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लोकतांत्रिक तरीका छोड़कर भद्दे और असभ्य प्रदर्शन से समाज में अच्छा संदेश नहीं जाता – श्री चन्द्रे

मंदसौर। लोकतंत्र में आंदोलन करके अपनी मांगे सरकार के समक्ष रखना, यह हर व्यक्ति और संगठनों का अधिकार है किन्तु आंदोलन करते समय लोकतांत्रिक तरीका छोड़कर भद्दे और असभ्य प्रदर्शन से जहां समाज में अच्छा संदेश नहीं जाता है। वहीं संबंधित संगठनों के संस्कार, विचार, व्यवहार एवं नेतृत्व के प्रति भी प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है।

उक्त विचार व्यक्त करते हुए शिक्षाविद् रमेशचन्द्र चन्द्रे ने एक विज्ञप्ति में बताया कि वर्तमान में कुछ शिक्षक संगठन एवं कर्मचारी संगठनों द्वारा आत्मदाह का प्रयास, मुण्डन करवाना, अर्द्धनग्न होकर प्रदर्शन करना, मुर्गा बनना, पकोड़े तलना, चाय बनाना, इस प्रकार के अनेक प्रदर्शन जो भारतीय लोकतंत्र में सम्मान से नहीं देखे जाते, वरन् समाज में भी हंसी मजाक का वातावरण बनते है। श्री चन्द्रे ने यह भी कहा कि आंदोलन का तरीका ऐसा होना चाहिये जो महिला कर्मचारियों के लिये भी शालिन और सभ्यता से पूर्ण हो। यदि नेतृत्व करने वाले व्यक्ति की सुझबुझ तथा जिस मांग को वो करने जा रहे है उनका सम्पूर्ण कानूनी पक्ष का ज्ञान रखने वाला हो एवं संगठन का जो व्यवसाय है उसकी गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखने वाला हो तो कोई भी आंदोलन बेहतर प्रभावी ढंग से संचालित हो सकता हैं। श्री चन्द्रे ने अपील की है कि समाज के सक्षम वर्ग को भी लोकतंत्र में आंदोलन के गिरते हुए स्तर पर ध्यान देना चाहिये।

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