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महाशिवरात्रि पर्व की महिमा जाने

प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मास शिवरात्रि कहा जाता है। इन शिवरात्रियों में सबसे प्रमुख है फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्री की रात में देवी पार्वती और भगवान भोलेनाथ का विवाह हुआ था इसलिए यह शिवरात्रि वर्ष भर की शिवरात्रि से उत्तम है।शिवरात्रि शिव और शक्ति के अभिसरण का विशेष पर्व है। हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।हिंदू कैलेंडर के अनुसार इसे हर साल फाल्गुन माह में 13वीं रात या 14वें दिन मनाया जाता है। इस त्योहार में श्रद्धालु पूरी रात जागकर भगवान शिव की आराधना में भजन गाते हैं। कुछ लोग पूरे दिन और रात उपवास भी करते हैं। शिव लिंग को पानी और बेलपत्र चढ़ाने के बाद ही वे अपना उपवास तोड़ते हैं।

अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ माह की मासिक शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहते हैं। परन्तु पुर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार फाल्गुन माह की मासिक शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहते हैं। दोनों पञ्चाङ्गों में यह चन्द्र मास की नामाकरण प्रथा है जो इसे अलग-अलग करती है। हालाँकि दोनों, पूर्णिमांत और अमांत पञ्चाङ्ग एक ही दिन महा शिवरात्रि के साथ सभी शिवरात्रियों को मानते हैं।

भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार महा शिवरात्रि के दिन मध्य रात्रि में भगवान शिव लिङ्ग के रूप में प्रकट हुए थे। पहली बार शिव लिङ्ग की पूजा भगवान विष्णु और ब्रह्माजी द्वारा की गयी थी। इसीलिए महा शिवरात्रि को भगवान शिव के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है और श्रद्धालु लोग शिवरात्रि के दिन शिव लिङ्ग की पूजा करते हैं। शिवरात्रि व्रत प्राचीन काल से प्रचलित है। हिन्दु पुराणों में हमें शिवरात्रि व्रत का उल्लेख मिलता हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी, इन्द्राणी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री, सीता, पार्वती और रति ने भी शिवरात्रि का व्रत किया था।

शिवपुराण के अनुसार फाल्गुन मास की इस शिवरात्रि के दिन भगवान शिव जी करोड़ों सूर्यों के तेज के समान प्रभाव वाले हो जाते हैं. इस दिन जो व्यक्ति शिवजी की अराधना बेल पत्र से करता हैं तथा पूरे दिन उपवास करता हैं, शिवलिंग पर दूध चढाता हैं, उनका अभिषेक करता हैं. शिव जी उस व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत नरक में जाने से बचाते हैं तथा उसे मोक्ष और आनन्द प्रदान करते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन शिव जी अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ संसार के सभी शिवलिंगों में विराजमान होते हैं. इसलिए इस दिन शिवलिंग की विशेष पूजा की जाती हैं | मान्यता यह भी है कि फाल्गुन माह का 14वां दिन भगवान शिव का प्रिय दिन है। इसलिए महाशिवरात्रि को इसी दिन मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि के विषय में मान्यता है कि इस दिन भगवान भोलेनाथ का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है। इस दिन शिव जी की उपासना और पूजा करने से शिव जी जल्दी प्रसन्न होते हैं। शिवपुराण के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव का रूद्र रूप प्रकट हुआ था।भगवान शिव को उनके भोला-भाले स्वभाव के कारण भोलेनाथ के नाम से भी जाना जाता है।महाशिवरात्रि व्रत एवं कथा निर्मल कोठरी महाशिवरात्रि का व्रत शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सुगम साधन है। शिव को प्रसन्न कर कोई भी व्यक्ति कठिन समय तथा संकटों से उबरकर सभी प्रकार के पारिवारिक एवं सांसारिक सुख आदि प्राप्त कर सकता है। महा शिवरात्रि का व्रत फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को किया जाता है। कुछ लोग चतुर्दशी को भी यह व्रत करते हैं। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी विधि को मध्य रात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से ब्रह्मांड को समाप्त कर देते हैं। मां गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों एवं पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसान की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष और जटाओं में गंगा रखने वाले शिव अपने भक्तों का सदा मंगल करते हैं और श्री प्रदान करते हैं। कालों के काल और देवों के देव महादेव के इस व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत कोई भी कर सकता है। बहुत से लोग महाशिवरात्रि को शिव विवाह के उत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

