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मीडिया समाज का आईना, इसकेे बिना जीवन अधूरा – यदि देश में चौथा स्तंभ न हो तो, क्‍या होता?

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जरा सोचिए किसी दिन आप नींद से जागे और सामने अखबार न हो…
टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम तो दिखाए जा रहे हों… लेकिन उनमें न्यूज चैनल नदारद हो…
एक दिन तो चलो जैसे-तैसे गुजर जाएगा..लेकिन अगर ये सिलसिला लगातार जारी रहे तो… !
क्या कभी सोचा है… मीडिया की भूमिका खत्म हो जाए तो क्या होगा?
क्या आप बिना अखबार पढ़े या समाचार सुने अपनी जिंदगी ठीक वैसे ही गुजार सकते हैं जैसे अब तक गुजारते आए हैं…?
क्या आप मानते हैं आपकी जिंदगी में मीडिया की कोई भूमिका नहीं है?
लोगों का मानना है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दूषित हो गया है…
मीडियावाले उल्टी-सीधी खबरें छापते हैं… या गॉसिप्स औऱ ह्यूमर ज्यादा फैलाते हैं…
उनका कहना है कि आज पत्रकार रात की पार्टियों में विश्वागस करता है। उसे जब तक टुकड़े डालो तब तक ही चुप रहता है। नहीं तो वो आपकी ऐसी की तेसी करने पर तुल जाता है। आज का मीडिया दुम हिलऊ बनता जा रहा है
लेकिन जनाब क्या सचमुच ऐसा है… क्या मीडियाकर्मी इतने होशियार है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए अरबों की जनता को एक पल में बेवकूफ बना जाते हैं…और क्या अरबों जनता इतनी ज्यादा बेवकूफ है कि हर रोज छले जाने के बाद भी इसे देखना और पढ़ना पसंद करती है… क्योंकि अगर जनता इसे नहीं देखती है तो चैनलों की TRP कहां से आती है… या न्यूजपेपरों का सर्कूलेशन कैसे हो जाता है..लाखों पेपर छपते हैं और हाथों हाथ बिक जाते हैं…
जरा गौर से सोचिए देश का चौथा स्तंभ यानी मीडिया न हो तो क्या होगा…
कल्पना कीजिए एक कुर्सी के चार खंभों में से एक खंभा निकाल दिए जाए तो…
उसी तरह देश के चार स्तंभों में से यदि एक को भी निकाल दिया गया तो देश की स्थिति लड़खड़ा सकती है… है ना…अब आप मीडिया की अहमियत का अंदाजा तो ब-खूबी लगा ही सकते हैं… देश की स्थिति मजबूत बनाने के लिए हर क्षेत्र में कार्य करनेवालों का अलग अलग योगदान है… और मीडिया अपना काम बखूबी निभा रही है
आज आप रिमोट का एक बटन दबाते हैं और पल भर में देश दुनिया की सारी बातें विस्तार से आपको मिल जाती है… अखबार के पन्ने पलट लेते हैं तो आपको आपके पसंद की सारी खबरें उस कोरे कागज पर नजर आती है… चाहे वो राजनीतिक हों, सामाजिक हों, आर्थिक हों, बिजनस की बातें हों या फिर खेल से जुड़ी कोई खबर… क्या आपने सोचा है इन सारी जानकारियों को इकट्ठा करने में हर-रोज और दिन-रात सैंकड़ों लोग किस कदर लगे रहते हैं… कैसे आपके सामने ये सारे मसाले परोसे जाते हैं…
कई बार जब मैं कहीं बाहर होती हूं और लोगों को पता चलता है कि मैं मीडिया में हूं तो उनकी शिकायत होती है कि हर चैनल पर दिनभर एक ही खबर दिखाई जाती हैं… एक ही खबर दिनभर खिंचती चली जाती है… सच कहूं तो ऐसा अमूमन होता नहीं है… हमारी कोशिश रहती है कि किसी खबर को हम ज्यादा देर तक ना खींचे… अक्सर जिस खबर को हम ज्यादा देर तक खींचते हैं उसके पीछे कहीं न कहीं हमारी मंशा होती है खबर को अंजाम तक पहुंचाना… खबर पर लगातार हम अपडेट देते हैं… मान लीजिए हम सुबह से एक खबर दिखा रहे हैं कि कोई बच्चा बोरबेल में गिर गया… अब… जब तक वो बच्चा उससे निकल नहीं जाता तब तक तो उसे दिखाना हमारी मजबूरी है… ताकि प्रशासन जल्द से जल्द हरकत में आए और बच्चा सुरक्षित बाहर निकल सके… मैं मानती हूं कि इस खबर को लगातार हम दिखाते हैं… लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इनके साथ हम अन्य खबरें नहीं दिखाते… या उस खबर में कोई अपडेट नहीं होता… सभी चैनल इस खबर पर इसलिए बने रहते हैं ताकि वो उस समय अपने अन्य प्रतिद्वंद्वी चैनल से आगे निकलने की होड़ में शामिल होते हैं…
