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मायने सिंधिया के कथन के

इसे आप तजुर्बा कह सकते हैं। राजनीति में दो ही मौकों पर इंसान संन्यासी सा विरक्त होने की ऐसी नौटंकी करता है। या तो उसे यह बता दिया जाए कि किसी पद या अन्य लाभ की उसकी महत्वाकांक्षा अब पूरी नहीं हो सकती। या फिर उसके कान में धीरे से यह मंत्र फूंक दिया गया हो कि अब चुप रहो। जो मांगा है, वह मिलने वाला है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कल जो कुछ कहा, वह ऊपर बतायी गयी इन दो में से किसी एक बात की ही और इशारा हो सकता है। साल भर से ज्यादा हो गया। सिंधिया दूध की मक्खी नहीं तो कम से कम मलाई में गिरे बाल की तरह तो बाहर निकाले ही जा चुके हैं। न उन्हें मुख्यमंत्री का पद मिला और न ही लाख हाथ-पांव मारने के बावजूद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद को पाने की उनकी आरजू पूरी हो सकी है। इस बीच रविवार को सिंधिया ने फरमाया कि बीते अठारह साल में उन्होंने कभी कोई पद नहीं मांगा। इसलिए अब भी नहीं मांगेंगे

वैसे कांग्रेस में सिंधिया जैसे कद और विरसे में मिली राजनीति वाले लोगों को बिना मांगे ही सब मिलता रहा है। ये तो लंबी परम्परा है। तो अब कांग्रेस में सिंधिया के समर्थक तथा विरोधियों के बीच इस कथन को लेकर, ‘अश्वत्थामा हत: इति नरो वा कुंजरो वा’ वाले भ्रम का कुहासा गाढ़ा हो गया है। एक तरह से आप मान सकते हैं कि सिंधिया ने अपनी पीड़ा को अहं के तौर पर सामने रखा है। दूसरी तरह से यह भी माना जा सकता है कि मामला विशिष्ट तरह के मेहमानों का हो सकता है। वे जो किसी के घर में भोजन का निमंत्रण मिलते ही कहते हैं कि यूं तो उनका पेट भरा हुआ है, किंतु मेजबान इतना आग्रह कर रही रहा है तो वे कुछ और भोजन कर सकते हैं। सिंधिया पद लोलुप नहीं हैं। लेकिन सियासत में जब पद को ही सम्मान का प्रमुख आधार मान लिया गया हो तो फिर राजघराने का खून भला कैसे अप्रभावित रह सकता है।

उनका खेमा जानता है कि चीफ मिनिस्टर कमलनाथ और सुपर चीफ मिनिस्टर दिग्विजय सिंह ने मिलकर उनके नेता को ठिकाने लगा रखा है। जिन राहुल गांधी के खास लोगों में सिंधिया की गिनती होती थी, वह राहुल ही अब पार्टी में अपनी मां और बहन के बाद तीसरे क्रम पर खिसक गये हैं। उत्तरप्रदेश में मतदाताओं ने सिंधिया को कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार के तौर पर नकार दिया और गुना-शिवपुरी के मतदाताओं ने उन्हें प्रत्याशी के तौर पर अपनाने से मना कर दिया। यूं तो यूपी में कांग्रेस की कमान प्रियंका वाड्रा के पास भी थी, किंतु समरथ को नहीं दोष गुसार्इं। इसलिए वहां पार्टी को केवल एक सीट मिलने का ठीकरा ज्योतिरादित्य के सिर पर फोड़ दिया गया। यह तमाम फैक्टर कुछ यूं असरकारक हुए कि सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से तेजी से दूर होते जा रहे हैं। कमलनाथ फिलहाल इस पद पर अंगद के पांव की तरह काबिज हैं।

वैसे भी मध्यप्रदेश को लेकर कांग्रेस आलाकमान में बैठे नेता मानते हैं कि यहां के मसलों को प्रदेश की राजनीति के जो दो-चार सूत्रधार नेता हैं, वे ही उलझा कर छोड़ते हैं लिहाजा, यहां फैसले लेना कठिन होता है। कमलनाथ भले ही अभी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ घूमते नजर आ रहे हों लेकिन दिग्विजय और कमलनाथ के बीच की केमेस्ट्री को समझना उनके लिए भी आसान नहीं है। लिहाजा, कमलनाथ कब तक मुख्यमंत्री के साथ-साथ प्रदेशाध्यक्ष भी बने रहते हैं कहना कठिन है। हालांकि राहुल के प्यारे प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया और कमलनाथ की केमेस्ट्री बेपटरी है। पर अब कमलनाथ तो आखिर कमलनाथ हैं। खेर, फिर शुरू के संदर्भ पर आता हूं। कुंवर विजय शाह को शिवराज सिंह चौहान ने मंत्री पद से हटा दिया था। शाह ने इसके बाद अपने क्षेत्र में लोगों से कहा, ‘मंत्री पद को लात मारकर आया हूं।

‘ कालांतर में जब फिर यही पद शाह को दिया गया, तो उन्होंने उसे लतियाने की बजाय सर-माथे पर सजाने में कोई विलंब नहीं किया। अर्जुन सिंह ने पीवी नरसिंहराव के खिलाफ बगावत की कीमत पार्टी से बाहर होकर अदा की। खूब गरजे। उस समय के उनके राजनीतिक सहचर एनडी तिवारी ने तो यह तक कह डाला कि देश को अगला नेतृत्व मध्यप्रदेश से मिलेगा। बाद में यही सिंह और तिवारी सीताराम केसरी के समक्ष नतमस्तक होकर फिर कांग्रेस में आ गये। खुद सिंधिया के पिता माधवराव ने मध्यप्रदेश विकास कांग्रेस बनायी थी। जब उन्हें समझ आ गया कि कांग्रेस से बाहर उनका विकास संभव नहीं है तो फिर उन्होंने घर वापसी करने में ही भलाई समझी। लब्बोलुआब यह कि भ्रम पाले जाने में कोई समझदारी नहीं है। सिंधिया ने पद न मांगने की बात कहकर मुगालते से दूर होने का जतन किया है या फिर इस गलतफहमी को उन्होंने और विस्तार दे दिया है, यह तो समय ही बताएगा। यह बात पूरी तरह तय है कि शुरू में बताए गए दो में कोई एक फैक्टर उनके कहे पर लागू होता है।

प्रकाश भटनागर

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