राजनीति के मैदान में कैच छोड़ती कांग्रेस

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क्रिकेट मेंएक शब्द है ‘सिटर।’ क्रिकइन्फो के मुताबिक, ‘यह सबसे आसान, सीधा और फील्डर के हाथ से छूटने वाला कैच होता है।’ साइट पर आगे कहा गया है, ‘ऐसा कोई कैच छोड़ना भीड़ से अपने लिए लानतों का सैलाब आमंत्रित करना और विशाल रिप्ले स्क्रीन पर लगातार शर्मिंदगी झेलना है।’

अब जरा कल्पना करें कि सत्तारूढ़ भाजपा बल्लेबाजी की क्रीज पर है और कांग्रेस विपक्ष में फील्डिंग कर रही है। फिर ऊपर बताए गए रूपक का इस्तेमाल करें तो कांग्रेस ने हाल ही में सिटर का पूरा ओवर बर्बाद कर दिया है। अच्छी तरह जमी हुई भाजपा को राजनीतिक रूप से कई कमजोर क्षणों का सामना करना पड़ा है। आंख-कान खुले रखने वाला कोई भी विपक्ष होता तो ये आसन कैच लेकर सरकार की राजनीतिक पूंजी के कुछ हिस्से को उड़ा देता। खेद की बात है कि कांग्रेस ने तो सिटर का पूरा ओवर ही गंवा दिया। कांग्रेेस ने मुख्यत: अपना काम करके जो आसान कैच गिराए उनकी चर्चा करते हैं। कुछ कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कमेंट किए लेकिन, उनके नेता राहुल (जो पहले ही विश्वसनीयता में कमी से पीड़ित हैं) की तरफ से प्रतिक्रिया में देरी से, दबी हुई और सटीक तीखी नहीं थी।

एक, गोरखपुर। खौंफनाक त्रासदी में 48 घंटों के भीतर गोरखपुर के अस्पताल में पचास से ज्यादा बच्चे ऑक्सीजन की कमी के कारण मारे गए। मूलत: यह मामला पूरी तरह से खराब प्रबंधन का था और वह भी भाजपा के सबसे हाई प्रोफाइल मुख्यमंत्रियों में से एक के क्षेत्र में। कांग्रेस को यह रुख लेना था कि शीर्ष पर तो नीतिगत परिवर्तन हो रहे हैं लेकिन, जमीनी स्तर पर शासन की यह हालत है कि हमारे बच्चे मारे जा रहे हैं। इसकी बजाय कांग्रेस में किसने क्या कहा इसे लेकर नितांत भ्रम की स्थिति थी। पहला कैच छूट गया।

दो, नोटबंदी। आरबीआई से आंकड़े अाने में देरी हुई, जिसके कारण लोगों की भौहें चढ़ीं। बेशक जानकारी धक्कादायक थी कि 99 फीसदी पुरानी नकदी फिर बैंकों में जमा हो गई। नोटबंदी से अन्य लाभ जो भी हुए हों, यह एक जानकारी सरकार को शर्मनाक स्थिति में डालने के लिए काफी थी। कांग्रेस को पूछना था कि काले धन से अमीर बने लोग सरकार की नाक के नीचे से कैसे बच निकले। इसकी बजाय बुजुर्ग मनमोहन सिंह के विनम्र लेख के जरिये नोटबंदी का विरोध किया गया। दूसरा कैच छूटा।

तीन, जीएसटी। इसे बहुत अद्‌भुत कदम माना जा रहा है और एक दिन यह भारत को ऊंचा उठाएगा। फिर भी मौजूदा जीएसटी अभी वास्तविक जीएसटी नहीं है। विभिन्न प्रकार की आधा दर्जन टैक्स दरें हैं। ये सब मनमानी दरें हैं, जो सरकार ने लगाई हैं और जीएसटी के मूल उद्‌देश्यों के ही विरुद्ध है, जिनमें से एक उद्‌देश्य ऐसी दरों में सरकारी दखल घटाना है। सिर्फ मौजूदा जीएसटी सच्चा जीएसटी नहीं है बल्कि सबसे आम 18 फीसदी की दर (क्या सिर्फ पांच साल पहले सिर्फ 10 फीसदी की दर पर सेवा कर नहीं था?) के साथ यह बहुत अधिक भी है। कई व्यवसाय मुश्किल में गए। कई क्षेत्रों में अंतिम ग्राहक जीएसटी के बाद अधिक भुगतान कर रहे हैं, जिन्हें तत्काल महसूस होने वाला कोई फायदा नहीं मिल रहा है। कांग्रेस को उछलकर इसे उठाना था। वह मौजूदा ऊंचे जीएसटी को आम आदमी पर बोझ बता सकती थी, जिसका कोई स्पष्ट फायदा नहीं दिखता। खेद है कि कांग्रेस दिशाहीन हो गई है। शायद अपने जीएसटी रिटर्न भरने में जरूरत से ज्यादा व्यस्त हो गई है। तीसरा कैच भी छोड़ दिया गया।