अभी कुछ दिनों पहले मैं एक ब्लॉग देख रही थी… मुझे एक महाशय के ब्लॉग पर मीडिया की आलोचना से भरा एक पोस्ट मिला… उन्होंने अपनी भड़ास मीडिया पर जमकर निकाली थी…मीडियाकर्मियों की भी उन्होंने जमकर खिंचाई की थी…और उनके पोस्ट पर टिप्पणी करनेवालों की भी कमी नहीं थी…हालांकि मैं मीडिया में 4 साल से हूं… और चार साल काअनुभव हमारी फील्ड में काफी मायने रखता है…मैंने मीडिया को गहराई से देखा है.. सच कहूं…तो मीडिया के प्रति लोगों की धारणाओं को देखकर बुरा लगता है…बिना जाने समझे किसी एक धारणा पर चलना उचित नहीं है… लोगों ने मीडिया के लिए ये धारणा बना ली है… कि मीडिया में गलत-सही कुछ भी दिखाया जाता है या प्रचारित किया जाता है…जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता…लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है… हम वही दिखाते हैं जो सचमुच घटित होता है… हमारे पास उसके साक्षात प्रमाण होते हैं… हम हवा में बातें नहीं करते…हम उसे visual के जरिए दर्शकों के सामने डंके की चौट पर रखते हैं… ताकि लोगों को यकीन हो…सब कहते हैं… जो दिखता है वो बिकता है… लेकिन मैं कहती हूं….जो बिकता है वहीं यहां दिखता है…बिकने का मतलब है जो लोग देखना पसंद करते हैं… हम उसी को रोचक तरीके से आपके सामने पेश करते हैं…खबरें जो हम दिखाते है क्या आप खुले तौर पर उन्हें चुनौती दे सकते हैं… खबरों को प्रसारित होने से पहले उसे कई दौर से गुजरना पड़ता है… इसे पहले SCRIPT के रूप में लिखा जाता है… उससे संबंधित सारी जानकारी इकट्टा की जाती है… उसकी शुद्धता को परखा जाता है… न्यूज डेस्क पर बैठे कई वरिष्ठ पत्रकारों की नजर से गुजरने के बाद उसे आपके समक्ष पेश किया जाता हैं… ऐसे में गलतियों की संभावना बेहद कम होती है…
हमरी कोशिश रहती हैं कि हम उस खबर से संबिधित सारी जानकारी जल्दी से जल्दी आपके सामने रखें…अब गलतियां मानवीय प्रवृत्ति का हिस्सा है… छोटी-मोटी गलती किसी से भी हो सकती है… इसका ये मतलब नहीं कि हमेशा हम गलतियों को ही वरीयता देते हैं… हां मैं मानती हूं कि कुछ चैनलों ने ये फंडा अपना लिया है कि वो अजीबो-गरीब खबरों को ज्यादा तबज्जों देते हैं… खैर मैं किसी एक खास चैनल का नाम उजागर किए बिना कहती हूं कि सारे चैनल एक ही फंडे पर नहीं चलता… सभी मीडिया हाउसों का अलग-अलग फंडा होता है… इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें TRP से कोई लेना-देना नहीं होता… लोग कहते हैं मीडिया में खबरें बनती नहीं है बल्कि बनाई जाती हैं… ऐसा सोचना सरासर गलत है…हम वहीं दिखाते हैं जिन्हें सचमुच उस वक्त दिखाया जाना जरूरी होता है… खबरों की महत्ता के हिसाब से हम उसे प्रसारित करते हैं… लेकिन अब मार्केट में बने रहना है तो हम उन चीजों को नजर अंदाज कर नहीं चल सकते… दूसरे मीडिया हाउस से आगे बढ़ने की होड़ में हमें कई बार ऐसा करना पड़ता है…

