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ये कैसा विकास और सामाजिक सुरक्षा कि सडक चलता छात्र खुले चेम्बर में समा जाए!

सोशल मीडिया पर आज एक दिल दहलाने वाला विडियो देखा विडियो में एक स्कूली छात्र बरसते पानी में बिजली के खंभे के पास खुले तारों से बचते हुए निकलता है और सडक पर भरे पानी में कुछ कदम चलते ही अदृश्य हो जाता है जी हाॅं वह सडक पर खुले नाले के उस चेम्बर में समा जाता है जो उसे सडक पर भरे पानी के कारण दिखाई नहीं देता है लेकिन जाको राखे सांईयाॅं मार सके ना कोई कहावत एक बार पुनः चरितार्थ होती दिखाई देती है वीडियो के अगले भाग में एक लडके कि सूझबूझ और समझदारी परिलक्षित होती है वह उस बालक के चेम्बर में जाते ही उस दिशा में दौडता है जिस तरफ नाला बहता है और करीब 50 या 100 मीटर आगे जाकर जब वह नाला खुला हो जाता है एक अन्य व्यक्ति अपनी पूरी ताकत लगाकर उस बालक को नाले में से उपर खींच लेता है। इन दिनों जबकि मानवता को शर्मसार करते अनेक चित्र और विडियो सोशल मीडिया पर चलते हैं और दुर्भाग्य से ट्रेंड भी करते हैं। ऐसी स्थिति में उक्त दिल दहलाने वाला विडियो जहाॅं नागरिकों की सूझबूझ और समझदारी का परिचायक बन दिल को छू गया वहीं इसी विडियो ने कई सारे प्रश्न मन मस्तिष्क में खडे कर दिये जो हमारे विकास और सामाजिक सुरक्षा पर प्रहार करते हैं। हम सभी अपने बच्चों को स्कूल या अन्य गतिविधयों के लिये बाहर भेजते हैं और उनके सकुशल घर लौट कर आने की भगवान से प्रार्थन करते हैं यह स्वभावगत बात है और ऐसा सभी माता पिता और परिवार के सदस्य तथा स्नेहीजन करते हैं लेकिन जिन लोगों के भरोसे पालक अपने नौनिहालों को घर से बाहर निकलने देते हैं उनकी अपने कर्तव्य के प्रति की गई लापरवाही की सजा किसी को कितनी बडी भुगतनी पड सकती है इसका उत्तर किसी के भी पास नहीं है। मुझे नहीं पता कि सोशल मीडिया पर चल रहा वह विडियो कहाॅं का है और कौन से स्थानीय प्रशासन को इसके लिये जिम्मेदार ठहराया जाएगा? जिम्मेदारी तय की भी जाएगी कि नहीं अभी तो यही प्रश्न है? लेकिन इस भयानक विडियो को देखकर यह तो ध्यान में आया कि अपने नौनिहालों को सडक पर बरसते पानी के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों के प्रति अलग से प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है क्योंकि लाईट के खंभे के तार खुले रखने वाले उस लाईनमेन का, सडक पर पानी भरने की समस्या का जिम्मेदार सडक निर्माता ठेकेदार का और स्थानीय प्रशासन के उस कर्मचारी का जिसने सडक पर चेम्बर को खुला छोड दिया और विकास के नाम पर और सामाजिक सुरक्षा के नाम पर सजग प्रहरी होने का दावा करने वाले प्रशासन का कुछ नहीं बिगड रहा। बिगडेगा तो उनका जिसके परिवार को कोई सदस्य ऐसी किसी घटना का शिकार होगा जिसकी उसे कल्पना मात्र भी नहीं होगी लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यहाॅं उपस्थित है कि किसी और की लापरवाही कि सजा कोई क्यों भुगते? हम आए दिन सुनते रहते हैं कहीं बच्चा बोरवेल में गिर गया, कहीं सडक के किनारे खडे बुजुर्ग को कोई टक्कर मार गया तो कभी किसी धार्मिक स्थल पर भगदड मचने से कोई दुर्घटना हो गई। विकास के वे सारे दावे और कार्य तब तक बेमानी हैं जब तक उनकी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के साथ आम नागरिकों की सुरक्षा को ना जोडा जावे। अनियंत्रित और बिना भविष्य की परिस्थितियों का आकलन किये बनाई गई विकास की सभी योजनाऐं हमारे सामने तब ध्वस्त हो जाती हैं जब एक स्कूली छात्र चेम्बर में गिर जाता है। सभी विभाग सामान्यतः प्री मानसून एक्सरसाइज करते हैं लेकिन उसमें जरा सी गैर जिम्मेदारी कितनी बडी दुर्घटना को जन्म दे सकती है इसका अंदाजा जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों को लगाना होगा और अधूरा काम कितना छोडना इसकी सीमाऐं तय करनी होंगी। भगवान की कृपा रही और लोगों ने अप्रतिम सूझबूझ और फुर्ती का परिचय दिया और मानवीयता के अपने नैसर्गिक भारतीय गुण को जीवित रखते हुए एक परिवार के चिराग को बुझने से बचा लिया उनको सभी को प्रणाम करते हुए घटना से सभी को सबक लेने का आग्रह किया जाना चाहिये और प्रशासन पता नहीं कब इन चेम्बरों को ढॅंकेगा लेकिन अपने नौनिहालों को कम से कम बरसते पानी में सडक पर चलते समय सावधानी बरतने के तरीके तो हमको सीखने ही पडेंगे।

Post source : Kshitiz Purohit

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