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मालवा की माटी के सुमधुर राष्ट्रीय कवि बालकविजी बैरागी – 10 फरवरी जन्मदिन पर विशेष

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कवि बालकवि बैरागी को पिछले छः माह में तीन बड़े सम्मान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ है। इतने कम समय में तीन बड़े सम्मान प्राप्त करने वाले बालकवि बैरागी सम्भवतः प्रदेश और देश के पहले साहित्कार है। 19 जुलाई 2016 को वाणी सम्मान वाणी फाउण्डेशन मेरठ, 24 दिसम्बर 2016 को परोपकार संस्था मुम्बई द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी भारत श्रैष्ठ कवी सम्मान एवं राष्ट्रीय कवि गीतकार प्रदीप स्मृति में संस्कृति विभाग द्वारा 26 जनवरी को राष्ट्रीय कवि प्रदीप सम्मान से सम्मानित किया गया इन सम्मानों के लिये वे अपनी जन्म भूमि मनासा की मिट्टी का आशीर्वाद मानते है।
मैं मुम्बई में था एक साहित्यिक कार्यक्रम में, एक महानुभाव ने मेरा परिचय पूछा-मैंने कहा मैं बालकवि बैरागी के जिले से हूँ, तब नीमच, मन्दसौर जिले में था। वे महानुभाव अच्छा मन्दसौर से?
बैरागीजी वे शख्सियत है जिनके नाम लेने से शहर की पहचान हो जाया करती है। वे एक कवि के साथ-साथ कुशल राजनीतिज्ञ है, एक श्रेष्ठ संचालक, कुशल वक्ता और श्रेष्ठ गद्य लेखक भी है, साथ ही बच्चों के बालकवि भी है। आपने बच्चों के लिये कई गीत-कविताएं लिखी जो बच्चों के जीवन के लिये प्रेरक बनी। बच्चों के लिये रानी और लाल परी फिल्म के गीत लिखे।
सन् 1945 में मात्र 14 वर्ष की नन्हीं उम्र में कांग्रेस का तिरंगा थामा तो बस थाम ही लिया। स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही नहीं रहे परन्तु अपनी ओजस्वी कलम से कई क्रांतिकारी गीत लिखे जो स्वतंत्रता के साक्षी बने। आपकी निष्ठा, अकम्प, अविचल, अनवरत और अनन्त रही। दल बदल का कलंक कभी नहीं लगा। पदों की अंधी बदहवास दौड़ या प्रगति जैसी प्रतियोगिता को सदैव नकारते आये। आपका एक नीति वाक्य राजनीति जीवन में सदैव रहा-‘‘समर्पण कोई शर्त नहीं करता, निष्ठा स्वमेव एक नीति है’’। राजनेता के रूप में आपकी छवि हमेशा काजल की कोठरी में बेदाग रही। सरस्वती का वरदहस्त भी आपकी दृढ़ता का कारण है। राजनीति का क्षेत्र हो या साहित्यिक क्षेत्र आप दोनों जगह पर अति विनम्र भी है और अति दृढ़ भी। चरित्र का ऐसा विरोधाभासी सामंजस्य प्रायः दुर्लभ ही होता है। वे साहित्य और राजनीति के सर्वप्रिय अजातशत्रू है क्योंकि उनकी सबसे बड़ी विशेषता राजनीति को संवेदनशील बनाने में रही, उन्होनंे साहित्य को राजनीति के कलुष से सदैव दूर रखा। साथ ही साहित्य की राजनीति से भी निरपेक्ष रहे। दोनों का उपयोग समाज के उत्थान के लिये किया।