सृष्टि में जब सात्विक तत्व का पूरी तरह अंत हो जाएगा और सिर्फ तामसिक शक्तियां ही रह जाएंगी तब महाशिवरात्रि के दिन ही प्रदोष काल में यानी संध्या के समय ताण्डव नृत्य करते हुए रूद्र प्रलय लाकर पूरी सृष्टि का अंत कर देंगे। इस तरह शास्त्र और पुराण कहते हैं कि महाशिवरात्रि की रात का सृष्टि में बड़ा महत्व है। शिवरात्रि की रात का विशेष महत्व होने की वजह से ही शिवालयों में रात के समय शिव जी की विशेष पूजा अर्चना होती है।

शिव का अर्थ है- शुभ, शङ्कर का अर्थ है कल्याण करने वाला। शुभ और कल्याणकारी चिन्तन, चरित्र एवं आकांक्षाएँ बनाना ही शिव आराधना की तैयारी अथवा शिवा सान्निध्य का लाभ है।

भगवान शिव-शंकर का तत्व दर्शन

शिवलिङ्ग का अर्थ होता है- शुभ प्रतीक चिह्न- बीज। वह विश्व- ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।
त्रिनेत्र – विवेक से कामदहन
मस्तक पर चन्द्रमा – मानसिक सन्तुलन
गङ्गा – ज्ञान प्रवाह
भूत आदि पिछड़े वर्गों को स्नेह देना
नशीली वस्तुएँ आदि शिव को चढ़ाने की परिपाटी है। मादक पदार्थ सेवन अकल्याणकारी हैं, किन्तु उनमें औषधीय गुण भी हैं। शिव को चढ़ाने का अर्थ हुआ- उनके शिव- शुभ उपयोग को ही स्वीकार करना, अशुभ व्यसन रूप का त्याग करना।

ज्योतिष की दृष्टि से भी महाशिवरात्रि की रात्रि का बड़ा महत्व है। भगवान शिव के सिर पर चन्द्रमा विराजमान रहता है। चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात में चन्द्रमा की शक्ति लगभग पूरी तरह क्षीण हो जाती है। जिससे तामसिक शक्तियां व्यक्ति के मन पर अधिकार करने लगती हैं जिससे पाप प्रभाव बढ़ जाता है। भगवान शंकर की पूजा से मानसिक बल प्राप्त होता है जिससे आसुरी और तामसिक शक्तियों के प्रभाव से बचाव होता है।

रात्रि से शंकर जी का विशेष स्नेह होने का एक कारण यह भी माना जाता है कि भगवान शंकर संहारकर्ता होने के कारण तमोगुण के अधिष्ठिता यानी स्वामी हैं। रात्रि भी जीवों की चेतना को छीन लेती है और जीव निद्रा देवी की गोद में सोने चला जा जाता है इसलिए रात को तमोगुणमयी कहा गया है। यही कारण है कि तमोगुण के स्वामी देवता भगवान शंकर की पूजा रात्रि में विशेष फलदायी मानी जाती है।

जो श्रद्धालु मासिक शिवरात्रि का व्रत करना चाहते है, वह इसे महा शिवरात्रि से आरम्भ कर सकते हैं और एक साल तक कायम रख सकते हैं। यह माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि के व्रत को करने से भगवान शिव की कृपा द्वारा कोई भी मुश्किल और असम्भव कार्य पूरे किये जा सकते हैं। श्रद्धालुओं को शिवरात्रि के दौरान जागी रहना चाहिए और रात्रि के दौरान भगवान शिव की पूजा करना चाहिए। अविवाहित महिलाएँ इस व्रत को विवाहित होने हेतु एवं विवाहित महिलाएँ अपने विवाहित जीवन में सुख और शान्ति बनाये रखने के लिए इस व्रत को करती है।

