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ये रिश्ता क्या कहलाता है..! – प्रकाश भटनागर

काफी पहले एक कहानी पढ़ी थी। उसका मुख्य पात्र इस बात से लगातार परेशान रहता है कि वह खुश नहीं है। इस समस्या से निपटने की गरज से उठाये गये उसके सारे कदम नाकाम रहते हैं। वह खुद को जानबूझकर हंसी का पात्र बनाता है। दूसरों पर हंसने का कोई मौका नहीं चूकता है। यहां तक कि पति के खुश होने की खातिर उसकी अद्र्धांगिनी भी व्रत रखने का संकल्प ले लेती है। अंतत: एक समझदार बुढिय़ा से उस आदमी का सामना होता है। जो बताती है कि खुश इसलिए नहीं हो पा रहा कि उसने दु:ख देखा ही नहीं है। यह सत्य जानते ही आदमी इस बात के लिए परेशान होने लगता है कि आखिर वह दु:खी क्यों नहीं है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कल कह दिया कि वह कभी भी गुस्सा नहीं होते। बात की सोदाहरण व्याख्या की गरज से उन्होंने यह भी कह दिया कि जब उन्हें भाजपाई शिवराज सिंह चौहान पर ही क्रोध नहीं आता है तो भला कांग्रेसी ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह भाव वे किस तरह अपना सकते हैं। बात रोचक है। लेकिन सत्यान्वेषण की मोहताज भी है। क्योंकि शिवराज पर उन्हें गुस्सा न आना उतना ही सही तथ्य है, जितना बड़ा झूठ यह कि मुख्यमंत्री को सिंधिया पर क्रोध नहीं आया

दिल्ली में मीडिया से सिंधिया के लिए ‘..तो उतर जाएं’ वाली बात नाराजगी का सीधा प्रतीक थी। खैर, बाकी मौकों पर मुख्यमंत्री को नागवारी का भाव अपनाने की जरूरत ही कहां पड़ी है। अपने हों या पराये, सबके बीच वे पूरी सुविधा से रहे हैं। दिल्ली दरबार में संजय गांधी से लेकर राहुल गांधी तक किसी ने भी उन्हें गुस्सा नहीं दिलाया। यहां तक कि पंजाब के प्रभारी महासचिव पद से नाथ की बहुत जल्दी हुई रुखसती भी शालीनता के साथ उठाया गया वह कदम था, जिसमें उनके अहं का पूरा-पूरा खयाल रखा गया था। जब तक वह दिल्ली की सियासत में सक्रिय रहे, तब तक मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमान संभालने वाले किसी भी गुट के नेता की हिम्मत नहीं हुई कि कार्यकारिणी में उनके लोगों की उपेक्षा की जाए। किसी भी पदाधिकारी ने यह हिमाकत नहंी करी कि विधानसभा या लोकसभा के टिकट वितरण में उनके खेमे को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिले। मुख्यमंत्री कोई भी रहा हो, नाथ के विधायक मंत्रिमंडल में सम्माजनक स्थान हमेशा से पाने में सफल रहे। ऐसे में किसी नाराजगी की स्थिति ही कहां बन पायी।

इसलिए हमारे मुख्यमंत्री मनुष्य के दिमाग की शांति एवं शरीर की शक्ति के दुश्मन इस भाव से हमेशा से बचे रहे हैं। आचार्य नरेंद्र देव के लिए स्कूली पाठ्य पुस्तक में एक वाक्य पढ़ा था, ‘ऐसे लोग बिरले होते हैं, जिनके शत्रु भी उनका सम्मान करें।’ नाथ के शत्रु भी उनका सम्मान करते हैं, यह तो ठीक-ठीक नहीं लिखा जा सकता। किंतु इतना तो लिख ही सकते हैं कि उन्हें शत्रुओं का भी भरपूर साथ मिलता आ रहा है। कहा जाता था कि मुख्यमंत्री पद के लिए नाथ की दावेदारी का सोनिया समर्थन कर रही थीं, किंतु नये खून को मौका देने के हिमायती सिंधिया के पक्ष में थे। फिर हुआ यह कि खुद राहुल ने ही न सिर्फ नाथ को मुख्यमंत्री बनाया, बल्कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर उनके कार्यकाल को भी अब तक सुरक्षित रखा है। राहुल तो तब भी पार्टी के ही थे, किंतु उदाहरण इससे अधिक सटीक भी हैं। मसलन, मध्यप्रदेश में कांग्रेस को मिले कंपकंपाते बहुमत के बाद यह तय माना जा रहा था कि ऐसे हालात के मंझे हुए खिलाड़ी अमित शाह विधायकों को तोडक़र फिर से सत्ता भाजपा की झोली में डाल देंगे। शिवराज सिंह चौहान पूरे दम के साथ शपथ लेने की तैयारी में थे।