मीडिया को आपकी निजी जिंदगी से कोई सरोकार नहीं है लेकिन आपकी जिन्दगी में कुछ अलग हो रहा है तो उसे जनता के सामने सच उजागर करने का पूरा अधिकार है…इस प्रक्रिया में भले ही आपके लिए उसकी भूमिका गलत हो सकती है… लेकिन दुनिया की नजर में वो गलत नहीं है… उस स्थिति में उसे पूरा हक है जिंदगी के हर पहलू पर ताकझांक करने का… क्योंकि वो किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए काम नहीं करता… ऐसे में मीडिया आपके लिए मददगार भी साबित हो सकती है और खतरनाक भी… हमारा काम है दबे कुचलों की आवाज बुलंद करना… उसे उसका हक दिलाना…और देश दुनिया में घटित सभी तथ्यों को हू-ब-हू उजागर करना…

मैं ये बिल्कुल नहीं कहती कि मीडिया पाक-साफ है… मीडिया में भी गंदगी भरी है… जब कोई फिल्म बनती है तो उसमें सारे मसाले भरे जाते हैं… उसी तरह मीडिया में भी वो सारी चीजें मौजूद हैं… यहां भी वो सारे स्केन्डल्स मौजूद हैं…लेकिन हर जगह एक जैसी बात नहीं होती… शरीर पर धूल लग जाए तो उसे फिर से साफ कर आप खड़े हो जाते हैं… इसका मतलब ये कदापि नहीं कि आप हमेशा धूल-धु-सरित ही रहते हैं… मीडिया में काम करनेवालों के लिए ये जरूरी है कि आप किस हद तक खुद को सुरक्षित रख पाते हैं… आपको उसूलों की यहां भी कद्र की जाती है… आपकी क्षमता को यहां भी परखा जाता है… और उसको तबज्जो दी जाती है

सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि…मैं ये ब्लॉग इसलिए नहीं लिख रही कि मुझे मीडिया को पाक-साफ बताने के लिए कोई सफाई देनी है… ना ही मेरा मक्सद मीडिया का बखान करना है… या इसका बीच बचाव करना है… देश का ये चौथा स्तंभ आज भी हिला नहीं हैं… अब भी वो बेहद मजबूत है… उसे किसी की सहानुभूति की जरूर नहीं है… वो अपना काम बखूबी करना जानता है…
हां… जो जैसा सोचते हैं..वो बिल्कुल अपने तरीके से सोचने के लिए स्वतंत्र हैं… मैं अपने ब्लॉग के जरिए सिर्फ इतना बताना चाहती हूं कि किसी एक मान्यता को आंखें मूद कर भरोसा करने से पहले उसे अपने तरीके से जांच परख लें… फिर उसपर यकीन की मुहर लगाए… कभी मौका मिले तो किसी मीडिया हाउस में जाकर देखें कि वहां काम कैसे होता है…उन्हें आप तक किसी खबर को पहुंचाने से पहले कितनी मेहनत करनी पड़ती हैं… और मीडियाकर्मी अपनी मेहनत के लिए आपसे प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं लेता… उन्हें उनकी मेहनत के लिए कंपनी भरपूर पैसे देती है… अगर कोई मीडियाकर्मी आपके साथ ऐसा कुछ करता है तो आप उसके खिलाफ जरूर आवाज उठाए… ऐसी हरकत निचले ओहदे पर काम करनेवाले लोग ही कर सकते हैं
लेकिन किसी एक की गलती के लिए आप सबको ना कोसें… मेरे ख़्याल से सबके लिए एक जैसी धारणा बनाना गलत है..क्या आपकी धारणा दीपक चौरसिया, पुण्य प्रसून वाजपेई, प्रभू चावला, रजत शर्मा, मृणाल पांडे, बरखा दत्त, अल्का सक्सेना, नीलम शर्मा जैसे दिग्गजों के लिए भी ऐसी ही है… शायद नहीं…उन्होंने भी ये बुलंदी काफी घर्षण के बाद पाई है… तो इस क्षेत्र में आनेवाले नए चेहरों को थेड़ा वक्त तो चाहिए खुद को स्थापित करने के लिए… कोई भी एक बार में इन दिग्गजों की सूची में शामिल नहीं हो सकता ना…
।। में जब नेट चला रहा तब मैने इस पोस्ट को कॉपी कर पोस्ट कर रहा हूँ ये उन लोगो के लिए पड़ना जरूरी है जो मीडिया वालो को भरा बुरा बोलते रहते क्योकी कोई भी खबर छपने से पहले वा न्यूज चैनल पर दिखाने से पहले कितनी मेहनत करनी पड़ती है और जब कुछ लोग मज़ाक उड़ाते है तब जयदा तकलीब होती है परन्तु हम। लोग अपनी समस्या तो किसी को नही बताते और अपना काम करते रहते है ।।

