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योग एक विज्ञान – जीवन जीने की एक कला

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(डाॅं. घनश्याम बटवाल, मंदसौर) प्राचीन भारत -पौराणिक महत्व के भारत की विरासत ‘‘योग‘‘ विश्व पटल पर स्वीकार्य हो मान्यता प्राप्त कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकांश सदस्य राष्ट्र 21 जून को ‘‘‘‘ सामुूहिक रुप से मना रहे है। सन् 2016 में अन्तर्राष्ट्री योग दिवस पर विश्व के 120 से अधिक देशों में ‘‘सामूहिक योग‘‘ कर दिवस संपादित हुआ। और देश केे प्रधानमंत्री सहित 84 देशों के प्रतिनिधित्व सहित कोई 36 हजार लोगों ने राजपथ -नई दिल्ली में योग किया जो एक रिकार्ड है। इस बार भी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 21 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 50 हजार से अधिक विभिन्न भाषा और धर्म को मानने वाले एक साथ सामूहिक योग प्रदर्शन कर रहे हैं।
महर्षि पतंजलि ने योग के 195 सूत्रों को प्रतिपादित किया था, जो ‘‘योगदर्शन ‘‘ के स्तंभ माने गये हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (ूीव) भी योग के प्रचार -प्रसार में सहभागिता कर रहा है। देश में केन्द्र व राज्य सरकारे भी विधिवत रुप से पाठ्यक्रम मैं ‘‘योग शिक्षा‘‘ को शामिल कर रही है। निजी क्षेत्र और कार्पोरेट क्षेत्र में भी ‘योग ‘ को महत्व दिया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय तथा राज्यो के स्वास्थय तथा शिक्षा विभाग,देश तथा विदेशांे में भारतीय केन्द्रो के साथ मिलकर योग को नियमित करने की दिशा में काम कर रहे है। व्यापक स्वीकार्यता और सैद्धांतिक तथा वैज्ञानिक रुप से मानव शरीर में होने वाले मानसिक और शारीरिक लाभ के चलते ‘‘योग ‘‘ पहली पसन्द बनता जा रहा हैं

योग क्या है ?

योग एक एसी शारीरिक और मानसिक क्रिया है जिससे आप अपने समीप वातावरण के साथ स्वयं को स्वस्थ्य रख सकते है। हावर्ड मेेडिकल स्कूल और मैसाच्यूसेट्स के हाॅस्पिटल के विशेषज्ञ वैज्ञानिकों के अनुसार प्रमाणित किया है कि योग मुद्रा ध्यान ओैर योग तनाव, अवसाद ,कमजोरी, रोग प्रतिरोधक्षमता, नपंुसकता, बुढापा आदि अनेक रोगों पर नियंत्रण के साथ कार्यक्षमता वृद्धि मे भी कारगर सिद्ध हुआ है।योग एक विज्ञान हैं जो आध्यात्मिक अनुशासन में बांधता है। शरीर और मन -मस्तिस्क में समरसता स्थापित करता है। मान्यता है कि शरीर रोग मुक्त होना ही पूर्णता नहीं हैं,
वास्तव में शारीरिक और मानसिक तंदरुस्ती स्थापित कर रोगों का निदान करता है यही योग कहलाता है। प्रकृति और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़ा है योग जो मानव मात्र के लिये सार्थक उपयोगी बन गया है।

आसन और व्यायाम ही योग नहीं

सामान्यतया आसन तथा व्यायाम को योग मान लिया जाता है यह सही नहीं है। दैनन्दिन जीवन में शारीरिक -मानसिक एक्सर साईज अधिकांश लोग करते है। प्रातः या सायंकाल जैसा अनुकुल हो व्यायाम -विभिन्न आसन आदि करने के साथ ध्यानपूर्वक सूर्य नमस्कार प्राणायाम, मेडिटेशन, कपालभाति, अनुलोम -विलोम, भस्त्रिका, सुदर्शन क्रिया आदि जैसी परिस्थिति की जाती है।
योग साधना के आठ अंग माने गये हैं जिनमें प्राणायाम को चतुर्थ सोपान माना है। इसके बाद प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि को मानसिक साधना माना है। सम्पूर्ण योग क्रिया -प्रक्रिया के मध्य प्राणायाम दोनों मानसिक और शारीरिक साधनाओं का माध्यम माना है। व्यायाम -आसन -प्राणायाम और ध्यान से शरीर तथा मन दोनों पवित्र तथा शांत होते है।

सर्व स्वीकार्य होता योग

योग सहज साध्य सर्वसुलभ और परिणाम मूलक क्रिया है जो अन्ततः लाभकारी सिद्ध हुई है। इसे हर आयुवर्ग के लोग, बच्चे, बुढ़े, युवा,महिला पुरुष सहजता से कर सकते हैं।
मनुष्य की वृत्तियों, चित्त को शुद्ध करता है योग, मन का क्लेश दुर करने में सहायक हैं योग, आत्मा से परमात्मा के मिलन का मार्ग है योग, ‘‘गीता‘‘ के अनुसार सुख:दुख, हानि-लाभ, जय -पराजय, यश -अपयश की स्थितियों में जो सम रहता है, शांत रहता है वह योगी है। भौतिकता और विलासिता पूर्ण उपभोग के बाद एक उपराम जीवन में आता है। इसमें सहायक है योग। अवश्य ही तीसरी दुनिया के देशों की बहुसंख्य आजादी प्राथमिक सुविधाओं और संसाधनो से वंचित हैं भारत सहित अन्य देशों में भी बड़े भू भाग में बुनियादी सुविधाएं -प्रसाधान नहीं हैं एसे विषम समय में मानसिक सन्तुलन शारीरिक स्थिरता और सुदृढ़ भविष्य के लिये उपयोगी हैं ‘योग‘ यह पेट नहीं भर सकता, मकान नहीं दे सकता परन्तु शुकुन अवश्य दे सकता है। श्रीमद् भागवत गीता में ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग को महत्ता प्रदान की गईं जो हजारों सालो के बाद आज भी प्रांसगिक, सार्थक और उपयोगी है। अत्यन्त नीजी रुप से भी योग किया जा सकता है,विशेषज्ञ की निगरानी में भी किया जा सकता है योग, और स्वयं के लाभ के लिये भी किया जा सकता है। योग की इसीलिए स्वीकार्यता बढ़ी, और हर वर्ग हर धर्म में हर देश में हर भेष में हर सन्देश मे योग मिलकर महायोग बन रहा है।

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