व्रत का विधान

प्रातःकाल स्नान, ध्यान आदि से निवृत्त होकर व्रत रखना चाहिए। पत्र-पुष्प तथा सुंदर वस्त्रों से मंडप तैयार करके सर्वतोभद्र की वेदी पर कलश की स्थापना के साथ गौरीशंकर की स्वर्ण की और नंदी की रजत की मूर्ति रखनी चाहिए। यदि धातु की मूर्ति संभव न हो तो शुद्ध मिट्टी से शिवलिंग बना लेना चाहिए। कलश को जल से भरकर रोली, मौली, चावल, सुपारी, लौंग, इलायची, चंदन, दूध, दही, घी, शहद, कमलगट्टे, धतूरे, बिल्व पत्र आदि का प्रसाद शिवजी को अर्पित करके पूजा करनी चाहिए।
रात को जागरण करके ब्राह्मणों से शिव स्तुति अथवा रुद्राभिषेक कराना चाहिए। जागरण में शिवजी की चार आरती का विधान है।
इस अवसर पर शिव पुराण का पाठ कल्याणकारी होता है। दूसरे दिन प्रातः जौ, तिल, खीर तथा बेल पत्रों से हवन करके ब्राह्मणों को भोजन करवाकर व्रत का पाठ करना चाहिए।

विधि-विधान तथा शुद्ध भाव से जो यह व्रत रखता है, भगवान शिव प्रसन्न होकर उसे अपार सुख-संपदा प्रदान करते हैं। भगवान शंकर पर चढ़ाया गया नैवेद्य खाना निषिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि जो इस नैवेद्य को खा लेता है, वह नरक के दुःखों का भोग करता है। इसके निवारण के लिए शिव की मूर्ति के पास शालिग्राम रखना अनिवार्य है। यदि शिव की मूर्ति के पास शालिग्राम हो तो नैवेद्य खाने का कोई दोष नहीं होता। महाशिवरात्रि की एक कथा एक बार पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा, ‘‘ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।

पूजा करते समय यह मंत्र बोलें

मृत्युंजयमहादेव त्राहिमां शरणागतम्।
जन्ममृत्युजराव्याधिपीड़ितः कर्मबन्धनः।।

इस अवसर पर त्रिपत्र युक्त बिल्व पत्र भगवान् शिव को निम्र मन्त्र बोलते हुए चढ़ाएँ—

ॐ त्रिदलं त्रिगुणाकारं, त्रिनेत्रं च त्रिधायुधम्।
त्रिजन्मपापसंहारं, बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय अपने घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते करते ये 17 मंत्र बोलें । ‘जो शिव है वो गुरु है, जो गुरु है वो शिव है’ इसलिये गुरुदेव का स्मरण करते है । जिसकी गुरुदेव में दृढ़ भक्ति है वो गुरुदेव का स्मरण करते-करते मंत्र बोले | आस-पास शिवजी का मंदिर तो जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो वो शिवमंदिर जाकर दिया जलाकर ये १७ मंत्र बोले –
१) ॐ शिवाय नम:
२) ॐ सर्वात्मने नम:
३) ॐ त्रिनेत्राय नम:
४) ॐ हराय नम:
५) ॐ इन्द्र्मुखाय नम:
६) ॐ श्रीकंठाय नम:
७) ॐ सद्योजाताय नम:
८) ॐ वामदेवाय नम:
९) ॐ अघोरह्र्द्याय नम:
१०) ॐ तत्पुरुषाय नम:
११) ॐ ईशानाय नम:
१२) ॐ अनंतधर्माय नम:
१३) ॐ ज्ञानभूताय नम:
१४) ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:
१५) ॐ प्रधानाय नम:
१६) ॐ व्योमात्मने नम:
१७) ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम:
उक्‍त मंत्र बोलकर अपने इष्ट को, गुरु को प्रणाम करके यह शिव गायत्री मंत्र बोलें–
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे | महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात् ||
जिनके सिर पर कर्जा है वो शिवजी को प्रणाम करते हुये ये १७ मंत्र बोले कि मेरे सिर से ये भार उतर जाये | मैं निर्भार जीवन जी सकूं, भक्ति में आगे बढ़ सकूं| केवल समस्या को याद न करता रहूँ |

—–मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु शिवजी के उपयोगी मन्त्र—-

जानिए भगवान शंकर की कृपा से वर पाने की इच्छा रखने वाली कन्याओ को आज की रात भगवान शिव की उपासना किस प्रकार करनी चाहिए |—