 

समाज में मीडिया की भूमिका

समाज में मीडिया की भूमिका पर बात करने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि मीडिया क्या है? मीडिया हमारे चारों ओर मौजूद है, टी.वी. सीरियल व शौ जो हम देखते हैं, संगीत जो हम रेडियों पर सुनते हैं, पत्र एवं पत्रिकाएं जो हम रोज पढ़ते हैं। क्योंकि मीडिया हमारे काफी करीब रहता है। हमारे चारों ओर यह मौजूद होता है। तो निश्चित सी बात है इसका प्रभाव भी हमारे ऊपर और हमारे समाज के ऊपर पड़ेगा ही।

लोकतंत्र के चार स्तंभ माने जाते हैं, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता-यह स्वाभाविक है कि जिस सिंहासन के चार पायों में से एक भी पाया खराब हो जाये तो वह रत्न जटित सिंहिसन भी अपनी आन-बान-शान गंवा देता है।

किसी ने शायद ठीक ही कहा है जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो हमने व हमारे अतीत ने इस बात को सच होते भी देखा है। याद किजिए वो दिन जब देष गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब अंग्रेजी हुकूमत के पांव उखाड़ने देष के अलग-अलग क्षेत्रों में जनता को जागरूक करने के लिये एवं ब्रिटिष हुकूमत की असलियत जनता तक पहुंचाने के लिये कई पत्र-पत्रिकाओं व अखबारों ने लोगों को आजादी के समर में कूद पड़ने एवं भारत माता को आजाद कराने के लिए कई तरह से जोष भरे व समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का बाखूबी से निर्वहन भी किया। तब देष के अलग-अलग क्षेत्रों से स्वराज्य, केसरी, काल, पयामे आजादी, युगान्तर, वंदेमातरम, संध्या, प्रताप, भारतमाता, कर्मयोगी, भविष्य, अभ्युदय, चांद जैसे कई ऐसी पत्र-पत्रिकाओं ने सामाजिक सरोकारों के बीच देषभक्ति का पाठ लोगों को पढ़ाया और आजादी की लड़ाई में योगदान देने हेतु हमें जागरूक किया।