नरोत्तम मिश्रा तो दिल्ली जाकर इस बात का आशीर्वाद लेने की गोटी भी फिट कर आए थे कि वे विधायक दल के नेता बनने के लिए हर तिकड़म आजमा लें। लेकिन फिर यकायक जिस तरह इन्हीं नरोत्तम के साथ शिवराज ने राज्यपाल को त्यागपत्र दे दिया, उससे साफ है कि नाथ के खिलाफ भाजपा की कोशिशों को इस दल के शीर्ष से ही मंजूरी नहीं दी गयी। वह भी तब, जबकि भाजपा ने मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकारें गंवा कर खुद की कमजोरी का परिचय दे दिया था। और देखिए। यह कैसे हो गया कि जिस लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में मोदी-लहर साफ दिख रही थी, उसी राज्य में छिंदवाड़ा सीट नाथ के बेटे नकुल के पास चली गयी। इस प्रश्न का उत्तर आज तक नहीं मिल पाया है कि क्यों कर भाजपा ने नाथ की इस परम्परागत सीट से इतना कमजोर प्रत्याशी उतारा कि नकुल आसानी से जीत गये। ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ वाले इस ऐपिसोड में यह याद दिलाना भी बहुत जरूरी है कि शिवराज ने बतौर विपक्षी नेता खुद को भले ही बार-बार ‘टाइगर’ कहा हो, किंतु इस जीव जैसी आक्रामकता का परिचय उन्होंने नाथ के खिलाफ न के बराबर ही दिया है।

राज्य विधानसभा में भी नाथ के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष बनाये गये गोपाल भार्गव को आरम्भ से ही आवश्यक ताकत से वंचित रखा गया। जिस प्रदेश भाजपा पर मौजूदा सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने का बड़ा जिम्मा था, उसी भाजपा की कमान सरकार बनने के एक साल से अधिक बाद तक राकेश ङ्क्षसह के पास ही रखी गयी। सिंह ने भी कुछ ऐसी शैली में काम किया कि अपने पूर्ववर्ती नंदकुमार ङ्क्षसह चौहान की कार्यकारिणी में रत्ती भर भी बदलाव करने में उन्होंने रुचि नहीं ली। जबकि यह वही कार्यकारिणी थी, जिसकी गये विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार में बड़ी भूमिका रही। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर बदलाव केवल तब किया गया, जब विधानसभा में नाथ स्पष्ट बहुमत हासिल कर सुरक्षित सरकार का संचालन करने लगे हैं। अब ऐसे हालात के बीच नाथ को गुस्सा भला आएगा कहां से! आरंभ में बतायी गयी कहानी के अंत में सयानी बुजुर्ग महिला मुख्य पात्र को बताती है कि चूंकि वह कभी दु:खी नहीं हुआ, इसलिए सुख का भान नहीं कर सकता है। इन पंक्तियों में ‘किसी बुढिय़ा’ वाली बात से किसी का मन दुखा हो तो माफ करें, किंतु यह तो लिखा ही जा सकता है कि नाथ को गुस्से का गणित समझाने के लिए पार्टी में किसी सयाने की जरूरत बहुत शिद्दत से महसूस की जाने लगी है। क्योंकि राजनीति में यदि दुश्मनी स्थायी नहीं है तो दोस्ती भी हमेशा वाला भाव नहीं रहती है।

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