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राजपूती आन-बान-शान स्वाभिमान व राष्ट्रीय गौरव का सही चित्रण है फिल्म पद्मावत-बंशीलाल टांक  

बालीवुड-फिल्मों में विशेषकर वर्तमान दौर में मनोरंजन के नाम पर फिल्मों में एक सम्प्रदाय विशेष हिन्दूओं के देवी-देवताओं के साथ ही ऐतिहासिक पात्रों का फिल्मों में जिस प्रकार उपहास-मजाक-असम्मानजनित चित्रण किया जा रहा है। साथ ही हिन्दू समाज जिन अवतारों-भगवान को अपना आराध्य देव मानकर सदियों से पूजता-आराधना करता आ रहा है, उन्हीं मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाने वाले भगवान राम को अमर्यादित वेषभूषा-दृष्टांकन में प्रस्तुत करना इसी प्रकार योगीराज कहलाने वाले भगवान कृष्ण को फूहड़पने में दिखाना, देवों के देव महादेव को भी नहीं बक्शा जाना-ऐसे कई दृष्यांे-प्रसंगों से क्षुब्ध होकर मैंने कई बार ऐसी फिल्मों-विज्ञापनों का विरोध करता रहा हूॅ। इसी तारतम्य में मैंने फिल्म पद्मावती (प्रथम नामकरण) के विरोध में राजपूत समाज के विरोध को सही ठहराने में अपना आलेख भी मीडिया में प्रकाशित हुआ था परन्तु इसके संबंध में जब देश के प्रसिद्ध वरिष्ठ चिन्तक-साहित्यकार-लेखक-समीक्षक श्री वेद प्रताप वैदिकजी तथा अन्य कुछ वरिष्ठ मीडिया कर्मियों के साथ फिल्म प्रदर्शन के पूर्व इस फिल्म को देखकर फिल्म में आदि से अन्त, प्रारंभ से समाप्ती तक कहीं भी किसी भी दृश्य को राजपूत समाज के सम्मान में जरा सी ठेस पहुंचाने वाला नहीं बताकर फिल्म को राजपूतों के शोर्य-साहस-बलिदान-गौरव दर्शाने वाली बताया था तब से मेरे मन में भी इस फिल्म की वास्तविकता जानने की जिज्ञासा थी और इसी के फलस्वरूप मैंने 9 मार्च को नगर के एक छबीगृह में जाकर इस मुवी को मनोरंजन की दृष्टि से नहीं बल्कि श्री संजय लीला भंसाली की सच्चाई जानने के लिये देखा।
फिल्म को देखकर कुछ क्षणों के लिये अपने अतीत के उस इतिहास में खो गया जो राजपूतों ने अपने स्वाभिमान को बचाये रखने, राष्ट्र के गौरव-अस्मिता को बचाने, कायम रखने के लिये क्षत्रीय वीरों, वीरांगनों ने कितना बड़े से बड़ा बलिदान करने में पीछे नहीं रहे, देश के गौरव को बचाने, हंसते-हंसते युद्ध भूमि में कम होते हुए हजारों विदेशी आक्रांताओं के सामने घुटने टेकने के बदले प्राणों का विसर्जन कर दिया परन्तु मातृभूमि के मस्तक को झुकने नहीं दिया परन्तु उसी राष्ट्र में आजादी के बाद हम कहां किधर जा रहे है । इस पर गंभीरता से चिन्तन करना चाहिये और यह तभी संभव है जब राष्ट्रीय गौरव-संस्कृति-सभ्यता को बढ़ावा देने वाली फिल्में टीवी सीरियल बनते रहे। जहां तक फिल्म पद्मावत का प्रश्न है इसे देखने के पश्चात् मैं यही कह सकता हूॅ कि इस फिल्म में ऐसा कोई दृष्य, गाना, नृत्य नहीं है जो राजपूत समाज के साथ ही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, सम्मान, गरिमा को धूमिल करता हो। यह दर्शकों की इच्छा पर निर्भर है वे चाहे इसे देखे या न देखे। परन्तु देखने के बाद देखने वालों को वीर राजपूतों, महान विरांगना पद्मावती, वीर क्षत्राणियों का अपनी गौरवशाली परम्परा, संस्कृति अस्मिता को बचाने के लिये उनके साहस, समर्पण, त्याग, बलिदान पर गौरव जरूर महसूस होगा।
फिल्म पद्मावत में उन दृष्यों को भी हटा दिया गया है जिनके कारण इस फिल्म का विरोध हुआ है। सारांशतः यही कहा जा सकता है कि राजपूती आन-बान-शान-स्वाभिमान का सही चित्रण है फिल्म पद्मावत।

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