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मालवा के खेतों की अफीम फसल छोड़ रही है कई सवाल

(योगेन्द्र जोशी आकोदड़ा)

मालवांचल में इन दिनों खेतों में अफीम की फसल अपने पूरे यौवन पर है। कही रंग बिरंगे फूल तो कही हरे-हरे डोडों का दृश्य मनमोहक बना रहता है। भारत कृषि प्रधान देश हैं किसानों की मुख्य आय का स्त्रोत खेती हैं म.प्र. में मुख्य  रूप से सोयाबीन, मक्का, चना, गेहूँ, लहसुन की फसल बोई जाती हैं भारत के कुछ ही क्षेत्र में अफीम की खेती की जाती है। मंदसौर, नीमच, जावरा, संसदीय क्षेत्र की पहचान अफीम उत्पादक  क्षेत्र के रूप में होती रही है। इस क्षेत्र के उन्नत किसान अफीम की खेती करने में  पूर्ण रूपेण पारंगत है। अफीम नशे के लिये इस्तेमाल (उपयोग) की जाती हैं, परन्तु आयुर्वेदिक और ऐलोपेथिक के अनुसार इसका उपयोग जीवन रक्षक दवाईयों के बनाने में किया जाता है। अफीम का स्वाद तीखा रंग काला होता है और प्रभाव मादक रहता है।

यह शासकीय फसल हैं केन्द्रीय वित्त (राजस्व) मंत्रालय प्रत्येक वर्ष अक्टूबर-नवम्बर माह में गजट नोटिफिकेशन जारी करके नई नीति के अन्तर्गत अफीम काश्त बोने की अनुमति देता हैं, भारत सरकार की इस काश्त को सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए किसानों को विशेष आचार संहिता का पालन करना पड़ता है। 25 रूपये के आवेदन शुल्क के साथ आधार कार्ड, वोटर कार्ड, दो फोटो और बैंक पासबुक की फोटो कापी, किसान विभाग में मुखियाओ के माध्यम से देते है फिर अधिकारियों, कर्मचारियों द्वारा दस्तावेजों का बारिकी से परीक्षण किया जाता है। किसान अन्नदाता है, भगवान तो नहीं है। कहीं न कहीं चुक तो हो जाती है, जैसे नाम, उपनाम, पिता का नाम, लीजनामा, मृतक नामांतरण, साधारण नामांतरण इत्यादि इत्यादि ऐसी स्थिति में अधिकारीगण सरलता, सहलता और सहयोग का उदाहरण पेश न करते हुए वक्त की नजाकत को समझते हुए किसानों का आर्थिक शोषण करने में नहीं चुकते है। इस प्रकार लायसेंस की प्रक्रिया पूर्ण होती है।

किसान द्वारा लायसेंस मिलने के बाद नवम्बर तक अफीम फसल बो दी जाती हैं जिन किसानों के पास परम्परागत रूप से लायसेंस है उन्हीं को लायसेंस मिलते है। किसी भी काश्तकार को बोने के सप्ताह भर बाद एक पतले सुंई के धागे समान यह फसल खेतों में बहुत छोटे रूप में दिखाई देती है। जिस प्रकार शिशु का पालन पोषण उसकी मॉ करती है उसी प्रकार शिशु रूपी पौधे की देखभाल और  पोषण किसानों द्वारा किया जाता है। यदि अंकुरण नहीं होता है तो किसानों को पुनः पोस्तादाना बोना पड़ता है। आठ से दस बार फसल को पानी पिलाना पड़ता है। इसमें मुख्य रूप से काली मस्सी, सफेद मस्सी और कोड़िया रोग का प्रकोप ज्यादा होता है।

यह एक नाजुक फसल मानी जाती है। प्राकृतिक वातावरण को निश्चित सीमा तक सहन करती है। प्राकृतिक आपदा, बैमोसम बरसात और ओलावृष्टि से इस काश्त को भारी नुकसान पहुंचता है। मंदसौर, नीमच, जावरा संसदीय क्षेत्र में हजारों पट्टे प्रभावित होने का यह मुख्य कारण है जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। इस फसल का न तो राज्य सरकार और न ही केन्द्र सरकार बीमा करती है या करवाने की पहल करती है। इसलिये प्राकृतिक वेदना झेलने के बाद भी किसानों को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती है। वहीं दूसरी ओर ओपियम डिपार्टमेंट (केन्द्रीय वित्त राजस्व मंत्रालय के अधीन रहता है) शासकीय रेट बहुत कम निर्धारित करता है।

किसानों को पोस्तादाना और डोड़ाचूरा पर आर्थिक रूप से निर्भर रहना पड़ता है परन्तु विगत तीन वर्षों से डोड़ाचूरा का ठेका नहीं दिया गया है न सरकार ने डोड़ाचूरा खरीदा है। हो पाया। किसानों का डोड़ाचूरा घरांे में सड़ रहा है और उनमें जहरीले जानवर पैदा हो रहे है। अफीम का शासकीय रेट 880 रू. से प्रारंभ होकर कि 4200 रू. अलग-अलग ग्रेड पर रहता है जो कि लागत मूल्य से बहुत कम है। जबकि ब्लेक बाजारी में यही भाव लाखों रूपये पहुंच जाता है इसलिये किसान लालच में आकर काला बाजारी करने लग जाते है जिससे हजारों किसान परिवार बर्बाद हो चुकी है। पुलिस एनडीपीएस एक्ट  8/18, 8/29 में कार्यवाही करती है। जिसमें न्यूनतम 10 साल का कारावास व 1 लाख रूपये के अर्थदण्ड का प्रावधान है। इन धाराओं के कुछ दुष्परिणाम भी किसानों को भुगतना पड़ रहे है। अफीम के घटक उत्पादन मार्फीन, स्मैक, हेरोईन से वर्तमान पीढ़ी बर्बाद हो  रही है। भारत में हजारों, लाखों युवा नशे की लत से अपना व अपने परिवार का जीवन खराब कर चुके है। सम्पन्न परिवारों के युवाओं का तेजी से इस ओर जाना समाज के लिये शुभ संकेत नहीं है।

अफीम की खेती का पट्टा होना मालवांचल के किसानों के लिये प्रतिष्ठा का सूचक है। जिसके पास अफीम का पट्टा होता है उसे गर्व की अनुभूति होती है और इस आधार पर उसकी प्रतिष्ठा का आंकलन होता है किन्तु एक तरफ अफीम की फसल के कारण यह प्रतिष्ठा और दूसरी ओर कानूनी कार्यवाही का खतरा दुविधापूर्ण है। अफीम पर सरकारी नियंत्रण का कारण नशे की प्रवृत्ति में नई पीढ़ी डूब रही है दूसरी ओर जीवन रक्षक औषधियों के लिये अफीम उत्पादक भी है। इन सब दुविधाओं के बीच किसान को इस लाभकारी फसल का अवसर बरकरार रहे और सारे खतरों से वो मुक्त रहे। नशे से समाज दुष्प्रभावी न हो और जीवन रक्षक दवाईयां भी बन जाये इसलिये बड़े संतुलन की आवश्यकता है। समाजहित का चिंतन करने वाले जिम्मेदार लोग और राजनेता मिलकर इस पर गंभीरता पूर्वक मंथन करे और ऐसी व्यवस्था बनाये कि सभी को संतोष हो यही आज की आवश्यकता है।

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