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मृत्यभोज को, आखिर क्यों हो रहा मृतयभोज का विरोध

आजकल सोशल मीडिया मृत्यु भोज का बड़ा विरोध हो रहा है, हैरत इस बात की अच्छे विद्वान लोग इस बात का विरोध करते  है। हमारे धार्मिक ग्रन्घ जैसे गरुड़ पुराण, पितृ संहिता, वेदों में अनेकानेक जगह यह वर्णित है कि मृत प्राणी, दिए गए भोजन का अंश मात्र या भाव स्वरूप विद्यमान उस भोजन का भाग ग्रहण करता है।

 पता नहीं क्यों लोग धर्म शास्त्रों का विरोध फैशन के रूप में करने लग गए हैं इसे अपव्यय के नाम से संबोधित किया जाता है। मृत्योपरांत भोजन कराना हमारे लिए धर्म ओर संस्कृति का अंग। शास्र अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राहमणों एवं बहिनें,बेटियों को भगवान का प्रसाद बना कर भोजन की आग देता है। उधार लेकर प्रदर्शन की नहीं।

अब भौतिकवादी घर के सदस्य की मृत्यु अन्तिम शोक सभा भी समसान में ही करते हैं। आगे कुछ नहीं। क्या ज़िन्दगी भर अपने साथ जीवन बिताने वाले को वहीं भूला दे। शादी समारोह के अवशर पर ओकात से ज्यादा का खर्च करते समय फ़ालतू की बातें भूल जाते हैं। यदि आपको अपव्यय की इतनी ही चिंता है तो शादी विवाह में जो हो रहे  अनावश्यक खर्चों में क्यों नहीं कटौती की बात करते??!!!
 क्यो वहां पानीपुरी, सलाद, विदेशीफ़ूड की स्टॉल्स नज़र आती है, मृत प्राणी के पीछे किया गया भोजन अन्न दान के रूप में आता है यह सभी धर्म एकमत से स्वीकार करते हैं कि अन्न दान से बड़ा कोई दान नहीं है अन्नदान- उस मृत व्यक्ति के पीछे अपने स्वजन, सन्यासियों या भूखे व्यक्ति को किया जाता है, इसमें किसी प्रकार का दिखावा या महंगा भोजन  नही होता।
आजकल हम लोग अपने उद्देश्य और अपने मूल कर्तव्य से भटक गए हैं शादी विवाह में जो अनावश्यक खर्चा किया जाता है उसमें निश्चित रूप से कुछ कटौती होनी चाहिए या फिर अपने अपने समाज के अनुसार लोगों को कुछ निश्चित खानपान तय कर लेना चाहिए इसके अलावा मृत्यु भोज मैं भी जो भी खाने को बनाया जाता है वह खानपान भी निश्चित कर लेना चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति शादी विवाह या मृत्यु भोज में बढ़-चढ़कर खर्चा दिखा कर दूसरों के सामने अपना जो प्रभाव दिखलाते हैं इस पर अंकुश लगाया जा सके।

मृत्युभोज से एक फायदा जो मैंने अनुभव किया है वह यह है कि लोगों का आपस में मिलना जुलना हो जाता है आपसी संवाद समाज के लोगों में बना रहता है वरना आज की टीवी और इंटरनेट की दुनिया में तो सारे रिश्ते नाते ही लोगों ने भुला से दिए हैं।
मैं सोशल मीडिया से जुड़े समस्त लोगों से निवेदन करता हूं कि कृपया ज्योतिष शास्त्र से जुड़े ब्राह्मणों और पंडितों के दिशा निर्देशों का गंभीरता के साथ एवं आवश्यक रुप से पालन करें और हमारी भारतीय संस्कृति की स्वच्छ एवं स्वस्थ परंपरा को बरकरार रखने में मदद करें और पाश्चात्य संस्कृति का समर्थन करने वालों का पुरजोर विरोध करें ताकि हम अपनी भारतीय संस्कृति को लगातार किसी न किसी रूप में लोगों को दिखाते रहे और हमारी आने वाली पीढ़ियां उससे जुड़ी रहे।
यहां यह बात भी विशेष ध्यान रखनी चाहिए कि  जिसकी हैसियत/औकात है वो तो मृत्यु भोज कर लेगा लेकिन जिसकी नहीं है वहां उधार ले कर करता है।जो वो काफी सालो तक चुकाता रहता है। ग्रामीणों में यह एक आम बात है। इसके साथ फिर अमल और बीडी अलग। पंडित और बाहाम्ण को जीमाना अलग बात है वो तो आप सामर्थ्य अनुसार भोजन करवा भी दोगए लेकिन पूरे गांव को जीमाना तो गलत है ना ।
शास्त्र में भी लिखा है कि भोज  खुश मन से कराना चहिए हैं।अब गरीब आदमी कर्ज लेकर मृत्यु भोज करायेगा तो बेचारा कहा से खुश होगा।और एक और बात जिस घर में किसकी मृत्यु हुई है जिसके ऊपर दुख आया है वो अपनी सारी चिंता भूलकर रूपयों का इंतजाम कर मृत्यु भोज करे यह कहा सही है।
इसके साथ साथ मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मृत आत्मा के पीछे अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करना, पंडितों को जीमाना भले कितने ही ११/२१ जो भी आप कि सामर्थ्य हो,सही है लेकिन अपनी चादर से बाहर निकलकर बहुत से लोगों को जीमाना भले वो उसके रिश्तेदार ही क्यो ना हो, गलत है और आप जैसे सम्मानीय व्यक्ति को लोगों का उचित मार्गदर्शन करना चाहिए।
यह आवश्यक नही है कि उधार लाकर भोजन करवाया जाए। शास्त्रो में उल्लेख की श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अन्न या भोज्य सामग्री दान करे। कीट पतंगों, गाय, एवम मूक प्राणियों का भी अंश उस प्राणी के निमित्त निकाले, जिसे गौग्रास पंचग्रास से संबोधित किया जाता है।

इस प्रकार के आयोजन की पीछे यह भी भाव है कि रिश्तेदार इकट्ठे हो , दुःख और मृत प्राणी की स्मृतियां साझा करें। दिखावे का विरोध करे, मृत्यु भोज का नही, गरुड़ पुराण के अनुसार एक वर्ष में मृत प्राणी का शरीर पुनः बनता है, और यह भोजन सूक्ष्म रूप से प्राणी तक पहुचता है। अनेक वैज्ञानिक शोध द्वारा भी यह बात प्रमाणित/सिद्ध हो चुकी हैं।
।।शुभम भवतु।। ।।कल्याण हो।।
पंडित विशाल दयानन्द शास्त्री” [email protected]

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