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महिलाओं पर दरिंदगी का ग्राफ इसी प्रकार बढ़ता गया तो इतिहास कभी माफ नहीं करेगा

एक तरफ बच्चियों के साथ बलात्कार, गेंग रेप, हत्यायें, दूसरी तरफ गायों की तस्करी, बूचड़ खानों में चिखती-चिल्लाती कराहती गायों की निर्मम हत्याये और सजा मात्र कुछ सालों की वह भी कब और कितनी होगी पता नहीं और होगी तब तक और कितने अपराध हो जायेंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह कैसी आजादी-कैसा आदर्श महान लोकतंत्र है हमारा ? कब तक चलता रहेगा यह सब कुछ।

‘‘यदा ही यदा ही अधर्मस्य, ग्लानिर्भवती भारत’’ 5000 वर्ष पूर्व गीता में व्यक्त की गई यह पीड़ा आज भी यथावत जारी ही नहीं और तेजी (सुपर फास्ट) गति से दिन दूनी रात चौंगुनी बड़ती जा रही है। महाभारत के समय एक देवर दुशासन द्वारा द्रोपदी की साड़ी खिंची गई थी परन्तु अब तो एक-दो नहीं सैकड़ों दरिंदों-दुःशासनों द्वारा अनेक ललनाओं की प्रतिदिन साडि़यों खिची ही नहीं जा रही है बल्कि उनके तन से तार-तार कर हत्याएं की जा रही है।

लोकसभा सदन जब शुरू होता है तब आपस में लड़ने-झगड़ने में कार्यवाही ठप्प कराने में पूरा चालू सत्र हंगामें की भेंट चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। लाखांे की पगार बढ़ाने में एक मिनिट की देर नहीं करते हुए जब सब माननीय एक साथ एक जाजम पर बैठ जाते है तो फिर फांसी अथवा नपुंसक बनाने जैसी कठोर सजा का बिल संसद में प्रस्तुत क्यों नहीं होता जब तक ऐसा बिल पास नहीं होगा तब तक बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं का नारा बोलने, सुनने, पढ़ने में तो बहुत अच्छा और सुहावना लगता है परन्तु हकीकत में जब बेटियां बचेगी ही नहीं, दरिंदों द्वारा दुष्कर्म के बाद उनकी हत्या की जा रही है तो फिर ऐसे लुभावने नारों की अहमियत ही क्या ?

लोकतंत्र को बचाना है तो माननीयों को संसद में अपनी अथवा पार्टी की साख स्थापित करने के लिये लड़ने-झगड़ने, हंगामा कर संसद ठप्प करने के बदले वासना के भूखे भेडि़यों, दरिंदों तथा गौ हत्यारों के लिये कठोर से कठोरतम कानून का क्या ऐसा प्रस्ताव पास नहीं कर देना चाहिये जिसे सुनते ही अपराध करने से पहले दरिंदों की रूह कांप उठे।

महिलाओं के साथ दुष्कर्म देश-प्रदेश की राजधानियों में प्रचुरता से बढ़ रहे हो जिसके लिये हाल ही में हाईकोर्ट दिल्ली ने भी महिलाओं की असुरक्षा को लेकर केन्द्र सराकर पर तल्ख टिप्पणी की है जो करना लाजमी भी थी क्योंकि दुष्कर्म के मामले नगरों गांवों में बढ़ते ही जा रहे है। जब  महिलाओं के हित चिन्तक प्रधानमंत्री मोदीजी देश की राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री मोदी और मुख्यमंत्री की राजधानी भोपाल में मामा मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराजसिंह चौहान मामा की भांजियों के साथ दरिंदे निर्भय होकर ज्यादती करने लगे हो तो फिर न्यायालय कैसे चुप रह सकता है।  माननीय श्री शिवराजसिंहजी चौहान हो और फिर भी बेटीयों की भांजियों के साथ दरिंदे निर्भय होकर ज्यादती करते रहे ऐसी अवस्था में तो फिर न्यायालय कैसे चुप रह सकता है।

6 नवम्बर को केबीसी हॉट सीट पर अमिताभ बच्चन के साथ बैठे नोबल पुरस्कार से सम्मानित आदरणीय श्री कैलाश सत्यार्थी ने दिल्ली के एक दरिंदे बाप द्वारा अपनी 13 वर्षीय बेटी के साथ लगातार ज्यादती करते रहे और बेटी ने गिड़गिड़ाकर उसे छोड़ने के लिये प्रार्थना करते हुए जिन शब्दों में पीड़ा व्यक्त की उसे सत्यार्थीजी ने उन शब्दों को व्यक्त कर दिया। मैं, पुनः उन शब्दों   को दोहराना उचित नहीं समझता परन्तु उसके बाद भी उस दरिंदे बाप ने अपनी बेटी पर रहम नहीं किया और अन्त में मजबूर होकर बेटी को दरिंदों के बाप से मुक्ति पाने पुलिस की शरण में जाना पड़ा। जिसने भी सत्यार्थीजी के उस वेदना को टी.वी. पर देखा होगा उसे सुनकर अवाक ही नहीं रहा होगा बल्कि उसकी आंखों से आंसू जरूर टपक पड़े होंगे।

अभी भी केन्द्र और राज्यों में सत्तासीन सरकारे नहीं चेती और पश्चिम के खाड़ी देशों की तरह दरिंदों को सरेआम फांसी की सजा का सदन में कानून नहीं बनाया तो चाहे लाख बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं का नारा लगाते रहे कुछ नहीं होने का। बेटियां इसी प्रकार लूटती मरती रहेगी और हम तमाशबीन बनकर सबकुछ चुपचाप देखते-सुनते रहेंगे, क्योंकि जब दरिंदे नाबालिग 3-4 साल की मासूम बच्चियों, महिलाओं किसी को नहीं छोड़ रहे है और तो और पढ़ने आती-जाती छात्राओं के साथ गेंगरेप हो रहा है। अभी भोपाल की छात्रा के साथ जिस प्रकार का गेंगरेप हुआ उससे प्रदेश ही नहीं पूरा राष्ट्र कुपित व्यथीत है। उसके पहले 31 अक्टूबर को देवास जिले के सुंदेल ग्राम की एक छात्रा शाम को 4 बजे खेत पर जब अपने पिता को चाय पत्ती और शक्कर देने जा रही थी तो एक दरिंदे ने उसके साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी। इससे बढ़कर देश का दुर्भाग्य और क्या होगा की रात-दिन बच्चियों के साथ-महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे है और हम कठोर कानून बनाने के लिये कोई पहल नहीं कर रहे है।

एक तरफ प्रतिदिन नरपिशाचों की हवस का शिकार ललनाएं और दूसरी तरफ बूचड़खानों में कटती हजारों गौमाताएं। क्या रही है हमारा महान आदर्श लोकतंत्र। कठोर कानून के अभाव में केवली पुलिस कर्मियों की निलम्बित करने अथवा उनके स्थानांतरण से नहीं कठोर कानून से बनेगी बात।

दिल्ली में निर्भया काण्ड के पश्चात् महिलाओं के साथ ज्यादतियों-दुराचार का ग्राफ तेजी से दिन पर दिन इसी प्रकार बढ़ता रहा तो इतिहास फिर कभी हमें माफ नहीं करेगा।

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