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महिलाओं के परम आराध्य देव, महादेव ही क्यों?-बंशीलाल टांक

हिन्दू धर्म शास्त्रों में इस सृष्टि की संरचना में तीन देवों की अहं भूमिका मानी गई है। संरचना में ब्रह्मा, पालन करने में विष्णु और संहारकर्ता में भगवान शंकर को परन्तु इन तीनों देवों में महादेव केवल शंकर को ही कहा जाता है। शंकर को महादेव कहने के विभिन्न कारण शास्त्रों में सन्तों ने बताये है परन्तु देखा जाये तो शंकर को महादेव कहने का जो मुख्य कारण है वह है उनका वह विषपान जो समुद्र मंथन के समय सर्वप्रथम हलाहल जहर के रूप में निकला था। उसकी ज्वाला से उस समय ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रालोक के समस्त देवता भयभीत हो गये थे। उसके निवारण की किसी की हिम्मत नहीं हुई तब भगवान शंकर को याद किया और भगवान शिव इतने भोले है कि बिना विचार किये बिना परवाह परामर्श किये क्षणभर में विश्व को भस्मीभूत करने वाले उस जहर को अविलम्ब तत्क्षण पान कर लिया। भगवान शंकर का एक नाम इसी से तो भोलेनाथ भी कहा जाता है। ब्रह्मा-विष्णु व अन्य देवताओं में से किसी को यह टाइटल-उपनाम नहीं दिया गया है। भगवान शंकर एक निष्पक्ष देवता भी है। धरती पर चाहे मानव हो चाहे दानव जो भी उन्हें याद करता है, बिना भेदभाव उसकी मुदारे पूरी कर देते है।
पूजा में शिव के लिये कोई विशेष पदार्थ जुटाना नहीं पड़ते- आक, धतूरा, बेलपत्र, नरम- गरम-कोमल-कठोर कुछ नहीं तो एक लोटा जल ही उपर उंडेल दो तो भी खुश हो जायेंगे। खैर भगवान शिव की महिमा में महाशिवपुराण के अतिरिक्त अन्य ओर भी शास्त्र भरे पड़े है। भगवान राम के तो इष्ट ही भगवान शंकर है और इसलिये रामचरित मानस में भगवान राम ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि “शिवद्रोही मम भगत कहावा। सो नर मोंहि सपनेहूं नहीं पावा।” ब्रह्मा इन्द्र आदि देवताओं के जन्म-मृत्यु अर्थात आयु के प्रमाण भी मिल जायेंगे परन्तु भगवान शंकर के आदि-अन्त का कहीं कोई प्रमाण नहीं है अर्थात् भगवान शंकर अनादि देव है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में भगवान शंकर के लिये अपना स्पष्ट मत इस प्रकार व्यक्त किया है – “जगदात्मा महेसु पुरारी। जगत जनक सबके हितकारी।” भगवान शंकर सम्पूर्ण संसार की आत्मा-सम्पूर्ण जगत पिता होकर सबको सुख देने वाले देव है।
भगवान शंकर वैसे तो सबके आराध्य है ही परन्तु मुख्य रूप से महिलाओं के लिये महादेव परम् आराध्य देव है और इसलिये महिलाएं अन्य देवताओं के स्थान पर भगवान शंकर की ही विशेष आराधना पूजा-पाठ करती है। सम्पूर्ण श्रावण मास तो महिलाएं भगवान शंकर को ही समर्पित कर देती है। प्रातः जल्दी शैय्या त्यागकर, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान शंकर के मन्दिरों में पहुंचकर भोलेनाथ का अभिषेक, पूजन, अर्चन में संलग्न हो जाती है और इसका मुख्य कारण जितना सम्मान भगवान शंकर ने महिलाआंे को प्रदान किया है उतना अन्य देवताओं ने नहीं किया। चाहे भगवान राम हो- चाहे भगवान कृष्ण, कहने को तो इनके नाम से पहले क्रमशः उनकी अर्धांगिनीयां, सीता, राधा का नाम लिया जाता है जैसे सीताराम-राधाकृष्ण परन्तु अर्धनारीश्वर किसी को नहीं कहा गया है जबकि भगवान शंकर को अर्धनारीश्वर कहा जाता है। और मात्र कहा ही नहीं जाता भगवान शंकर के चित्रों अथवा मूर्तियों में ऐसे चित्र और मूर्तियों के दर्शन हो जावेंगे जहां आधा शरीर भगवान शंकर का और आधा शरीर जगदम्बा पार्वती का रहता है। जबकि ऐसा अन्य किसी भी देवता के चित्र अथवा मूर्ति में नहीं पाया जाता। भगवान राम की धर्मपत्नि सीता 14 वर्ष वनवास में रहने के बाद अयोध्या में आने पर एक व्यक्ति के झूठे प्रलाप पर हमेशा के लिये