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रहवासियों का मिड इंडिया अण्डर ब्रिज निर्माण का सपना कभी पुरा होगा या नहीं और होगा तो कब होगा- स्पष्ट करें जनप्रतिनिधि-बंशीलाल टांक

ब्राडग्रेेज बनने के बाद प्रति 15-20 मिनिट में रेलों की आवाजाही से मिड इण्डिया फाटक बन्द हो जाता है जिससे पटरी पार की लगभग 25-30 कॉलोनियों के लगभग 30 हजार रहवासी कठिन परिस्थितियों में एक-दो नहीं लगातार 12 वर्षों से कितनी पीड़ा-कष्ट सहन करते आ रहे है यह किसी से छुपा नहीं हैं कॉलोनी वासी समस्त पीड़ा-दुःख-दर्द-कष्ट एक ही आस-विश्वास-भरोसे पर सहते आ रहे है कि उन्हें 12 वर्षोें से रेल्वे तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा हर हालत में अण्डर ब्रिज निर्माण का जो आश्वासन दिया जाता रहा है वह निश्चित तौर पर पूरा होगा परन्तु इसके बाद रेल्वे द्वारा कभी हॉ कभी ना कह देने से अभी तक रहवासी सुविधा के स्थान पर असंमजंस की दुविधा में ही रहने को मजबूर बने हुए है कि आखिर यह अंडर ब्रिज बनेगा तो कब बनेगा।
रेल लाईन के भविष्य में होने जा रहे दोहरीकरण को लेकर 5 सितम्बर को मिडिया में खबर छपी थी कि मिड इंडिया फाटक पर चित्तौड़गढ-रतलाम लाईन के दोहरीकरण को लेकर अण्डर ब्रिज अभी नहीं बनेगा। दोहरीकरण होने के बाद 2-3 वर्ष में बनने की संभावना दशाई गई थी। यह भी उल्लेख था कि अण्डर ब्रिज के लिये 50 प्रतिशत राशि रेल्वे को राज्य शासन तथा स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रदान किये जाने के हुए अनुबंध के अनुसार राज्य शासन ने 3.65 करोड़ राशि स्वीकृत कर प्रथम किस्त के रूप में 1 करोड़ की राशि नगरपालिका मंदसौर को भेज दी गई जिसे नगरपालिका ने रेल्वे को जब हस्तांतरित करना चाहा तो रेल्वे ने लेने से इंकार कर दिया।
जिस प्रकार रेल्वे बोर्ड ने चाहा था सम्पूर्ण प्रक्रिया राज्य शासन तथा स्थानीय स्तर पर नगरपालिका एवं जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर पूरी की जाती रही है परन्तु फिर से रेल्वे के द्वारा 2 से 3 साल (निश्चिंत नहीं) तक और नहीं बनने के समाचार से कॉलोनीवासियों को फिर से यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि केन्द्र से लेकर राज्य ओर स्थानीय शासन में स्पष्ट बहुमत से बीजेपी की सरकार होते हुए भी रेल्वेे का इस प्रकार का ढुलमूल रवैया अपनाने से यह समझ में नहीं आ रहा है कि भारत सरकार का रेल्वे बोर्ड केन्द्र सरकार के अधीन है अथवा केन्द्र, राज्य और स्थानीय तीनों रेल्वे के नियंत्रण में चल रहे है।