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने कहा था, यदि मुझे कभी यह निश्चित करने के लिए कहा गया कि अखबार और सरकार में से किसी एक को चुनना है तो मैं बिना हिचक यही कहूंगा कि सरकार चाहे न हो, लेकिन अखबारों का अस्तित्व अवश्य रहे। एक समय था जब अखबार को समाज का दर्पण कहा जाता था समाज में जागरुकता लाने में अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह भूमिका किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, विश्व के तमाम प्रगतिशील विचारों वाले देशों में समाचार पत्रों की महती भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। मीडिया में और विशेष तौर पर प्रिंट मीडिया में जनमत बनाने की अद्भुत शक्ति होती है। नीति निर्धारण में जनता की राय जानने में और नीति निर्धारकों तक जनता की बात पहुंचाने में समाचार पत्र एक सेतु की तरह काम करते हैं। समाज पर समाचार पत्रों का प्रभाव जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने इतिहास पर डालनी चाहिए। लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी और पं. नेहरू जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने अखबारों को अपनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हथियार बनाया। आजादी के संघर्ष में भारतीय समाज को एकजुट करने में समाचार पत्रों की विशेष भूमिका थी। यह भूमिका इतनी प्रभावशाली हो गई थी कि अंग्रेजों ने प्रेस के दमन के लिए हरसंभव कदम उठाए। स्वतंत्रता के पश्चात लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और वकालत करने में अखबार अग्रणी रहे। आज मीडिया अखबारों तक सीमित नहीं है परंतु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब मीडिया की तुलना में प्रिंट मीडिया की पहुंच और विश्वसनीयता कहीं अधिक है। प्रिंट मीडिया का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि आप छपी हुई बातों को संदर्भ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं और उनका अध्ययन भी कर सकते हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी भी निश्चित रूप से बढ़ जाती है।

अपनी शुरूआत के दिनों में पत्रकारिता हमारे देष में एक मिषन के रूप में जन्मी थी। जिसका उद्ेष्य सामाजिक चेतना को और अधिक जागरूक करने का था, तब देष में गणेष शंकर विद्यार्थी जैसे युवाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आजादी के लिये संघर्षमयी पत्रकारिता को देखा गया, कल के पत्रकारों को न यातनाएं विचलित कर पाती थीं, न धमकियां। आर्थिक कष्टों में भी उनकी कलम कांपती नहीं थी, बल्कि दुगुनी जोष के साथ अंग्रेजों के खिलाफ आग उगलती थी, स्वाधीनता की पृष्ठ भूमि पर संघर्ष करने वाले और देष की आजादी के लिये लोगों मंे अहिंसा का अलख जगाने वाले महात्मा गांधी स्वयं एक अच्छे लेखक व कलमकार थे। महामना मालवीय जी ने भी अपनी कलम से जनता को जगाने का कार्य किया। तब पत्रकारिता के मायने थे देष की आजादी और फिर आजादी के बाद देष की समस्याओं के निराकरण को लेकर अंतिम दम तक संघर्ष करना और कलम की धार को अंतिम दम तक तेज रखना। जब हमारा देश पराधीनता की बेडिय़ों में जकड़ा हुआ था उस समय देश में इने-गिने सरकार समर्थक अखबार थे जो सरकारी धन को स्वीकार करते रहते थे। अंक प्रति आय जनता में भी अच्छी भावना नही थी। इन दिनों उन पत्रों को अधिक लोकप्रियता मिली जो राष्ट्रीय विचारधाना के थे और जनता में राष्ट्रीय चेतना पैदा करने के लिए प्रयत्नशील थे।

दरअसल वह एक जुनून है। सच्चा पत्रकार बिना अपने परिवार, धन एवं ऐश्वर्य की परवाह किये बिना मर-मिटने को तैयार रहता है। उसे कोई डिगा नहीं सकता। पूंजपति, सरकार व सामाजिक दीवारों, बंधनों को फांद कर वह अपने उद्देश्य की पूर्ति अब भी करता है। पत्रकारिता एक समर्पित दृष्टि और जीवन पद्धति है, कोई व्यक्ति विशेष या खिलवाड़ नहीं है। यह समर्पित दृष्टि तथा जीवन पद्धति जिसमें होती है, वही सच्चा पत्रकार है।

