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महिला दिवस के संदर्भ में- नारी तब और अब

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मानव सभ्यता व संस्कृति का उद्गम वैदिक काल से माना जाता है। वैदिक काल में आर्यों का साम्राज्य था। आर्यों ने ही वेदों की रचना की। वैदिक काल में यज्ञों का प्रचलन था। हर शुभ कार्य की शुरूआत यज्ञों द्वारा की जाती थी। उस काल में अनेक संस्कारों का प्रचलन हुआ। विवाह को भी एक पवित्र संस्कार मानकर उसे सामाजिक मान्यता दी गई। यद्यपि इसके पूर्व राक्षस विवाह, गंधर्व विवाह आदि का प्रचलन था। पर कोई उनकी सामाजिक मान्यता नहीं थी। वैदिक काल में विवाह संस्कार इतना शुभ और पवित्र माना गया कि उस युग में विवाह करने वाली अरूंद्धति, अहिल्या, रेणुका, अनुसूईया आदि को ऋषि पत्नि मानकर देवियों का सा सम्मान दिया गया।
वैदिक काल के बाद आया पौराणिक काल। इस काल में पुराण लिखे गये। यज्ञों की अपेक्षा पूजा पद्धति का विकास हुआ। पहले जिन देवी देवताओं के नाम पर यज्ञ किया जाता था, अब उनके नाम से कथाएंे लिखी जाने लगी। वे कथाएं चाहे सतयुग से संबंधित हो, त्रेता से या द्वापर से, उनकी रचना पौराणिक काल में ही हुई। ये कथाएं चाहे सत्यनारायण की हों, ब्रह्मा, विष्णु, महेश की होें अथवा अन्य किसी देव पुरूष की हों। इन सभी में नारी पात्र को दोयम दर्जा ही प्राप्त हुआ। सभी में पुरूष पात्रों को वरियता दी गई। सतयुग में तारामति को अपने पुत्र की अन्त्येष्टी के लिये निर्वस्ना होने की नौबत आई तो त्रेता में सीता को भी अपनी पवित्रता के लिये अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। द्वापर मंे तो द्रोपदी की पांच-पांच पतियों की भोग्या होने का अभिषाप भोगना पड़ा। उसी काल में भगवान कृष्ण कथाऐं प्रचलन में आई। द्वापर में नारी को सर्वोच्च स्थान दिया गया और वो दिलाया भगवान कृष्ण ने।
उसके बाद आया बौद्ध काल। बोद्ध काल में नारी की दशा अत्यन्त सोचनीय रही। नारी को भोग्या माना गया। दासी प्रथा का प्रचलन हुआ तथा धर्म के नाम पर भी नारी का दोहन हुआ। मंदिरों में देव दासीयां रखी जाने लगी। इतना ही नहीं अपितु उस काल में नारी का सौंदर्य उसका सबसे बड़ा दुश्मन होता गया। सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी को तो नगर वधु बनाकर शापित किया गया।
फिर आया मुगल काल। इस काल में पर्दाप्रथा का प्रचलन बढ़ा। आम नारियां पर्दों में रहने लगी। पर्दे के बाहर रहने वाली खातून या तो बादशाहों और नवाबों के हरम में दाखिल कर ली गई या वे कोंठों की जीनत बढ़ाने लगी। मुगलकाल के बाद राजपूती दौर चला। इस दौर में नारी की अस्मिता को या तो अर्श की ऊँचाईयां मिली या धरती का खुरदरापन। इस दौर में जो नारियां घर बसा लेती थी उनका ठसका, उनकी हवेलियों तक सुरक्षित रहता था, बाकि नारियों को या तो गोली-बांदि बना लिया जाता था या उनका उपयोग राजनीतिक षड़यंत्रों के लिये किया जाता था। विष कन्याएं उसी दौर का अभिषाप हैं। उस दौर में नारियों को पद्मिनी, लक्ष्मीबाई, पद्मावति या अहिल्याबाई के रूप में अप्रितम सम्मान मिला तो हजारों नारियों द्वारा जौहर के रूप में किया गया सामूहिक आत्मदाह भी इतिहास के काले पन्नो में दर्ज है।
फिर आया स्वाधीनकाल। देश आजाद हुआ। पहली बार महिला शिक्षण-प्रशिक्षण की योजनाऐं बनी। भोग्या के काले पर्दे से निकलकर नारी पुरूषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने लगी। शिक्षा, न्याय, खेलकूद, राजनीति से लेकर अंतरिक्ष तक नारी की पहचान बनी। आज की नारी रेल भी चला रही है, तो जहाज और वायुयान भी व सैनाओं में भी सक्रिय है तो पुलिस में भी। पर्वतारोहण में वह आरोहण कर रही है, तो राजनीति में अग्रणी होकर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक भी आसीन हो रही है। तैराकी में तो सात समुद्र पार करने वाली विश्व की प्रथम महिला बुला चैधरी का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जा चुका है।
आज की नारी में अपने परिवार के प्रति यदि दासत्व की भक्ति है तो ममत्व की गरिमा थी। परिवार के संचालन में एक मंत्री जैसी क्षमता है तो अभिसार के क्षणों में अप्सराओं सा समपर्ण भी। इसलिये कहा गया है कि-
कार्येष्यु मंत्री, कर्मेष्यु दासी,
भोज्येषु माता, शयनेषु रंभा।

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