रेल्वे द्वारा पटरी दोहरीकरण को लेकर फिलहाल नहीं बनाने का जो बहाना बनाया है क्या रहवासी इतना भी नहीं जानते कि जहां साधारण नालों पर नहीं बल्कि नदियों पर ब्राडग्रेज लाईन से पहले एकल लाईन होकर उन पर जो पुल बने हुए थे वह दोहरी लाईन होने के पश्चात् उनमें सुधार हुआ कि नहीं। तो क्या फिर इस पटरी पर दोहरीकरण होने पर अण्डरब्रिज में क्या पुनः सुधार नहीं किया जा सकता परन्तु ‘‘नाच न जाने आंगन टेड़ा’’ की कहावत अनुसार 12 साल तक कभी हाँ-कभी ना के झूले में जनता को झूलाते रहने के बाद दोहरीकरण के नाम पर झूला उतारकर फेंक देने से पीड़ित रहवासियों की मानसिकता को जो आघात पहुंचा है इसे क्या रेल्वे कभी संज्ञान में लेने का ईमानदारी से प्रयास करेगा।
5 सितम्बर के समाचार के बाद तीसरे दिन 8 सितम्बर को अण्डर ब्रिज को लेकर मिडिया में पुनः समाचार प्रकाशित हुए कि सांसद श्री सुधीर गुप्ताजी ने मुम्बई पश्चिम रेल्वे महाप्रबंधक श्री अजीत कुमार गुप्ता से रहवासियों की पीड़ा के संबंध में चर्चा की जिसके अनुसार ब्रिज निर्माण शिध्र प्रारंभ किया जावेगा यह समाचार सांसदजी के वक्तव्य के द्वारा प्रकाशित हुआ परन्तु इसी माह 19 सितम्बर को पुनः तीसरी खबर मीडिया द्वारा संज्ञान में लाई गई कि फिलहार मिड इंडिया ब्रिज ठंडे बस्ते मे ंचला गया है। इस समाचार के साथ ही पुनः सांसद श्री गुप्ता ने पहल करते हुए उनका वक्तव्य फिर छपा कि ‘‘यह प्रोजेक्ट लेट नहीं होगा, अण्डर ब्रिज तो जल्दी ही बनेगा’’ फिर प्रश्न वहीं खड़ा हो गया कि ‘‘शिघ्र’’ और ‘‘जल्द’’ ढाई और दो अक्षरों के ये शब्द सुनने में तो अच्छे लगते है परन्तु रेल्वे की मेहरबानी से आखों को अच्छे लगने के लिये मूर्त रूप ये कब लेंगे ? 12 साल निकल गये और आखिर में कब तक मुगालते-धोखे-भ्रम में रहकर बिना कोई पाप किये मिड इण्डिया गेट के बन्द होने के महाअभिशाप की यातना-पीड़ा से पीड़ित-दुःखित-अभिशप्त होते रहेंगे रहवासी ?
यदि रेल्वे अधिकारी एवं संबंधित जनप्रतिनिधि जहां निवास कर रहे है वहां से साल, दो साल अथवा एक-दो माह के ज्यादा समय नहीं केवल एक सप्ताह ही पटरी पार अभिनन्दन तरफ किसी भी कॉलोनी में परिवार सहित आकर बस जाये और तब प्रसंगवश किसी अत्यन्त आवश्यक आकस्मिक कार्य आने पर पटरी पार दोपहिया अथवा चार पहिया वाहन से मिड इंडिया फाटक लांघ कर उन्हें जाना पड़े और उस समय गेट बंद हो तब उन्हें जो मानसिक वेदना होगी उससे स्पष्ट आभास हो जायेगा कि वास्तव में इस पार के रहवासी किस प्रकार लगातार 12 साल से मानसिक पीड़ा सहते आये होंगे।
19 सितम्बर के समाचार में यह भी छपा था कि एक पक्ष अण्डर ब्रिज की ऊँचाई कम नहीं करने देना चाहते और दूसरा सड़क खोदना नहीं देना चाहते। समाचार का शीर्षक था ‘‘दो बड़ों की चिन्ता में 25 हजार जनता की सुविधा ताक पर’’ से आम जनता जानना चाहते है कि यह दो बड़े कौन है जो लगभग 25 हजार रहवासियों की प्रतिदिन, प्रति घण्टे की परेशानियों को दूर करने में सहभागी बनने के बदले रोकने की अहम भूमिका को निभाते हुए अनावश्यक रोड़ा बने हुए है उनके नाम का भी स्पष्ट खुलासा होना चाहिये जिससे जनता यह जान सके कि वै उनके दुःख दर्द में कितने हमदर्द है।
