताप को अपनी पीठ पर लिए 26 फीट के उस नाले को लांघ गया, जिसे मुगल पार न कर सके।
1. चेतक घोड़े की सबसे खास बात थी कि, महाराणा प्रताप ने उसके चेहरे पर हाथी का मुखौटा लगा रखा था। ताकि युद्ध मैदान में दुश्‍मनों के हाथियों को कंफ्यूज किया जा सके।
2. युद्ध मैदान में बहुबल और हथियारों की अधिकता के चलते अकबर की सेना महाराणा प्रताप पर हावी होती जा रही थी। लेकिन अंत में बिजली की तरह दौड़ते चेतक घोड़े पर बैठकर महाराणा प्रताप ने दुश्‍मनों का संहार किया।
3. एक बार युद्ध में चेतक उछलकर हाथी के मस्‍तक पर चढ़ गया था। हालांकि हाथी से उतरते समय चेतक का एक पैर हाथी की सूंड में बंधी तलवार से कट गया।
4. अपना एक पैर कटे होने के बावजूद महाराणा को सुरक्षित स्थान पर लाने के लिए चेतक बिना रुके पांच किलोमीटर तक दौड़ा। यहां तक कि उसने रास्ते में पड़ने वाले 100 मीटर के बरसाती नाले को भी एक छलांग में पार कर लिया। जिसे मुगल की सेना पार ना कर सकी।

महाराणा प्रताप के सभी 11 पत्नियों के नाम

महारानी अज्बदे पुनवर, अमर्बाई राठौर, रत्नावातिबाई परमार, जसोबाई चौहान, फूल बाई राठौर, शाहमतिबाई हाडा, चम्पाबाई झाती, खीचर आशा बाई, अलाम्देबाई चौहान, लखाबाई, सोलान्खिनिपुर बाई।

महाराणा प्रताप के  सभी 17 पुत्र के नाम

अमर सिंह, भगवन दास, शेख सिंह, कुंवर दुर्जन सिंह, कुंवर राम सिंह, कुंवर रैभाना सिंह, चंदा सिंह, कुंवर हाथी सिंह, कुंवर नाथा सिंह, कुंवर कचरा सिंह, कुंवर कल्यान दास, सहस मॉल, कुंवर जसवंत सिंह, कुंवर पूरन मॉल, कुंवर गोपाल, कुंवर सनवाल दास सिंह, कुंवर माल सिंह।
उसके बाद महाराणा प्रताप अपने राज्य के सुविधाओं में जुट गए परन्तु 11 वर्ष के पश्चात 29 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड, राजस्थान मे उनकी मृत्यु हो गई।
एक सच्चे राजपूत, पराक्रमी, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि की रक्षा और उसके लिए मर मिटने वाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदा के लिए अमर हो गए किन्तु अपनी वीरता का गान सबके मुख और दिल में छोड़ कर गए। इतिहास गवाह है कि जब महाराणा प्रताप का देहांत हुआ तो स्वंय अकबर भी रो पड़े थे। मात्र 57 वर्ष की उम्र में महाराणा प्रताप स्वर्ग सिधार गए।
देश के वीर पुरुष, सैनिक, स्वाभिमानी, स्वतंत्र प्रिय महान क्षत्रिय नरेश महाराणा प्रताप को मेरा शत शत नमन।वंदन |

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