बैरागीजी एक मात्र ऐसे व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व है जिनकी अखिल भारतीय ख्याति है। बैरागीजी हिन्दी भाषा, लोक भाषा मालवी के श्रेष्ठ कवि है, आपकी काव्य यात्रा श्रृंगार और अंगार के सौपानों को पार करते हुए, अब मानवता के लिये समर्पित हो जाने को समुत्सुक हो रही है। वे मंचजयी कवि है कई घंटे अपनी कविताओं से श्रोताओं को बांधे रख सकते है, यहां एक प्रसंग स्मरण करना चाहूंगा। वर्ष मुझे याद नहीं, मैं बहुत छोटा था। लोकसभा चुनाव में प्रचार के लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी नेहरू बस स्टेण्ड मन्दसौर में आने वाली थी। लगभग 2 बजे दोपहर का समय इंदिराजी का आगमन का नियत था। चुनावी दौरे में व्यस्त होने से देर रात्रि को वे मन्दसौर पहुंची। तब तक बैरागीजी ने ही माईक संभाले रखा। जनता धैर्य पूर्वक बैरागीजी को सुनती रही। संस्मरण, गद्य, ओजस्वी, क्रांतिकारी, श्रृंगार, मालवी रचनाएं सुनाकर जनता को बिखरने से बचा लिया। मैं सोचता हूँ उस दिन बैरागीजी सभा में नहीं होते तो शायद इतनी देर रात तक एक भी श्रोता सभा में उपस्थित नहीं रहते। मैं उस सभा का एक छोटा सा साक्षी था।
बैरागीजी का प्रबल सौभाग्य रहा है कि पं. नेहरूजी और इंदिराजी दोनों ही इन्हें नाम से जानते थे और समय-समय पर ये अपना महत्वपूर्ण कार्य इन्‍ह‍ें सौंपते थे। गांधीवादी होकर वे गांधीजी, शास्त्रीजी एवं साहित्यिक गुरू शिवमंगलसिंह सुमन से प्रभावित थे। बैरागीजी का मालवी फिल्मों में बड़ा योगदान रहा है। मालवी की पहली फिल्म भादवा माता आपकी प्रेरणा से सन् 1973 में बनी थी। मुकुन्द त्रिवेदी इसके निर्माता निर्देशक थे। इसकी पटकथा श्री अर्जुन जोशी की थी। गीत सभी बैरागीजी के थे। संगीत बालमुकुन्दजी के नाम से बैरागीजी और मुकुन्दभाई त्रिवेदी ने दिया था। बालकवि से ‘बाल’ और मुकुन्दभाई से ‘मुकुन्द’ लेकर ‘बालमुकुन्द’ नाम से संगीतकार का नाम रखा गया था। रेशमा और शेरा के लिये 1970-1971 में संगीतकार जयदेव मुम्बई से चलकर भोपाल आये तब बैरागीजी मध्यप्रदेश शासन में सूचना और प्रकाशन विभाग में राज्यमंत्री थे। अपने पुतलीघर आवास में रात्री 10 से 12 बजे के बीच आपने लोकप्रिय गीत ‘तू चंदा मैं चाँदनी’ गीत लिखा था जिसे लताजी ने गाया था। बैरागीजी के लगभग 70 गीत जयदेवजी की डायरी में गुमनाम चले गये, नहीं तो कई गीत इनमें से हमारे होठों पर गुनगुना रहे होते। उनके मालवी गीतों में ‘बाजे रे ढोल बाजे’, ‘आई रे बरखा रानी’, ‘लखारा’, ‘बादरवा अईग्या’ कर्णप्रिय लोकगीत है। साथ ही ‘पनिहारिन’ मालवी की कालजयी कविता है।
बैरागीजी की कविता संग्रह दरद दीवानी, जूझ रहा है हिन्दुस्तान, गाओं बच्चों, रेत के रिश्ते, ओ अमलतास, गौरव गीत, दो टूक, दादी का कर्ज, कोई तो समझे, ललकार, गीत बहार, मैं उपस्थित हूँ यहाँ, आलोक का अट्टहास, गीत लहर, शीलवती आग, सिन्ड्रेला, गुलिव्हर (दोनों काव्यानुवाद), मन ही मन, वंशज का वक्तव्य, भावी रक्षक देश के।
कहानी संग्रह- बिजूका बाबू, मनुहार भाभी- कहानी संग्रह पर दूरदर्शन भोपाल फिल्म बना चुका है।
गद्य- सरपंच (सहयोग उपन्यास) कच्छ का पदयात्री (यात्रा संस्मरण)
मालवी कविता संग्रह- चटख म्हारा चम्पा, अई जावो मैदान में।
अप्रकाशित आत्मकथा- मंगते से मिनिस्टर
