Breaking News

मुसीबत बनता Social Media!

Hello MDS Android App

सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है, जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़ने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है। सामाजिक मीडिया के व्यापक विस्तार के साथ-साथ इसके कई नकारात्मक पक्ष भी उभरकर सामने आ रहे हैं।
सोशल मीडिया के माध्‍यम से आपस में हज़ारों लोगो एक दूसरे से जुड़ गए हैं। एक ऐसा मित्र जो आपसे कई सालों से न मिला हो फेसबुक के माध्यम से पल भर में आपके संपर्क में आ जाता है। कोई अपना जिसे आप ढूँढ़ना चाहते हैं वह हो सकता है इस मीडिया पर आपसे टकरा जाये। सोशल मीडिया पर हम अपने विचार किसी भी विषय पर अपने मित्रो के बीच रख सकते हैं और वाहवाही लूट सकते हैं। आप फोटोग्राफ ,सन्देश,वीडियो आदि भी शेयर कर सकते हैं। कोई अभियान चलाकर आप जनता एवं मित्रों की राय जान सकते हैं। सरकारी एजेंसिया कई अभियान जैसे मतदान प्रचार में भी प्रत्य़क्ष -अप्रत्य़क्ष रूप से इस माध्‍यम का लाभ ले रही हैं। लोकतंत्र के विकास में सोशल मीडिया कारगर सिद्ध हो रहा हैं। कई राजनैतिक दल के प्रतिनिधि जनता को अपने द्वारा कराये गए विकास कार्यो की जानकारी इस पर साझा कर रहे हैं। जनता पर सब जानकारी सीधे पहुँच रही हैं। यह सोशल मीडिया का फायदा ही है कि कोई भी विषय सोशल मीडिया में चर्चित होते ही सरकारी अथवा गैरसरकारी संस्था उसको संज्ञान में लेती है। अपनों से संवाद करने पर एक मानसिक संतोष मिलता है कि जो हमसे दूर हैं वे इतने दूर भी नहीं हैं। यह सोशल मीडिया का एक फायदा ही है।
सोशल मीडिया पर अनेक तरह के लोग एवं संगठन सक्रिय हैं। कई लोग इसका गलत इस्तेमाल भी करते हैं। आपके बारे में जानकारी जुटा कर उसका इस्तेमाल इसके माध्यम से करके आपकी व्यक्तिगत छवि को ख़राब करते हैं। इस मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल करना आपके एवं आपके साथी के बीच आशंकाएं भी पैदा कर देता है ऐसा समाज में देखा जा रहा हैं। कई लोग आपके द्वारा पोस्ट की गई फोटोग्राफ्स को सॉफ्टवेयर की सहायता से परिवर्तित कर उसका दुष्‍प्रचार करते हैं। यहां पर पर ऐसे मित्र न बनाएं जिन्हें आप जानते नहीं हैं इनकी प्रोफाइल फर्जी हो सकती है जो आपको नुकसान पहुँचा सकती हैं। सोशल नेटवर्किंग सर्विस फेसबुक के अनुसार काफी बड़ी संख्‍या में प्रोफाइल फेसबुक पर फर्जी हैं। सोशल मीडिया आभासी दुनिया का नेटवर्क है यह असल जीवन या जिंदगी के नेटवर्क का विकल्प नहीं हैं इसको भी हमें समझना पड़ेगा। इस नए मीडिया ने संवादहीनता खत्म तो की हैं लेकिन असल जिंदगी के रिश्तो जिसमें आपके दोस्त, आपके पडोसी,आपके रिश्तेदार जो जरूरत पड़ने पर आपके काम आते थे को भी कहीं ना कहीं आपसे दूर भी किया हैं। अब आप उन्हें उतना समय नहीं दे पाते जितना आप पहले दे पाते थे।
नकारात्मक एवं सकारात्मक सोच के लोग इसी समाज में रहते हैं सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस सोच के साथ एवं कैसे किया जाये समाज में यह हमें ही तय करना है इतना जरूर है कि हम सबको थोड़ी सावधानियाँ जरूर बरतनी होगी सोशल मीडिया को इस्तेमाल करते वक़्त।
आज मीडिया के सामने टीआरपी एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। संविधान का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया की सोच आख़िर इतनी छोटी कैसे हो गई ?अगर दुनिये भर के इस्लामिक देशों की मीडिया पर एक नज़र डालें तो पता चलता है कि किसी और चीज़ में ना सही लेकिन मनमानी करने में भारतीय मीडिया सबसे आगे है। बेशक इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि मीडिया के जरिए राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में पारदर्शिता आई है, राइट टू इन्फोर्मेशन , राइट टू एजूकेशन जैसे अधिकार भारतीयों के हित को ध्यान में रखते हुए लागू हुए। काले धन और देश में दिन प्रतिदिन बढते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त मुहिम चलाने में मीडिया का यागदान मील का पत्थर साबित हो रहा है। सत्ता के फेरबदल में  भी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन जैसे-जैसे मीडिया की स्वतंत्रता बढ रही है वैसे-वैसे इसके दायके भी बढते जा रहें हैं।
