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मिट्टी व खनिज

पृथ्वी ऊपरी सतह पर मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को मृदा (मिट्टी / soil) कहते हैं। मन्‍दसौर जिले की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है। खनिज ऐसे भौतिक पदार्थ हैं जो खान से खोद कर निकाले जाते हैं। मूलतः खनिज शब्द का अर्थ है- खनि + ज। अर्थात् खान से उत्पन्न (संस्कृत: खनि= खान)। इसका अंग्रेज़ी शब्द मिनरल (mineral) भी माइन (mine) से संबंध रखता है। जिले में अनेक खनिज सम्‍पदाओं का भंडार है।

पाँच तरह की मिट्टी पाई जाती है – लाल, काली, पीली, जलोढ़, कछारी और मलबा (मिश्रित)। जिले में भी इस प्रकार मिट्टी के जमाव विभिन्‍न क्षेत्रों में मिलते हैं। जिले के पश्चिम-दक्षिण भाग में खोड़ाना क्षेत्र से लेकर संजीत तथा बसई क्षेत्र से लेकर रूनीजा, गरोठ, नावली, हिंगलाजगढ़ त‍क के क्षेत्र में लाल मिट्टी का फैलाव है। शिवना नदी, चम्‍बल नदी के कछारी क्षेत्र में कठारी व पीली मिट्टी का जमाव है। इनमें मन्‍दसौर, नगरी, कचनारा क्षेत्र के जमाव बहुत गहरे हैं। मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला द्वारा पिछले वर्षों के परिणामों के आधार पर जिले की कृषि भूमि में नत्रजन निम्‍न श्रेणी, स्‍फुर मध्‍यम श्रेणी व पोटाश उच्‍च श्रेणी में उपस्थित पाया गया है।
जमीन से खनन (खोदकर) करके जो चीजें निकाली जाती हैं इन्‍हें खनिज पदार्थ कहते हैं। जैंसे – पत्‍थर, सोना, ताम्‍बा, लोहा, कोयला, अभ्रक आदि। जिले में स्‍लेट पेंसिल का पत्‍थर, चूने का पत्‍थर, मुर्रम, काला पत्‍थर प्रमुख रूप से निकाले जाते हैं।

स्‍लेट पेंसिल का पत्‍थर –

जिले के पश्चिमी-उत्तरी भाग में इस पत्‍थर की खदाने हैं। ये खदाने मन्‍दसौर व मल्‍हारगढ़ तहसीलों में स्थित है। हैदरवास, मजीठी, बुलगड़ी, मुल्‍तानपुरा, गोगरपुरा, कनगट्टी, रेवास देवड़ा, रलायता आदि क्षेत्रों में इस पत्‍थर को निकालने की खदानें हैं। यह पत्‍थर लाल तथा सफेद दो रंगों का होता है। सफेद पत्‍थर उच्‍च कोटि का माना जाता है। जिले में कोई 115 से अधिक कारखाने चलाये जा रहे हैं जिनमें पेंसिल (पेम) बनाई जाती है। यह पत्‍थर पेमे बाने के काम में आते हैं। पेमों के उत्‍पादन में इस जिले का सम्‍पूर्ण भारत में प्रथम स्‍थान है। इन पेमों को लिखने के काम में लिया जाता है। इसके पावडर से लीपने तथा टेलकम पावडर बनाने का काम लिया जाता है।

काला एवं लाल पत्‍थर –

शिवना नदी के किनारे काले पत्‍थर की खदानें मिलती हैं। इस पत्‍थर से विभिन्‍न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, सिल-बट्टा, कुण्‍डी, बद्दे आदि का निमार्ण किया जाता है। भवन निमार्ण का अन्‍य पत्‍थर बोहराखेड़ी, माल्‍या खेरखेड़ा, पानपुर, खेड़ा धमनार, खिलचीपुरा (नालछा), सेमलिया हीरा, भंडारिया, चौसला, रेवास देवड़ा, बड़वन, खण्‍डेरिया मारू, ढिकोला (मन्‍दसौर तहसील), दोरवाड़ा, पिल्‍या रायसिंह, भैंसाखेड़ा, बालागुड़ा, बोतलगंज (मल्‍हारगढ़ तहसील), भम्‍भोरी खुर्द, अंत्रालिया (भानपुरा तहसील), शक्‍करखेड़ी, खेताखेड़ा, लदूसा, किशोरपुरा, खण्‍डेरिया काचर, बड़ोद (सीतामऊ तहसील) व बंजारी (गरोठ तहसील) में निकाला जाता है। चूने का पत्‍थर सरसोद, बिलांत्री (मन्‍दसौर तहसील) बोतलगंज (मल्‍हारगढ़ तहसील) से निकाला जाता है।

मुर्रम –

भरवा करेन, सड़क निर्माण आदि में मुर्रम की आवश्‍यकता होती है। यह लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों में से निकाला जाता है। यह सिंदपन (मन्‍दसौर तहसील), कँवला (भानपुरा तहसील) से निकाला जाता है। आधुनिक युग में भवन निर्माण में रेती का बहुत महत्‍व है। यह कुम्‍हारिया, माल्‍याखेड़ी, नाईखेड़ी, चिकलिया, सेतखेड़ी, धाकड़खेड़ी, जग्‍गाखेड़ी, कोलवा, पिपल्‍या मुजावर, मन्‍दसौर, सौंधनी, दमदम, अफलजपुर, पिपलखेड़ी, नन्‍दावता, पाड़ल्‍या मारू, खजूरी बड़ायला (मन्‍दसौर तहसील), कनघट्टी, पायाखेड़ी, डोड़िया मीणा, मंशाखेड़ी, खेजड़ी, भैसाखेड़ा, काचरिया चन्‍द्रावत, झार्ड़ा, कचरिया चन्‍द्रावत, ढाबला (मलहारगढ़ तहसील), कुंडालिया चारण, जोड़मी, दसोरिया, खजूरी रूण्‍डा, कछालिया (गरोठ तहसील), नाहरगढ़, आम्‍बाखेड़ी, कयामपुर, शक्‍करखेड़ी, भगोर, रणायरा, बेटीखेड़ी, ढोढर (सीतामऊ तहसील), बोरदा, भैंसोदा (भानपुरा तहसील) से रेती निकाली जाती है।