देश की स्वतंत्रता के बाद सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में जहां बुनियादी परिवर्तन आये, वहीं पत्रकारिता के क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव आया। इसने एक प्रच्छन्न उद्योग का स्वरूप ग्रहण कर लिया। जिसके कारण उद्योगों की समस्त अच्छाईयों के साथ इसको विकृतियां भी पत्रकारिता में आने लगीं। इस तरह निष्पक्ष पत्रकारिता का पूरा आदर्श और ढांचा ही चरमराने लगा।

समाचारपत्र किसी कारखाने के उत्पाद नहीं होते हैं लेकिन पिछले एक दशक से उन्हें एक उत्पाद भर बनाये जाने की साजिश की जा रही है। अखवारों के पन्ने रंगीन होते जा रहे हैं और उनमें विचार-शून्यता साफ झलकती है। समाचारपत्रों में न सिर्फ विचारों का अभाव है बल्कि उसके विपरीत उन्हें फिल्मों, लजीज व्यंजन और सेक्स संबंधित ऐसी तमाम सामग्री बहुतायत में परोसी जाने लगी है जो मनुष्य के जीवन में पहले बहुत अहम स्थान नहीं रखती थीं। यानी समाचारपत्रों के माध्यम से एक ऐसी काल्पनिक दुनिया का निर्माण किया जा रहा है जिसका देश की ९० प्रतिशत से अधिक जनता का कोई सरोकार नहीं है। लेकिन चूंकि ऐसी खबरों को प्रमोट और स्पांसर करने वालों की भीड़े है और अखबार को विज्ञज्ञपन चाहिए जिसके बिना विचार भी पाठकों तक नहीं पहुंच सके हैं, इसलिए अखबारों को उनके सामने सिर झुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।

जब भी मीडिया और समाज की बात की जाती है तो मीडिया को समाज में जागरूकता पैदा करने वाले एक साधन के रूप में देखा जाता है, जो की लोगों को सही व गलत करने की दिषा में एक प्रेरक का कार्य करता नज़र आता है। जहां कहीं भी अन्याय है, शोषण है, अत्याचार, भ्रष्टाचार और छलना है उसे जनहित में उजागर करना पत्रकारिता का मर्म और धर्म है। हर ओर से निराश व्यक्ति अखबार की तरफ आता है। अखबार ही उनकी अन्धकारमय जिन्दगी में उम्मीद की आखिरी किरण है। अखबारों को पीडि़तों का सहारा बनना चाहिए। समाचारपत्र जगत की यह तस्वीर आम पाठक देखता है। यहां यह कहना असंगत नहीं होगा कि अखबार अपनी जिस जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं वह अति सीमित है। वास्तव में हमने हाथी की पूंछ को अपने सिर पर रखकर यह मान लिया है कि हमने पूरा हाथी ही उठा लिया है।

युग चेतना ही पत्रकारिता का समृद्ध करती है। समाज, राष्ट के सामने जो विषम स्थितियां हैं उनका सम्यक विवेचन प्रस्तुत करके आम सहमति के विन्दु तक पहुंचने में पत्रकार और समाचार पत्र एक मंत्र प्रस्तुत करते हैं। युगीन समस्याओं, आशाओं और आकांक्षाओं पर मनन-चिंतन करके पत्रकार-समाचार पत्र आमजन में संतुलित चिंतन-चेतना, रचनात्मक विकास करते हैं। पत्रकार घटनाओं का मानवीय संस्करण प्रस्तुत करता है। उसे पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर कार्य करना होता है। उसकी प्रतिबद्धता समाचारों से है। एक चिकित्सक की भांति वह घटनाओं की नाड़ी पकड़ता है, फिर उसका निदान भी बताया है। पत्रकारिता जन-जन को जोडऩे का काम करती है। समाज के विभिन्न वर्गों में आपसी समझ के भाव को विकसित करते हुए एक मेल-जोल की संस्कृति के विकास में सहायक बनती है। जो पत्र और पत्रकार इसके विपरीत कार्य करते हैं उन्हें आप पीत पत्रकारिता करने वालों की श्रेणी में डाल सकते हैं।

