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रिक्त हो गया कोना …………….. जगदीश के चले जाने से

आकस्मिक रुप से इतना कुछ घट गया कि सबका चहेता -सबका हमदर्द – कलम का घनी – प्रखर टिप्पण़ी कर्ता – पशुपतिनाथ महादेव का अनन्य भक्त श्री जगदीश पुरस्वानी हम सबसे दूर -बहूत दूर चला गया। अब यादें ही तो रह गई हैं।

कई दिनों से मंदसौर के दया मंदिर मार्ग स्थित, बैंक ऑफ बड़ौदा शाखा के सामने कार्नर पर हर समय मुस्कुराते -बतियाते – पान गुटका बनाते – किसी की मदद करते – किसी का साथ देते – कभी पढ़ते तो कभी लिखते नजर आते थे श्री जगदीश। आज वो मुस्कुराता चेहरा नहीं है, पान लबों की शान बनाता जाने कहां चला गया, बैंक का सामान्य कामकाजी मददगार खो गया, सच में कार्नर ही खाली नहीं हुआ जैसे हमारे हदय का एक कोना ही रिक्त हो गया।

जब भी उधर जाना होता, चाहे वाहन से अथवा पैदल, सदैव स्नेह से ‘‘ओम जय जगदीश‘‘ का उद्घोष हम करते और प्रिय जगदीश विनीत भाव से अभिवादन स्वीकार करते बोल उठते आर्शीवाद भाई सा.। वर्षो से जारी सिलसिला अब अचानक थम गया तो खालीपन का अहसास हो रहा है।

सन्नी पान कार्नर वह स्थान रहा है जहां से गुजरने वाला मंत्री हो या संत्री, नेता हो या अभिनेता, पत्रकार हो या संपादक, सामाजिक कार्यकर्ता हो या धर्म सेवी, किसान हो या उद्योगपति, महिला हो या पुरुष, युवा हो या बुजुर्ग कोई वर्ग हो या धर्म कोई भी अछूता नहीं रहा जो मिले बिना या बात किये बिना या परस्पर अभिवादन के बिना निकल पाता हो। मोहक मुस्कान और मोहपाश में बांध लिया था सभी को श्री जगदीश पुरस्वानी ने।

चर्चा कैसी भी हो, विषय कोई भी हो आप बात कर सकते थे उनसे। सहमती -असहमती भी स्पष्ट रुप से व्यक्त करते थे वे। पत्रकार -संपादक विशेष रुप से मिलते थे उनसे ताकि ‘‘सच‘‘ सामने आ सके, क्रिया -प्रतिक्रिया समाचार की, टिप्पण़ी की उनके माध्यम से सामने आ जाती थी। इतना ही नहीं जनसमस्या हो, पशुपतिनाथ मंदिर और व्यवस्था सम्बंधी मामला हो, राजनीति सम्बंधी मसला हो वे बेबाक लिखते रहे और अपने नाम से जारी करते रहे। वे किसी के प्रति आग्रह -दुराग्रह और पुर्वाग्रह नहीं रखते थे इसके चलते उनकी टिप्पण़ी को सम्बन्धीत पक्ष सकारात्मक लेते रहे।

पशुपतिनाथ महादेव के अनन्य भक्त श्री जगदीश पुरस्वानी मंदिर तकरीबन प्रतिदिन जाते, जलाभिषेक करते और सबसे मिल जुल आते थे। कुछ व्यवस्थाओं से वे खिन्न थे पर भक्तिभाव में कमीं नहीं रही। नपाध्यक्ष प्रहलाद बंधवार व आरती मन्डल समूह के साथ जुड़ कर धार्मिक आयोजनों, शाही सवारी, धार्मिक अनुष्ठान में स्तम्भ की भूमिका निर्वहन करते रहे।

यहीं नहीं अपनी छोटी सी दुकान पर बैंक ऑफ बड़ौदा शाखा में आने वाले कमजोर, गरीब असहाय लोगों की मदद करते, उनके बैंक फार्म वे स्वयं भरते, कई अवसरों पर बैंक जाकर भुगतान लाते और जमा भी करा देते थे। बैंक अधिकारी और स्टॉफ भी उन पर भरोसा करता। कई खातेदारो की निस्वार्थ सेवा करते श्री जगदीश, कई बुजुर्गों और महिलाओं की पेंशन भी आरम्भ कराई आपने। इतनी दुवाएं ली पर वे भी खाली चली गई। निस्वार्थ सेवा करते रहे। स्वयं संघर्ष रत रहे. संकट ग्रस्त रहे पर चेहरे की मुस्कान स्थायी रही। पत्रकारों को उनका वियोग खल रहा है पर उनका जाना संकेत और चेतावनी भी दे गया है। आर्थिक पक्ष कमजोर रहा, भविष्य सुरक्षित नहीं दुर्घटनाग्रस्त होने पर परेशानी,किडनी खराब होना, डायलीसीस चिकित्सा, सब कुछ पर बचाया नहीं जा सका। परिवार भरा पुरा हैं भाई बन्धु है पर सबके अपने दायित्व भी है। अगर समझें गंभीरता तो सच में पत्रकारों को भी मदद की दरकार है सरकार। याद करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि।

 

 

 

(डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर )

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