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मानव से महामानव बनकर इतिहास के पृष्ठों में विलीन मंदसौर को विश्वप्रसिद्धी सौपान पर पहुचाया स्वामी प्रत्यक्षानंदजी महाराज ने -बंशीलाल टांक

मन्दसौर। ऐतिहासिक एवं पुरातत्वीय दृष्टि से मंदसौर नगर प्राचीन नाम दशपुर से इतिहास के पृष्ठों में अंकित है। महाराजा यशोधर्मन का नगर कहलाने का गौरव भी इस नगर को रहा है। मुण्डी गेट जिसे मण्डी गेट कहा जाता है से प्रारंभ किला, किले में स्थित दो बावडि़या, सौंधनी स्थित विजय स्तम्भ आदि ऐसी ऐतिहासिक धरोहर जिसका विस्तार से उल्लेख साहित्य मर्मज्ञ, लेखक, चिंतक, वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेन्द्रजी लोढ़ा ने अपने ग्रंथ ‘‘युगों से युगों तक दशपुर’’ बखूबी विस्तार से किया है। यह नगर ऐतिहासिक पुरातत्वीय पृष्ठ भूमि का बहुत बड़ा अंग रहा है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि राजा-महाराजाओं का यह प्राचीन नगर आर्थिक दृष्टि से भी काफी वैभवशाली रहा होगा, इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते। ऐतिहासिक, राजनैतिक व सामाजिक परिवेश में तो यह नगर प्रतिष्ठित रहा ही है, महाकवि कालीदास की प्रसिद्ध कृति मेघदूत में इस नगर का उल्लेख होने से धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराओं में भी यह पीछे नहीं रहा है, परन्तु नगर की सम्पूर्ण गौरवशाली गाथा यदि एक वाक्य में कह दी जाये तो वह केवल इतिहास के पृष्ठों में विलीन होकर इतिहासविद, पुरातत्वीय अन्वेषकों, संग्रहालयों तक ही सीमित रह गई थी। परन्तु यशोधर्मन का यह नगर इतिहास के पन्नों से बाहर निकलकर आज मंदसौर नगर, हिन्दुस्तान तक की परिधी तक ही सीमित न रहकर विश्व के नक्शे में जो गौरवशाली स्थान, मुकाम हांसिल कराने में जिनकी महती भूमिका रही है वे है ब्रह्मलीन स्वामी श्री प्रत्यक्षानंदजी महाराज।
स्वामी श्री प्रत्यक्षानंदजी महाराज के ग्रहस्थाश्रम से लेकर सन्यास आश्रम तक की प्रेरणात्मक, संदेशात्मक दिव्य आध्यात्मिक यात्रा उनके त्याग, तपस्या, साधना का सांगोपांग चित्रण, वर्णन तो वही कर सकता है जिसे उनकी यात्रा का सहमार्गी रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो।
स्वामीजी के दर्शन का परम् सौभाग्य मुझे 18 वर्ष की आयु में जब मैं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा का विद्यार्थी था तब प्राप्त हुआ था। स्वामीजी का हष्टपुष्ट तेजस्वी शरीर , विशाल ललाट पर चमकता दिव्य तेज, एक हाथ में दण्ड और दूसरे में कमण्डल लिये, नारायण देव की जय के दिव्य जय घोष करते हुए अनेक सन्यासियों के साथ जब आप चेतन आश्रम मेनपुरिया से नगर में जब भीक्षा के लिये निकलते थे, उनके दर्शन के लिये तथा आशीर्वाद प्राप्तकरने के लिये सड़क के दर्शनार्थियों की कतारे लग जाती थी। स्वामीजी सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए सबसे नारायण देव की जय कहलाते हुए आशीर्वाद प्रदान करते थे। स्वामीजी के दर्शन कर तथा आशीर्वाद प्राप्त कर सब अपने को धन्य-धन्य मानते हुए उन क्षणों में अपने समस्त पाप, ताप, संताप को भूल जाते थे।