१- सर्वप्रथम साफ मिट्टी ले कर उसे पानी दूध और गाय के घी में सान ले -“बं”मंत्र पढ़े | अब पहले गणेश जी बनाकर पीठ पर रखे -मंत्र है “ॐ हीं गं ग्लौ गणपतये ग्लौं गं हीं “108 बार “ॐ नमो हराय ” मन्त्र पढ़ कर – बहेड़े के फल के बराबर मिट्टी अपने दाहिने हाथ में लेले |
२ – इस मिट्टी से आपको एक शिवलिंग बनाना है |शिवलिंग आपके अंगूठे से बड़ा और बित्सित यानि बित्ते से छोटा होना चाहिए | शिवलिंग बनाते समय आपको मंत्र पढ़ना है | ” ॐ नमो महेश्वराय ” 108 बार |
३ – अब इस शिवलिंग को चौकी पर अस्थापित करे और 108 बार मंत्र पढ़े ” ॐ नमो शूलपाणी
४- अब बची मिटटी से सुन्दर सी कुमार की ( नौजवान की ) की मूर्ति बनाये और उसे भगवान शंकर के सीध में बैठकर 108 बार मंत्र पढ़े ” ॐ एं हूं क्षूं क्लिं कुमाराय नम : ”
५ – इसके बाद 108 बार ” ॐ नमो शिवाय ” मंत्र पढ़ कर प्रार्थना करे ” ॐ नम : पिनाकिने इहगच्छ इह तिष्ठ ” अब यह पीठ पूजा के लिए तैयार है | अब आप इस मूर्ति को -जल से, दूध से, दही से, घी से ,शहद से , और पंचामृत से स्नान और धूप दीप नैवेद्य आदि से पूजन करे | बेल पत्र अवस्य चढ़ाये | शिव के नैवेद्य मे बेल फल ,धतुरा ,भंग की पत्ती बेर का फल इत्यादी अवश्य शामिल करे |