TWITTER, FACEBOOK, HI 5, GOOGLE +  जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट ने मीडिया के ढांचे को ही बदल दिया है। गुजर गए वो दिन जब जनता खबरों के लिए सुबह और शाम के समाचार पर निर्भर रहती थी सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए आज मीडिया और ऑडिएंस के बीच का दायरा काफी कम हो गया  है। लेकिन सवाल उठता है कि दिनबदिन कम होता दायरा समाज के लिए कितना खतरनाक या फायदेमंद साबित हो सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस कम  होते दायरे की आंढ में मीडिया अपनी कोताही को छुपाने की कोशिश कर रही है। अफवाहों के कारण कर्नाटक में उत्तरी पूर्व जनता के बीच हुई अफरातफरी ने सोशल मीडिया के गैरजिम्मेदार रवैये को उजागर कर दिया है। हज़ारों की तादाद में लोग अपना घरबार छोड़ कर पलायन करने पर मजबूर हो गए।
इस घटना से ये सिद्ध हो गया है कि सोशल मीडिया के इस तरह के ग़ैरजिम्मेदार रवैये पर अंकुश लगाना कितना जरुरी है। मीडिया के आधुनिकीकरण में प्रचार या दुष्प्रचार का अंतर कहीं खो सा गया है। जहां एक तरफ ख़बर और सूचना के प्रति लोगों की बुद्धिजीविता उभर कर सामने आ रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ असमाजिक तत्व अवैध लाभ भी उठा रहें हैं। निजी स्वार्थ के लिए आधुनिकता और विकास का इस्तेमाल कहां तक जायज़ है, मीडिया के लिए अभी भी ये एक उलझी हुई गांठ है। समाज का आईना कही जाने वाली मीडिया किस तरह की मिसाल कायम कर रही है ये किसी से छुपा नहीं, कभी पेड न्यूज़ के नाम पे तो कभी कार्यक्षेत्र और मीडिया आधिपत्य के नाम पर, देश की मीडिया के कार्यव्यवहार पर कई बार उंगलिया उठ चुकी हैं। लेकिन इस अनियमितता के लिए अकेले मीडिया को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। ख़बरों के उचित प्रचार प्रसार के लिए सुनियोजित अर्थव्यवस्था बहुत ही महत्वपूर्ण विभाग है और मीडिया के लिए पूंजी का प्रबंध हमेशा से एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसी चुनौती को पूरा करने की होड़ में मीडिया कुछ उन्हीं गिने चुने हाथों में आ गिरी है जो इसको अपने निजी स्वार्थपरता को पूरा करने में इस्तेमाल कर रहें हैं।
तालाब में रहना है तो मगरमच्छ से दोस्ती करनी ही पड़ेगी मीडिया की हालत भी कुछ ऐसी  ही हो गयी है। देश में हर तरफ विकास की एक लहर सी दौड़ रही है। हर क्षेत्र में सरकार पारदर्शी  और निष्पक्ष विकास के दावे कर रही है।भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया भर में सशक्त रूप से उभर रही है।दिन प्रतिदिन मजबूत होती इस अर्थव्यवस्था में मीडिया के जरिए खड़े किये गए विज्ञापन उद्योग के  योगदान को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। तो फिर आज मीडिया पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली क्यों बन कर रह गई है।इतिहास साक्षी है की  जिस देश की मीडिया जितनी मजबूत और आत्मनिर्भर होती उस देश का भविष्य उतना ही उज्जवल होता है। लेकिन भारत में मीडिया और मीडियाकर्मी दोनों के ही भविष्य को दरकिनार करके संविधान के उस चौथे स्तंभ के अस्तित्व को खोखला करने की शुरुआत हो चुकी है। इससे  पहले की धीरे धीरे बढती अराजकता हमारी व्यवस्था को पूर्ण रूप से निगल जाए हमें आरोप प्रत्यारोप की राह छोड़कर कुछ सक्रिय कदम उठाने चाहिए ।सिर्फ बातें ही नहीं समस्याओं का उचित हल भी खोजना चाहिए. तभी शाइनिंग इंडिया की चमक पूरी दुनिया को रौशन कर सकेगी।

इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है और हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी किसी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज भी किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसेआपकी वास्तविक जीवन में अभी मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और कॉलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढ़े, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।

मुसीबत बनता सोशल मीडिया?
सोशल मीडिया एक आफत बन गया है। हाल में मुरादाबाद में दंगे होते होते बचे, क्योंकि लोग व्हाट्सऐप पर एक वीडियो शेयर कर रहे थे जिस में 2 युवकों को ‘जय श्री राम’ बोलने के लिए पीटा जा रहा था। पहले तो पता ही नहीं चला कि वीडियो कहां का है पर जब पता चला तो इतने हाथों में गुजर चुका था कि घृणा का वायरस फैल चुका था। ऐसा ही एक मैसेज चल रहा है जो दर्शाता है कि 2050 तक आज की आबादी के 14.5% मुसलिम 50% हो जाएंगे। इस का कोई डैमोग्राफिक सुबूत नहीं है। आंकड़े यही बताते हैं कि मुसलमानों में भी आबादी की वृद्धि तेजी से घट रही है और मुल्लाओं की ज्यादा बच्चों की सलाह औरतें मानने को तैयार नहीं हैं। व्हाट्सऐप पर बेवकूफ बनाने वाले मैसेज भी धूम मचाए हैं। मैसेज आया, ‘यह लड़की जयपुर जंक्शन पर मिली है, इसे मातापिता से मिलवाने के लिए फोटो शेयर करो।’ लो जी अपने सभी ग्रुपों में भेज दिया बिना जानेपहचाने कि यह कहां, कब की बात है। पहले अब्दुल कलाम 2 बार गंभीर पड़े का समाचार घूमता रहा। हाल में एलिजाबेथ द्वितीय की मृत्यु हो गई। एक मैसेज घूम रहा है कि आस्ट्रेलिया ने मुसलिमों पर तरहतरह की पाबंदियां लगाईं जबकि ऐसा कुछ न हुआ।
व्हाट्सऐप और फेसबुक असल में अब घटिया संदेशों से इतने भर गए हैं कि यह सस्ती संवाद भेजने की तकनीक दिल्ली के चांदनी चौक की सड़क की तरह हो गई है जहां जो चाहे अपनी दुकान लगा ले और पैदल चलने वालों के लिए जगह न बचे। इन सोशल मीडिया प्लेटफौर्मों पर अब काम की बातें न के बराबर होती हैं। हां, कुछ प्रेरणादायक मैसेज भी चलते हैं पर उन पर ध्यान कौन देता है? अगर ध्यान दिया जाता तो दुनिया एक गांव बन चुकी होती, जहां एक आफत पर सैकड़ों सहायता के लिए खडे़ हो जाते। यहां तो यह विध्वंसक बन रहा है या जानेअनजानों को वह जानकारी देने के लिए जो भ्रामक और बहकावे वाली है। चौंकाने वाली बात यह है कि लोग भी झट से इन मैसेजेज पर विश्वास कर लेते हैं।
सरकारें इन्हें बंद नहीं कर सकतीं पर इन पर अंकुश लगाने का काम इन प्लेटफौर्मों को चलाने वालों का है। व्हाट्सऐप और फेसबुक का मुफ्त होना सब से ज्यादा खतरनाक है। हर मैसेज का वैसे ही पैसा लिया जाना चाहिए जैसे डाक वाले लेते हैं ताकि बेकार के संदेश भेजने की प्रवृत्ति कम हो। आधुनिक तकनीक का स्वागत है पर इस का न तो आणविक बमों के लिए इस्तेमाल हो न वाक बाणों के लिए।

Post source : Internet

About The Author

I am Brajesh Arya

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *