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मुफ्त के मजदूर कार्यकर्ता ?

चुनाव और किसी भी पार्टी के कार्यक्रम में एक बड़ी से फ़ौज देखने को मिलती है जो अपने नेता और दल के विकास के खातिर कुछ भी कर गुजरने के लिए हर वक्त आतुर रहते हैं यह वो लोग होते हैं जो अपने दिमाग का प्रयोग कभी नहीं करते।
देखा जाये तो कार्यकर्ता गुलामों की एक फ़ौज होती है जो अपने ईष्ट व्यक्ति और संस्था के आर्थिक भविष्य निर्माण में लगा रहता है पूरी दुनिया का राजनीतिक इतिहास उठा कर देखा लें कुछ राजनीतिक दल होते है और कुछ अक्लमन्द उनके नेता या कहें संचालक होते है जो की पूरी ऐश अय्याशी में जीते हैं और इस व्यवस्था में सबसे नीचे होता है कार्यकर्ता, यह एक ऐसी व्यवस्था होती है जिसमें सबसे नीचे वाला बोले तो कार्यकर्ता दिन रात कुत्तों की तरह अपने दिमागी मालिको (ऐसा इस लिए बोल  रहां हूँ क्योंकि कार्यकर्ता का अपना दिमाग मात्र 5% ही कार्य करता है बाकी पूरा 95% तो उसके दिमाग में उसके आका बोले तो पार्टी की नेताओं का ही असर होता है ) इसलिए मालिक शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ, कुत्तों की तरह काम करने के बाद भी कार्यकर्ता हमेशा उसी जगह पर रहता है।
मैंने बचपन से देखा है पार्टियां लाखों करोड़ों अपने खातों में जमा कर के रखती है और जब भी कोई कार्यक्रम होता है कार्यकर्ता को चन्दा उगाहने के लिए भेज दिया जाता है और बेचारा कार्यकर्ता अपने सम्बन्धों का इस्तेमाल करते हुए पार्टी के लिए रकम उगाही करते है अपने नाम और सम्बन्धों के बूते पर फिर इनका क्या ?
कार्यकर्ता हमेशा दरी, चादर और तम्बू ही लगाता रहता रह जाता है और जिन नेताओं के लिए
ये सारे काम वो करता है वो सायकल से विदेशी गाड़ियों में आ जाते है और कार्यकर्ता खुद के भविष्य और अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्षरत रहता है और जिन नेताओं को उसने बनाया था उन के ही बच्चे भविष्य बना पाते हैं और कार्यकर्ता के बच्चे भी उन नेताओं के बच्चों के कार्यकर्ता हो जाते है और हर जगह भैया जिंदाबाद के नारे लगाते हुए पाए जाते हैं और अगर कार्यकर्ता या उसके परिवार जन किस भी मामले में उलझ जाते है तो सर्वप्रथम पार्टी उनसे दूरी बना लेती है और यहां तक कह दिया जाता है की उनसे हमारा कोई लेना देना नहीं है बोले तो जितना भी करा धरा सब बेकार डूबते हुए जहाज के साथ की भी नहीं रुकता है।
नये तरह के मजदूर आईटी सेल कार्यकर्त्ता :- जब से सोशल नेटवर्क का चलन बड़ा है तब से एक नये तरह के पड़े लिखे मजदूर पार्टियों ने रख लिए है वो हैं “आईटी सेल कार्यकर्ता” इन बेचारे मजदूरों का एक ही काम होता है पार्टी कार्यालय में या फिर अपने ही खर्चे पर नेट पैक डालकर पार्टी /पार्टी के नेताओं की ऑनलाइन तारीफ़ करना और चमचागिरी से भरी पोस्टिंग करना और फिर जब चुनावों का समय आता है तो पार्टी एक “वॉर रुम” बनाती है जिधर पार्टी बाहर की किसी एजेंसी की सेवा लेती ही और उस एजेंसी को करोड़ों का भुगतान होता है और वह एजेंसी उसी धरातल पर अपनी दुकान खड़ा करती है जिस पर आईटी सेल के कार्यकर्ता और अन्य कार्यकर्ताओं ने जिसकी नींव डाली थी एजेंसी तो अपना भुगतान लेकर निकल जाती है चुनावों के बाद और अगर नेताजी और पार्टी जीत गयी तो नेता और पार्टी का आर्थिक उत्थान कार्यकर्ता का क्या ?
कार्यकर्ता का कुछ भी नहीं हाँ एक दिन पार्टी की और से कार्यकर्ताओं एकत्र करके नेता जी /मंत्री जी सबको गिद्ध भोज करा देंगे और कुछ चुने कार्यकर्ताओं के साथ फोटो खिंचवा लेंगे कार्यकर्ता उस फोटो को देख कर जिंदगी गुजार लेगा और नेता जी उस मूर्ख के कारण विदेशी गाड़ियों में घूम लेंगे,हाँ कुछ बड़े नेताओं नें अपने कुछ कार्यकर्ताओं के लिए कुछ हटकर काम भी किया है एक पूर्व केंद्रीय मंत्री थे जो अब स्वर्गीय हो गए है उनकी कई शहरों में कई महिला मित्र थीं और महिला मित्रों के भूलवश वे गर्भवती भी हो गई तो उक्त नेता जी नें अपने खास कार्यकर्ताओं से उनका विवाह सम्पन्न करा दिया और विवाह हो गया तो आर्थिक जरूरत भी पूरी होनी थी तो उनको इतना आर्थिक रूप से सदृढ़ किया की आज वे अपने अपने  नगरों के धन्ना सेठ बने हुए है यहां भी कार्यकर्ता का इस्तेमाल ही हुआ।
इन राजनीतिक दलों के पास इतना पैसा होता है सम्बन्ध होते हैं तो क्या ये अपना पैसा लगाकर कार्यकर्ताओं को रोजगार या स्व-रोजगार की व्यवस्था नहीं करा सकते ? अगर नहीं तो आम जनता काहे को इनके लिए मुफ्त के मजदूर बनने को उतारू हैं ?

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I am Brajesh Arya

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