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शराब के विरोध पर क्‍यों खामोश है मन्‍दसौर के जनप्रतिनिधि?

मन्‍दसौर। जिलेभर में नारी शक्ति शराब की दुकानों का पुरजोर विरोध कर रही है वहीं सरकार और प्रशासनिक अमला दुकानों को व्यवस्थिति करवाने में जुटा हुआ है। जब जिले में अनेक स्‍थानों की जनता शराब का इतना विरोध कर रही है तो सरकार क्यों सख्त नहीं हो रही है। जबकि मन्‍दसौर के लगभग सभी जनप्रतिनिधि खुद अपने भाषणों में शराब को बुरी चीज बता चुके हैं और शराब का सेवन न करने की नसीहत भी देते हैं। जब जनप्रतिनिधि शराब के विरोधी हैं तो किस मजबूरी के आधार पर शराब का कारोबार फलने फूलने दिया जा रहा है। इसको लेकर सामाजिक कार्यकर्ता, जागरूक नागरिक व जिला कांग्रेस के कुछ जागरूक प्रतिनिधियों ने सरकार व शासन की मंशा पर सवाल उठाये हैं और उन्हें एक खत लिखकर व ज्ञापन प्रस्‍तुत कर निशाना साधा है।

शराब नीति का विरोध
प्रदेश की बहिनें और भांजियां बेहद परेशान हैं। हमारे सीम बहिनों और भांजियों से हर अवसर पर भरपूर स्नेह दिखलाते हैं। बीजेपी की सरकार और शासन की कथनी और करनी के अंतर साफ दिखाई देता है। ‘बहिनों-भाजियों’ की जबरदस्त परेशानी का सबब सरकार की शराब नीति है। एक ओर तो सरकार नई शराब की दुकानें नहीं खोलने की बात कहकर वाहवाही बटोरते हैं और दूसरी ओर सूबे में बहिनों (महिलाओं) और भांजियों (बेटियों) के खुले के विरोध के बावजूद, बहिन-बेटियों द्वारा चाहे गये स्थानों से शराब की दुकानें नहीं हटवाते।

शराब के विरोध में सड़क पर उतरीं बहने और भांजियाँ
नए वित्तीय वर्ष में धड़ल्ले से शासकीय ठेकों की दुकानें और कलारियां सज रही हैं। प्रदेश भर में मयखानों की स्थापना का विरोध चरम पर है। राज्य के 60 फीसदी के लगभग इलाकों में आपकी बहिनों और भांजियों ने सड़कों पर उतरकर सरकारी ठेकों वाली शराब की दुकानों और कलारियों की स्थापना के विरोध में सुर बुलंद कर रखे हैं। सुस्पष्ट विरोध के बावजूद आपका प्रशासन चिन्हित स्थानों को लेकर टस का मस नहीं हो रहा है।

नेशनल मीडिया में भी छाया एमपी में शराब का विरोध
बहिन और बेटियों को हो रहे जबरदस्त कष्ट से जुड़ी खबरें मीडिया जगत में छायी हुई हैं। कई जिलों में जोरदार और जबरदस्त प्रदर्शन एवं विरोध की खबरें नेशनल मीडिया में भी आयी हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कवरेज को पूरे प्रदेश ने देखा है। मगर आपकी ‘पैनी निगाह’ विरोध और प्रदर्शन पर आखिर क्यों नहीं पड़ पा रही है? यह बात गले नहीं उतर रही है। मैं मानता हूं, शराब से होने वाली जबरदस्त आय आपके लिये सर्वोपरि है ना कि बहिन और भांजियां। यदि ऐसा नहीं होता तो शराब की बुराइयों की बातें भर करके आप वाहवाही लूटने से बाज आकर कार्रवाई करवाते। मैं इसलिये तो कहता हूं, आपकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। आप सिर्फ और सिर्फ हीप्पोक्रेसी करते हैं।

केवल वोट के अलावा जनप्रतिनिधियों को कुछ सामाजिक मुद्दे नही दिखाई देते है क्‍या यह सवाल इस खामोशी के कारण स्‍वत: ही पैदा हो रहे है ‘‘सरकार कुंभकर्णी नींद में सो रही है।’’ ओर हो सकता है कि आने वाले वर्ष में चुनाव सर पर है, और विपक्ष को बैठे बिठाए नया मुद्दा मिल गया है। हम भी अपेक्षा करते है कि क्षेत्र के जागरूक जनप्रतिनिधि शराब के विरोध में आवाज उठाएंगे।

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