अब/इसके बाद निम्न प्रयोग करें-

01 – विवाह योग्य कन्या को शीघ्र वर प्राप्ति के लिए ” हीं ॐ नम: शिवाय हीं ” मंत्र से १०८ बेर के फल भगवान को मे तीन बार चढ़ाने से यतेष्ठ फल प्राप्त होगा |
02- यदि किसी लड़के को यतेष्ट कन्या की इच्छा हो तो उसे इसी मंत्र को पढ़ते हुए १०८ बार अमृता (गिलोय) की आहुति पलाश्कि समिधा से रात्रि मे तीन बार देनी चाहिए |
03- मनोवंच्छित वर /कन्या पाने के लिये- अगर आपने अपना जीवन -साथी पहले ही पसंद कर लिया हो तो -आपको दूसरा मंत्र पढ़ना है| ये मंत्र लड़के -लड़कियो दोनो के लिए कामान है | मंत्र है-क्लिं ॐ नम: क्लिं इस मन्त्र को १०८ बार पढ़ते हुये ३ -३ पूर्वा से बेल की समिधा में हवन करने से मनोवांक्षित वर /कन्या की प्राप्ति होती है |
04- अगर विवाह में देर हो गई हो :-
अगर आपके विवाह में देर हो रही हो जो इसी बिधि से भगवान शंकर की स्थापना करके उन्हें शिव के दस द्रब्य चढ़ाये | ये दस द्रब्य इस प्रकार है | बेल का फल ,तिल पांच मुट्ठी ,खीर एक कटोरी ,सवा पाव घी , सवा पाव दूध ,सवा पाव दही,
108 दूर्वा , चार अंगुल की वट की पांच लकडिया ,चार अंगुल की पलाश की पांच लकडिया , और चार अंगुल की कत्थे यानि खैर की पांच लकडिया |
ये सामग्री शिव को अर्पित करके रात्रि में तीन बार भगवान की पंचोपचार पूजा करके तीनो बार
– 108 बार मंत्र जप करे | मंत्र है –`ॐ नमो भगवते रुद्राय `
05 – अगर आपको लगता है कि आपके रूप की कमी के कारण विवाह नहीं हो रहा हो तो आप उपरोक्त विधि से स्थापना करके खैर की समिधा से हवन करे | इसमे हवन सामग्री के तौर पर दूध और जौ का इस्तेमाल करना चाहिये |अगर खैर (कत्थे ) की लकड़ी न मिले तो उसकी जगह गम्मारी की लकड़ी का इस्तेमाल कर सकते है | मंत्र है -` हीं ॐ नम: शिवाय हीं` `
06 – यदि आपका दाम्पत्य या प्रेम सम्बन्ध खतरे में पड़ गया हो तो –पहले बताई गई बिधि से स्थापना करके – अपने जन्म नक्षत्र में और शिवरात्रि के दिन गुडूची यानि गिलोय और बकुल यानि मौलश्री की समिधा से घी ,शहद और शक्कर से होम करने से प्रेम सम्बन्ध या दाम्पत्य जीवन अक्षुण बना रहता है | मंत्र वही होगा – `हीं ॐ नम ; शिवाय हीं ` रात्रि में तिन बार भगवान की पूजा करके हर बार १०८ आहुतिया मंत्र पढ़ते हुये देनी चाहिये |
07- अगर आपको लगता है कि आपके शारीरिक गठन कि वजह से आपके विवाह में बाधा आ रही है तो शिवरात्रि के दिन से अपने जन्म दिन तक नित्य जप से शारीरिक सौष्ठव बेहतर होकर शादी का रास्ता खुलता है | इसके लिये शिवरात्रि कि रात उपरोक्त बिधि से तिन बार भगवान का पूजन करके हर बार बरगद कि समिधा जला कर बेल फल का गुदा ,शहद और घी से १०८ बार आहुतिया प्रदान करे | इसके बाद नित्य एक माला मंत्र पढ़े | प्रत्येक सोमवार को भगवान शंकर को दूध चढ़ाये और अपने जन्म दिन कि रात यही प्रक्रया दोहराये मंत्र – हीं ॐ नम : शिवाय हीं इससे लाभ अवस्य होगा |
08- विवाह में आने वाली किसी भी बाधा को दूर करने के लिये शिवरात्रि कि रात भगवान शिव कि पूजा करके क्षीरी वृक्ष कि समिधा और लावा से हवन करना चाहिये प्रदोष का व्रत करना चाहिये और मंत्र कि एक माला का जप शिवरात्रि कि रात तक तिन बार कर के होम कर पुन: वर प्राप्ति तक नित्य करना चाहिये मंत्र – `हीं ॐ नम: शिवाय हीं `
09- शिवरात्रि के दिन शिवजी जी की कृपा प्राप्ति तथा फल की प्राप्ति के लिए पंचामृत से शिवजी का अभिषेक करें और निम्नलिखित मन्त्र का जाप करें.
मन्त्र – ” ऊं ऐं ह्रीं शिव गौरीमव ह्रीं ऐं ऊं” इस मन्त्र का जाप करने से आपको शुभ फल की प्राप्ति होगी तथा आपकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी.
10. शिवरात्रि के दिन विवाहित स्त्रियाँ शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तथा अपने घर में सुख – सौभाग्य बनाये रखने के लिए शिवजी की पूजा करें और दूध से शिवजी का अभिषेक करें. अभिषेक करने के बाद निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें. मन्त्र – ” ऊं ह्रीं नमः शिवाय ह्रीं ऊं ” इस विधि से शिवजी की पूजा करने से आपके घर में हमेशा सुख – सौभाग्य बना रहेगा.
11. शिवरात्रि के दिन पूजा करने से लक्ष्मी माता भी प्रसन्न होती हैं. क्योंकि लक्ष्मी जी अपने अखंड स्वरूप में केवल शिव जी के आदेश पर ही किसी भी स्थान पर प्रकट होती हैं. लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए तथा धन प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि के दिन शिवजी की अर्चना करने के बाद नीचे दिए गये मन्त्र की दस माला का जाप करें. मन्त्र – ” ऊं श्रीं ऐं ऊं”
12. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि के दिन ही शिव जी का विवाह माता पार्वती से हुआ था. इसलिए यदि किसी व्यक्ति का विवाह नहीं हो पा रहा हैं. तो वह भी इस दिन व्रत एवं पूजा करके इस समस्या से छुटकारा पा सकता हैं. जल्दी विवाह करने के लिए शिवजी की पूजा करें और नीचे दिए गये मन्त्र का उच्चारण करें. मन्त्र – ” हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी कान्तकांता सुदुर्लभाम ”
13. यदि आपके घर में लगातार समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं. तो आप शिवरात्रि के दिन पूजा कर इन समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं. इसके लिए शिवरात्रि के दिन बेल पत्र, भांग, धतूरे को चढाने के बाद निम्नलिखित मन्त्र का जाप करें. मन्त्र – ” ऊं साम्ब सदा शिवाय नमः”
14. यदि किसी व्यक्ति के पुत्र का विवाह नहीं हो पा रहा हैं. तो पुत्र का विवाह शीघ्र करने के लिए भी आप इस दिन भोले की अराधना कर सकते हैं. इसके लिए एक मूंगा की माला लें और शिवजी की पूजा करने के बाद निम्नलिखित मन्त्र की एक माला का जाप अपने पुत्र से करवाएं. मन्त्र – ” पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानु सारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।”

