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शिक्षक पिता की एक बेटी पटवारी, एक डॉक्टर और एक सीईओ जनपद

जिले का छोटा सा गांव घुड़ावन। शहर से 30 किमी की दूरी पर। यहां रहने वाले शिक्षक गणपतसिंह पंवार की जिद और जुनून की यह कहानी है। उन्होंने ठान लिया था- मैं अपनी तीनों बेटियों की शादी में दहेज नहीं दूंगा। बेटियों को इतना काबिल बनाऊंगा कि रिश्ते खुद चलकर आएं। आज उनकी बड़ी बेटी साधना पटवारी है, दूसरी बेटी विचित्रा एमबीबीएस डॉक्टर है और तीसरी बेटी टीना जनपद पंचायत सीईओ। टीना 14 मार्च को बड़वानी जनपद में अपना कार्यभार ग्रहण करेंगी।

राजपूत बाहुल्य घुड़ावन में बेटियों को पढ़ाना अच्छा नहीं माना जाता था। कोई भी बेटी मिडिल से आगे नहीं पढ़ सकी। पंवार के शिक्षक मन में यह बात चुभती रही। साधना ने जब मिडिल किया तो आगे की पढ़ाई के लिए उसे लेकर परिवार उज्जैन (इंदिरानगर) आ गया। समाज के ताने सुने पर डिगे नहीं। किराए के घर में थोड़े से वेतन में परिवार के लालन-पालन के साथ बेटियों की पढ़ाई की चुनौती पंवार के सामने थी। उनकी प|ी अंतरकुंवर भी हायर सेकंडरी तक शिक्षित होने से दोनों ने मुसीबतों को सहकर भी बेटियों को पढ़ाना तय किया।

पूरी लाइफ बच्चों को समर्पित- अंतर कुंवर ने बेटियों को हरदम यह समझाया कि हम अपना गांव छोड़ कर आए हैं। खाली हाथ न जाना पड़े। मां की प्रेरणा और पिता के सहयोग ने तीनों बेटियों को पढ़ाई को लेकर अनजाने ही इतना जागरुक कर दिया कि उन्होंने अपनी मंजिल हासिल कर दम लिया। पिता ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, चाहे इसके लिए पीएफ से पैसा निकालना पड़ा या एज्युकेशन लोन लेना पड़ा। अब उन्हें संतोष है कि चाहे उनकी जेब खाली है लेकिन उन्होंने बेटियों को शिक्षित कर करोड़ों की दौलत हासिल कर ली है।

गांव में शिक्षा का नया सवेरा- घुड़ावन में एकमात्र गणपतसिंह का परिवार ही है, जिनकी बेटियों ने इतनी ऊंची शिक्षा पाई और ओहदों पर पहुंची। अब वे गांव के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। गांव की बेटियां अब मिडिल से आगे भी पढ़ने जाने लगी हैं। गांव के पोस्टमैन मोहनलाल के बेटे राकेश ने बेहद तंग हालात में पढ़ाई की। अब वे मंदसौर में सब इंस्पेक्टर हैं लेकिन जब गांव आते हैं तो पिता को घर बैठाकर खुद खेत में काम करते हैं। धर्मेंद्रसिंह पंवार बीएसएफ में चुने गए। गोकुलसिंह पंवार पंचायत सचिव हैं और राजेश राठौर सहायक सचिव।

यह है जिंदगी का सच्चा रंग
साधना- जिले की सबसे योग्य पटवारी का खिताब लेने वाली साधना खाचरौद में पटवारी हैं। कहती हैं- माता-पिता ने कभी दबाव नहीं डाला कि फ़र्स्ट क्लास आना है लेकिन हमें लगता था कि शिक्षा जरूरी है। कुछ बनकर ही अच्छा जीवन प्राप्त किया जा सकता है।

विचित्रा- चेरिटेबल अस्पताल में चिकित्सक हैं। उनके मन में टीस थी कि डॉक्टर मरीजों से ठीक से पेश नहीं आते। डॉक्टर बनने के बाद इस पेशे की हकीकत ने और परेशान कर दिया। विचित्रा का स्त्री-रोग विशेषज्ञ बनकर ग्रामीण क्षेत्र में जाकर सेवा करने का इरादा है।

टीना- बचपन में कलेक्टर को देखकर पिता से पूछा था- मैं कलेक्टर कैसे बनूंगी। पिता और बड़ी बहनों ने प्रेरित किया। मैकेनिकल में बीई करने के बाद महिला बाल विकास में सेवा दी। सभी ने मनोबल बढ़ाया। अब 14 मार्च को बड़वानी जनपद सीईओ का पद संभालेंगी।

सबसे छोटी बेटी टीना 14 मार्च को बड़वानी जनपद पंचायत की सीईओ का कार्यभार संभालेगी। परिवार के लोगों ने रविवार को उसे गुलदस्ते देकर शुभकामनाएं दीं।

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