जंगल में छोड़ दिया। भगवान श्री कृष्ण ने भी ब्रज छोड़कर मथुरा और फिर मथुरा से द्वारका जाने के बाद फिर कभी ब्रज तथा राधा की तरफ मुंह फेर कर भी नहीं देखा। अर्धनारीश्वर के रूप में अपने को प्रदर्शित कर भगवान शंकर ने यह सिद्ध करके दिखाया है कि बिना शक्ति के शक्तिमान अधूरा है। कहने को तो सब कोई अपनी पत्नि को अर्धांगिनी अर्थात आधा अंग बताते है परन्तु इसकी हकीकत केवल भगवान शंकर में ही देखने को मिलती है। महिला सशक्तिकरण अभियान के इस वर्ष में महिलाओं पर सभाएं, सेमीनार आदि आयोजित कर भाषण-लेखन आदि के द्वारा महिलाओं का सम्मान करने वालों को शिवरात्री पर्व पर भगवान शंकर से अवश्य यह सीख लेना चाहिये कि बाहर महिलाओं के सम्मान में विभिन्न आयोजनों के साथ वह अपने घर में अपनी अर्धांगिनी को वास्तव में कितना मान-सम्मान, आदर-इज्जत दे पाते है अथवा अधिकांश समय वाट्सअप अथवा फेसबुक पर दूसरे शब्दों में अर्धांगिनी के स्थान पर आधे अंग के रूप में मोबाईल को ही स्वीकार कर लेते है।
कितना सहज, सरल, स्वाभाविक जीवन है भगवान भोलेनाथ-शिव का। ताड़कासुर का वध केवल शिव पुत्र से ही होने से देवताओं के कहने से जब भगवती पार्वती से दूल्हा बनाकर विवाह करने जाते है तो अलग से किसी शो रूम से किराये की मनचाही ड्रेस पहनकर नहीं अना बाघम्बर लपेटे, ब्यूटीपार्लर में जाकर श्रृंगारित होने के स्थान पर भभूत रमाये, गले में हीरा, पन्ना, मोतियों के हार के स्थान पर सापों का हार पहने, सुज्जजित बग्गी अथवा अश्व के स्थान पर बैल की ही सवारी और बारातियों में सम वयस्क युवाओं के स्थान पर समाज से बहिष्कृत, बैठकर वार्तालाप तो दूर जिन्हें देखना भी कोई पसन्द नहीं करे ऐेसे भूत-प्रेतों को आमंत्रित कर बारात में स्थान देना यह केवल कहने, सुनने, पढ़ने, पढ़ाने की कहानियां नहीं भोलेनाथ का सम्पन्न उच्च पदों पर आसीन उन सभी के लिये प्रेरणात्मक बहुत बड़ा संदेश है कि हम चाहे कितने भी सम्पन्न, प्रतिष्ठित पद पर क्यों न पहुंच जाये हमें अपने आश्रित मातहतों को-दीन गरीबों को भी पूरे सम्मान के साथ अपने शुभ कार्यों में सहभागी बनाना चाहिए।
भगवान शंकर की ही तरह भगवती जगदम्बा माँ पार्वती का भी भगवान शंकर के प्रति पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा, विश्वास के साथ समर्पित भाव रहा है। यह जानते हुए भी कि भगवान शंकर का निवास स्वर्ग में किसी नंदनवन में नहीं हिमाच्छादित कैलाश पर्वत पर है, रहन-सहन सब कुछ साधारण, कोई चकाचैंध नहीं, फिर भी माता पार्वती ने भगवान शंकर की प्राप्ति के लिये गठोर आराधना, तपस्या की क्योंकि भगवान शंकर बहुत ही सरल, सीधे-सादे पत्निव्रत धर्म को बखूबी निभाने वाले देवता है और माता पार्वती जब भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिये घोर तपस्या कर रही थी तब सप्तरिषियों ने परीक्षा के तौर पर भगवान शंकर की अस्वाभाविक जीवन चर्या (वेषभूषा-रहन सहन आदि) के संबंध में बताकर भगवान विष्णु से विवाह करने की कहा तो भगवती पार्वती ने सप्त ऋषियों के समस्त तर्कों से असहमत होकर स्पष्ट कह दिया कि “बरऊं सम्भू न तो रहहूं कुंआरी” अर्थात विवाह करूंगी तो केवल शंकर के साथ नहीं तो जीवन भर कुआंरी ही रहूंगी और भगवान शंकर को भी तब पार्वती की अपने प्रति सच्ची भक्ति-लगन देखकर 87 हजार वर्ष की समाधी, तपस्या त्यागकर जब माँ पार्वती को पत्नी ही नहीं अर्धांगिनी के रूप में आधा अंग पार्वती को समर्पित कर नारी जगत को जीवन में विशेष स्थान दिया तो फिर महादेव-महिलाओं को परम् आराध्य देव क्यों नहीं कहलायेंगे। ऐसे परम् ओढ़रदानी भगवान जिनके लिये कहा गया है सत्यं शिवं सुन्दरं- ऐसे महादेव को कोटिशः प्रणाम।

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