महिलाओं के लिए महत्व
ऐसा माना जाता है जब कोई महिला भगवान शिव से प्रार्थना करती है तो भगवान शिव उनकी प्रार्थना को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। भगवान शिव की पूजा में किसी विशेष सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती है। सिर्फ पानी और बेलपत्र के जरिए भी श्रद्धालु भगवान शिव को प्रसन्न कर सकते हैं। यही वजह है कि महाशिवरात्रि का महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। ऐसा मानना है कि अगर अविवाहित महिला महाशिवरात्रि के दिन उपवास करती है तो उन्हें भगवान शिव जैसा ही पति मिलता है।

भगवान शिव की उपासना देव और दानव दोनों ही समान भाव से करते हैं । एक और रावण उनका परम उपासक है तो दूसरी ओर भगवान राम उनके गुण गाते नहीं थकते । वे रामकथा के प्रणेता हैं । परशुराम के गुरु हैं । भोले इतने कि भस्मासुर को बिना सोचे समझे वरदान दे दिया ।शिव भोले शंकर हैं, औघड़दानी हैं। औघड़ दानी ऐसा कि लंका रावण को दे दी । गण समूहों के मित्र हैं। गणों के साथ स्वयं भी नृत्य करते हैं। गण देवता गणेश स्वाभाविक ही उनके पुत्र हैं। वे रूद्र शिव एशिया के बड़े भूभाग में प्राचीन काल से ही उपासित हैं। सत्य आराध्य है। लेकिन शिव सत्य आनंददाता हैं। सत्य और शिव का एकात्म सुंदर होता है। शिव अखिल ब्रह्म की ऊर्जा हैं। लेकिन यह ऊर्जा सहज प्राप्य नहीं है। शिव प्राप्ति के प्रयास जरूरी हैं। पार्वती को भी शिव प्राप्ति के लिए महातप करना पड़ा था।शिव ही सभी रूपों में प्रकट होकर रूप रूप प्रतिरूप हैं। कालिदास के कथानक में जब तब शिव ने अपना रूप प्रकट कर दिया। शिव बोले अब मैं तुम्हारा दास हूं, पार्वती – तवस्मि दासः। मन करता है कि प्रश्न पूंछू शिव से – महादेव! इतना कठोर तप क्यों कराते हैं? लेकिन अपना प्रश्न वापस भी लेता हूं। शिव तप का पुरस्कार भी तो देते हैं। तप प्रभाव में वे स्वयं भक्त के भी भक्त बन जाते हैं।

शिव दुख हारी हैं – त्रिशूल धारक जो हैं। लेकिन सोंचने से मन नहीं भरता। मन यहां, वहां, जहां, तहां भागता ही है। राजनीति में हूं सो मंच, माला, माइक का त्रिशूल भीतर बहुत गहरे तक धंसा हुआ है। कह सकता हूं कि मैं भी त्रिशूलधारी हूं। सोम सामने है, भीतर ओम है। सोम ओम की यारी पुरानी है। लेकिन सोम से वंचित हूं। ओम् की अनुभूति नहीं।

ऋग्वेद के ऋषि वशिष्ठ ने आर्तभाव से पुकारा था न्न्यम्बक रूद्र को – हमें पकी ककड़ी की तरह मृत्यु बंधन से मुक्त करो। मैं भी डंठल से चिपका हुआ पका फल हूं। शिव निर्णय लें कि हमें कब संसार से मुक्त करना है? शिव को ओम् के साथ नमस्कार है – ओम नमः शिवाय।

हमें शिवरात्री पर संकल्प लेना चाहिए कि अपने अशिव संकल्पों का त्याग कर शिवसंकल्प करें । अपनी वासनाओं पर विजय प्राप्त करें और ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का जाप करते हुए अपनी जीवन यात्रा पूर्ण करें ।

 

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