नगर का यह परम सौभाग्य रहा है कि यह नगर सनातन से महापुरूषों, संतों से सेवित रहा है। समय-समय पर जिन संतों का आशीर्वाद इस नगर को प्राप्त होता रहा है, क्रम से उन सभी के चित्र श्री केशव सत्संग भवन खानपुरा में चिंत्रित है। जिस समय का मैं उल्लेख कर रहा हूॅ। उस समय जिन दो महान संतों से यह नगर पल्लवित रहा है उनमें एक तरफ पूर्व दिशा में मेनपुरिया टेकरी पर स्थित चैतन्य आश्रम में स्वामी प्रत्यक्षानंदजी महाराज और पश्चिम में तेलिया टेंक स्थित टेकरी पर स्वामी ऋषियानन्दजी महाराज का नाम स्मरणीय है। – दोनों महापुरूषों द्वारा जहां एक ने नगर में पूर्व दिशा से भागवत कथा के माध्यम से साकार भगवद् भक्ति की सरिता प्रवाहित की वहीं कैलाश कुटी से ऋषियानन्दजी के द्वारा आदि शंकराचार्य के अद्वेतवाद (आत्मज्ञान) की गंगा की पावन निर्मल शीतल धारा मंे डूबकियां लगाते हुए अपने को भौतिकता से मुक्त कर जिस अलौकिक आनन्द, सुख, शांति का अनुभव एहसास होता रहा उन महापुरूषों के ब्रह्मलीन होने के बाद भी, उनके द्वारा प्रवाहित भक्ति और ज्ञान की दिव्य धाराएं शुष्क नहीं हुई, दोगुने, चौगुने विस्तार से उसी प्रकार अविरल प्रवाहित होकर सम्पूर्ण नगर को एक-दो सप्ताह नहीं वर्ष भर कभी सन्यासी, कभी वैष्णव सन्त, कभी जैन संतों, साध्वियों का सानिध्य प्राप्त कर उनके सत्संग से नगर लाभान्वित हो रहा है।
प्रत्यक्षानंदजी ने छोटे से बरखेड़ी गांव में जन्म लेकर कालूखेड़ा को अपनी कर्मभूमि बनाने के बाद सन्यास दीक्षा लेकर चैतन्य आश्रम मेनपुरिया को अपना साधना स्थली बनाकर अपनी साधना, तपस्या का प्रतिफल भगवान श्री पशुपतिनाथ की प्रतिष्ठापना करके मंदसौर नगर को विश्व प्रसिद्धी तथा एक तीर्थ नगरी के रूप में जो पहचान दिलवाई उसका सम्पूर्ण श्रेय स्वामीजी को ही है।
स्वामीजी केवल सन्यासी नहीं, एक महामानव भी थे। स्वामीजी जाति धर्म सम्प्रदाय से उपर उठकर मानव-सेवा को विशेष महत्व देते थे। इसका एक स्पष्ट उदाहरण स्वामीजी का मेनपुरिया आश्रम से पशुपतिनाथ दर्शन को आते वक्त एक मुस्लिम महिला की मदद करने का है जब औंखाबावजी घाटी के नीचे काफी देर से एक मुस्लिम महिला घास का भारा (गट्ठर) जमीन से अपने सिर पर रखवाने के लिये किसी के सहयोग की प्रतिक्षा में काफी देर से खड़ी थी। स्वामीजी उसकी परेशानी को समझ गये और पास जाकर कहा चल में तेरा भारा उठवा देता हूॅॅ। महिला बोली स्वामीजी आप सन्यासी महात्मा है। आपको कैसे कष्ट दे सकती हूूँ। स्वामीजी ने बहिन मैं सन्यासी बाद में हूॅ, पहले इंसान हॅॅू और एक दूसरे की मदद करना प्रत्येक मानव का धर्म है। चाहे फिर वह गृहस्थ हो अथवा सन्यासी। आपने कहा कि समय पर जरूरतमंद मानव सेवा ही सबसे बड़ी ईश्वर सेवा है। स्वामीजी ने महिला के सिर पर घास का भारा रखवाया। महिला भाव विभोर होकर स्वामीजी प्रणाम कर अपनी गंतव्य की ओर चली गई, स्वामीजी का यह उदाहरण जाती-धर्म-सम्प्रदाय से बढ़कर सर्वप्रथम मानव धर्म, परस्पर सेवा-सहयोग का संदेश देता है।
नगर के विश्व प्रसिद्धी दिलाने वाले ऐसे महल सन्त के नाम से अन्य महापुरूषों-राजनेताओं की तरह नगर की किसी भी सड़क, उद्यान, परिसर आदि का नामकरण उनके नाम पर नहीं हुआ है। नगर में होने वाले धार्मिक सत्सग समारोह में प्रत्यक्षानंदजी के नाम का उल्लेख नहीं होता है। यहां तक कि पशुपतिनाथ सभागृह में आयोजित होने वाले आयोजनों में भी प्रत्यक्षानंदजी का स्मरण के अवसर भी शायद ही देखने में आये है। यदि नगरपालिका प्रबंध समिति समन्वय रूप से प्रत्यक्षानंदजी के नाम से नगर की किसी सड़क, उद्यान, शिक्षण संस्था आदि किसी का भी नामकरण स्वामी प्रत्यक्षानंदजी के नाम पर किया जाता है तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजली, भावांजली होगी।

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