कभी पटरी के दोहरीकरण को तो कभी ऊँचाई, कभी निचाई (नीचे) किये जाने के झमेले में न तो ब्रिज ऊँचा करने का ना नीचे करने का निर्णय हो पा रहा है। उल्टा नहीं बनने के समाचार जरूर है। समझ में नहीं आ रहा है कि मिड इण्डिया का यह अण्डर ब्रिज कभी अपने वास्तविक धरातल-स्वरूप में आ भी पायेगा या फिर त्रिशंकु की तरह धरती और आकाश के बीच मे यूं ही लटकता-झूलता रहेगा।
इसके बनने का 12 साल का रहवासियों का सपना कभी पुरा भी होगा या हमेशा के लिये सपना- सपना ही बनकर रह जायेगा।
पटरी पार के रहवासियों द्वारा 21 सितम्बर संध्या को संबंधितों को सद्बुद्धि प्रदान करने के लिये सद्बुद्धि दीप यज्ञ कर विरोध प्रदर्शन करते समय वार्ड नं. 5 के नगरपालिका में भाजपा पार्षद श्रीमती लिखिता-आशीष गौड़ ने यह घोषणा भी कर दी कि यदि सप्ताह भर में ब्रिज निर्माण का कार्य प्रारंभ होने संबंधी स्पष्ट निणर्य नहीं हुआ तो एक जनप्रतिनिधि होने के नाते मेरा यह फर्ज बनता है कि मैं जनता के दुःख दर्द दूर करने में सहभागी बनने का फर्ज अदा करू और इसलिये अपनी आत्मा की आवाज पर नगरपालिका परिषद् से कार्य पूरा नहीं होने पर स्तीफा देने की घोषणा की।
23 सितम्बर को प्रिंट मीडिया में पुनः चौथी खबर छपी कि रेल्वे ने मिड इंडिया ब्रिज का प्रस्ताव खारिज कर दिया है। एक तरफ जनप्रतिनिधि निश्चित तौर पर ब्रिज निर्माण होने की कह रहे है और दूसरी तरफ डीआरएम खारिज करने की घोषणा कर रहा है। जिसके विरोध में 23 सितम्बर को रहवासियों ने मिड इंडिया फाटक पर विरोध स्वरूप रेल्वे प्रबंधक रतलाम का पुतला जलाकर मांग पूरी नहीं होने की दशा में आगे ओर रेल्वे रोकों आदि उग्र आंदोलन की धमकी भी दे डाली है।
विधायक श्री यशपालसिंह जी सिसौदिया ने इस संबंध में कलेक्टर श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तवजी से मिलकर समस्या का हल निकालने बाबत् मुलाकात कर हल निकालने की कहने पर कलेक्टर श्री श्रीवास्तवजी द्वारा भी डीआरएम से मिलकर हल निकाले जाने के समाचार 24 सितम्बर को मीडिया में प्रकाशित हुए है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में ब्रिज की ऊँचाई को लेकर पटरी पार के रहवासियों द्वारा जब विरोध हुआ था तब श्री श्रीवास्तवजी ने सर्वेपरांत ऊँचाई कम करने का निर्णय लेते हुए समस्या का उचित समाधान भी कर दिया था। कलेक्टर महोदय द्वारा पुनः हल निकालने का आश्वासन दिया गया है। जनप्रतिनिधियों को भी रेल्वे की मनमानी को नजर अंदाज करके आगे आकर अब यह स्पष्ट कर देना चाहिये कि आचार संहिता लागू होने से पहले जैसा कि अभी तक यह आश्वासन देते आये है ब्रिज निर्माण कार्य शुरू होगा या नही ताकि नागरिकों को आर-पार की लड़ाई लड़ने का उग्र आंदोलन करने की नौबत नहीं आने पाये।

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