चार, आर्थिक मंदी। शायद नोटबंदी, जीएसटी अथवा चक्रीय कारणों से अर्थव्यवस्था पिछले साल से धीमी होती गई है। हो सकता है आम आदमी इसे समझता हो पर मीडया में तो यह चर्चा छेड़ दी जाती कि कांग्रेस जिस तरह अार्थिक तेजी लाई थी, भाजपा वैसी आर्थिक वृद्धि लाने का वादा पूरा नहीं कर पाई। इससे सरकार की छवि खराब होती। बेशक, यह बात लोगों तक पहुंचाने में जो नफासत लगती है उसका कांग्रेस में अभाव है। कैच चार भी छूटा।

पांच, गुरमीत राम रहीम दंगे। एक आपराधिक बाबा को सरकारी संरक्षण? गलियों में खून-खराबा। राष्ट्रीय स्तर पर छाने का मौका। पर कांग्रेस ने क्या किया? एक तो उसने देर से प्रतिक्रिया दी और वह भी निचले स्तर पर। यह बताने का मौका था कि धर्म से संबंधित सारी समस्याओं से निपटने में भाजपा उदासीन रहती है। फिर चाहे अराजकता ही क्यों मच जाए। कांग्रेस ने मौका गंवा दिया।

छह, गौरी लंकेश की हत्या। पत्रकार की हत्या नींदनीय है। हम अब भी हत्यारों और उनके इरादे के बारे में नहीं जानते। लेकिन, हत्या का संबंध उनके काम से लगता है, क्योंकि उनके काम में दक्षिणपंथियों के खिलाफ लेखन शामिल था। सरकार पर हत्या का आरोप नहीं लगाया जा सकता लेकिन, कोई यह माहौल तो बना ही सकता है कि चारों तरफ भय है और कोई भी सुरक्षित नहीं है खासतौर पर यदि वह सरकार के खिलाफ बोलता हो।

इसके बदले कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने 21 बंदूकों की सलामी की राजनीति खेली। इसका उलटा असर हुआ और आसान कैच छक्का बन गया। सच तो यह है कि यह लेख लिखते समय भाजपा ने एक और बोनस सिटर फेंका है। बड़ी अजीब बात है कि भाजपा ने इतिहासकार रामचंद्र गुहा पर आरएसएस और उसे बदनाम करने का आरोप में मुकदमा दायर किया है। इतिहास के उस लेख की बजाय गुहा पर मुकदमा दायर करना बड़ी खबर बन गया। बहुत आसान सा मामला है- चीखें-चिल्लाएं कि भाजपा अपने आलोचकों को धमका रही है। हालांकि, कांग्रेस के फील्डिंग रिकॉर्ड को देखते हुए लगता यही है कि यह सिटर भी गिरा दिया जाएगा।

इस बीच दर्शक दीर्घा (सोशल मीडिया) में बैठे भाजपा विरोधी कुंठित हैं। वे खूब भड़ास निकालते हैं लेकिन, पिच पर इससे स्थिति नहीं बदलती। उम्मीद है उन्हें इसका अहसास हो जाएगा। जब तक फील्डिंग में कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई उन सिटर को पकड़ने वाला नहीं है।

(येलेखक के अपने विचार हैं)

कई ऐसे मुद्‌दे सामने आए, जिन्हें पार्टी जोर-शोर से उठाती तो मोदी सरकार मुश्किल में जाती

चेतन भगत

अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार

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