बैरागी की डायरी- गद्य राज्यसभा सदस्य के रूप में सन् 2001 में लिखी डायरी-श्रीमती सोनिया गांधी को समर्पित।
बैरागीजी की साहित्य साधना सतत् रही है, आज भी देश के सभी हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में व आकाशवाणी-दूरदर्शन पर गीत-कविताएं, लेख, संस्मरण, कहानियां, टिप्पणियां प्रकाशित-प्रसारित होती रहती है।
हिन्दी राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक के रूप में देश-विदेश में पहचाने जाने वाले ओजस्वी कवि रहे है। हिन्दी सेवा के अमूल्य योगदान के लिये सैकड़ों बार कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके है।
बैरागीजी ने साहित्य और राजनीति में रहते हुए एक सरस्वती पुत्र का दायित्व बखूबी निभाया हैं। ‘साहित्य को धर्म, राजनीति को कर्म’ मानते हुए इन दोनों की लक्ष्मण रेखा को बहुत बारिक मानते हुए राजनीति को कभी कविता का विषय नहीं माना। उनका मानना है कि उनकी सरस्वती ने कभी राजनैतिक आभा को कालिख नहीं लगने दी, उन्होनें स्वयं लिखा है-
एक और आशीष मुझे दे माँगी या अनमाँगी
राजनीति के राजरोग से मरे नहीं बैरागी ।
बैरागीजी हिन्दी के पक्षधर होकर मूलतः मालवी भाषा के सर्जक है। मालवी माँ के दूध से विरासत में मिली। रहा सवाल हिन्दी का। सो हिन्दी का किसी भी भारतीय भाषा से संघर्ष नहीं है। वह प्रत्येक भाषा का सम्मान करती है। सारा संघर्ष ‘राजभाषा’ का है, राष्ट्रभाषा का नहीं। हिन्दी भारत राष्ट्र की राष्ट्रभाषा कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में हिन्दी किसी संविधान या संसद की मोहताज नहीं है। हिन्दी के रास्तें में जो भी बाधाएं है वे ‘राजभाषा’ के राजमार्ग पर हैं। ‘राष्ट्रभाषा और राजभाषा’ का मुद्दा अलग-अलग है। बैरागी जी कहते है ‘‘मैं राष्ट्रभाषा के दायरे और उसकी असीम शक्ति से परिचित हूँ, इसलिये राजभाषा हिन्दी के लिये काम करने में आनन्द आता है। मेरा एक नीति वाक्य अपनी दीवारों पर लिख लें, मैंने कहा है-‘हिन्दी धैर्य की भाषा है-उत्तेजना और हिंसा की नहीं’। हिन्दी अपने भविष्य के प्रति अगम धैर्य के साथ आश्वस्त है। हिन्दी कल भी यहीं थी, आज भी यहीं है और कल भी यहीं रहेगी। यह भारत की मिट्टी से प्रसूत है।’’
बैरागीजी के साहित्य पर अब तक अनेक विद्यार्थियों ने पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। विद्यार्थी इसे अपना परम् सौभाग्य समझते है। बैरागीजी 10 फरवरी को 86वें बसंत में प्रवेश कर रहे है। इस पावन माटी की अमूल्य धरोहर साहित्य मनीषी बैरागीजी सदैव दीर्घायु रहे। आने वाले सभी बसंत में उन्हें रोशन रखें, गुलजार रखे। हम सभी की प्रभू से यही करबद्ध प्रार्थना है। उन्ही की यह पंक्तिया हमे प्रेरित करती है –
रोशनी खुद चाहती है आपके कुछ काम आये
आपके संघर्ष में उसका कहीं कुछ नाम आये
आप अपना सिर पकड़कर हार कर मत बैठिये
अपने मनोबल की गहन गहराईयों में पैठिये
उस अतल से एक ही हुंकार ऊपर आएगी
गीत अपनी जीत के बस रोशनी ही गाएगी।

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