मीडिया व पुलिस के उद्देश्य दरअसल जनहित ही हैं। ऐसे में पारदर्शिता और प्रोफेशलिज्म से सही लक्ष्य पाए जा सकते हैं। मीडिया समाज की आवाज शासन तक पहुंचाने में उसका प्रतिनिधि बनता है। अब सवाल यह उठता है कि वाकई मीडिया अथवा प्रेस जनता की आवाज हैं। आखिर वे जनता किसे मानते हैं? उनके लिए शोषितों की आवाज उठाना ज्यादा महत्वपूर्ण है अथवा क्रिकेट की रिर्पोटिंग करना, आम आदमी के मुद्दे बड़े हैं अथवा किसी सेलिब्रिटी की निजी जिंदगी ? आज की पत्रकारिता इस दौर से गुजर रही है जब उसकी प्रतिबद्धता पर प्रश्रचिन्ह लग रहे हैं। समय के साथ मीडिया के स्वरूप और मिशन में काफी परिवर्तन हुआ है। अब गंभीर मुद्दों के लिए मीडिया में जगह घटी है। अखबार का मुखपृष्ठ अमूमन राजनेताओं की बयानबाजी, घोटालों, क्रिकेट मैचों अथवा बाजार के उतार-चढ़ाव को ही मुख्य रूप से स्थान देता है। जिस पेज पर कल तक खोजी पत्रकारों के द्वारा ग्रामीण पृष्ठभूमि की समस्या, ग्रामीणों की राय व गांव की चौपाल प्रमुखता से छापी जाती थी, वहीं आज फिल्मी तरानों की अर्द्धनग्न तस्वीरें नज़र आती हैं। आप दिल्ली जैसे शहरों में ही देख लीजिए। चाहे आप मेट्रो में यात्रा कर रहें हो या दिल्ली परिवहन निगम की बसों में या अपने वाहन से। लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं है। उस पर मीडिया ऐसे मामलों को इस तरह से उठाता है जैसे कोई फिल्मी मसाला हो। उसे बस अपने टीआरपी की चिंता रहती है। महिलाओं/लड़कियों/बच्चियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को मीडिया में उछालने की प्रवृति पर अंकुश लगाए जाना चाहिए। हां, यह सही है कि बगैर मीडिया में ख़बर आए कोई कार्यवायी भी नहीं होती है लेकिन ऐसे मामले पर मीडिया कर्मी खासकर टेलीविजन में एक बहस का दौर चल पड़ता है उसे लगता है कि टीआरपी बढ़ाने का इससे बेहतर मौका और कोई नहीं हो सकता है और वो ऐसे मौकों को हाथ से जाने नहीं देना चाहती है। इस तरह की प्रवृति पर मीडिया को लगाम लगाने की सोचनी चाहिए। अपनी टीआरपी के लिए किसी की आबरू से खेलना अच्छी बात नहीं है।

आधुनिकता व वैष्वीकरण के इस दौर में इन पत्र-पत्रिकाओं व नामी-गिरामी न्यूज चैनलों को ग्रामीण परिवेष से लाभ नहीं हो पाता और सरोकार भी नहीं है। इसलिए वे धीरे-धीरे इससे दूर भाग रहे हैं और औद्योगीकरण के इस दौर में पत्रकारिता ने भी सामाजिक सरोकारों को भुलाते हुए उद्योग का रूप ले लिया है। गंभीर से गंभीर मुद्दे अंदर के पृष्ठों पर लिए जाते हैं तथा कई बार तो सिरे से गायब रहते हैं । समाचारों के रूप में कई समस्याएं जगह तो पा लेती हैं परंतु उन पर गंभीर विमर्श के लिए पृष्ठों की कमी हो जाती है। मीडिया की तटस्थता स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है।

मीडिया और सरकार के बीच के रिश्ते हमेशा अच्छे नहीं हो सकते क्योंकि मीडिया का काम ही है सरकारी कामकाज पर नज़र रखना. लेकिन वह सरकार को लोगों की समस्याओं, उनकी भावनाओं और उनकी मांगों से भी अवगत कराने का काम करता है और यह मौक़ा उपलब्ध कराता है कि सरकार जनभावनाओं के अनुरूप काम करे…

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