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शिवना की बाढ़ सीख ही नहीं बड़ी नसीहत और चेतावनी दे गई है – टांक

मन्दसौर। दशकों के बाद आई शिवना की भयंकर बाढ़ से मंदसौर नगर और किनारे बसे आसपास के क्षेत्रों की जिस प्रकार बर्बादी हुई है, दिल-दिमाग-हृदय को झकझोरने वाले दृश्य प्रत्यक्षदर्शियों के नेत्रों-मन-मस्तिष्क में लम्बे समय तक कोंधते रहेंगे। मीडिया ने भी आने वाले दशकों तक विस्मृत नहीं होने वाले तमाम दृश्यों को बखूबी रेखांकित किया है।

1946 के बाद दशपुर नगर के उम्रदराज वरिष्ठजनों द्वारा देखी गई, इस प्रलंयकारी बाढ़ के कारण तो प्रकृति के पास ही है। इस भयावह बाढ़ के आगोश में ग्रसित गांव अभी तक उबर नहीं पाये है, सम्हले भी तो कैसे प्रकृति भी एक प्रकार से पूरी तरह रूठी हुई है जिसका उदाहरण रेकार्ड 8वीं बार शिवना में बाढ़ का आना और बिना नागा किये प्रतिदिन चाहे जब हो रही बारिश होना है।

14 सितम्बर की बाढ़ से आई सबसे बड़ी मुसीबत तो यह है कि ग्राम लोध- अलावदाखेड़ी-हैदरवास-अशोक नगर, अफजलपुर आदि स्थानों में जहां कच्चे मकान पूरी तरह जमींदोज हो गये है। पानी घुसने से खाद्यान्न तो सब खराब हो गया  परन्तु निरंतर बारिश जारी रहने से धूप नहीं निकलने से पानी नहीं थमने से बनाये तो कैसे। ओढ़ने-बिछान के बिस्तर पहनने के कपड़े, कम से कम 2-3 दिन तगड़ी धूप के बिना सुखाये तो कैसे। इसका निदान तो ईश्वर के अधीन है परन्तु जीवन दायिनी मॉ शिवना की इस भयावह बाढ़ ने अपने पीछे जो निशानात दोनेां किनारों पर छोड़े है वै बाढ़ से भी ज्यादा भयावह है जो दोनों किनारों पर दूर-दूर तक झाडि़यांे में अटके बिखरे पड़े है जो पोलीथीन प्लास्टिक के अम्बार के रूप में जो दिखाई दे रहे है और यदि इस कचरे को गांधीसागर में मिलने तक सबको इकट्ठा किया जाये तो वजन क्विंटलों में नहीं टनों में होगा और यह कोरी कल्पना अथवा अनुमान नहीं है, हकीकत है। 4 माह पूर्व 30 मई को प्रिंट मीडिया में प्रकाशित खबर के अनुसार प्रदेश की राजधानी भोपाल में ही प्रतिदिन निकलने वाला  कूड़ा पोलीथीन की रोजाना औसत खपत 10 मैट्रीक टन बताई गई है।

मंदसौर नगर में न.पा. पूर्व अध्यक्ष प्रहलादजी बंधवार ने प्रतिबंध अवश्य लगाया था परन्तु  उसका स्थायी पालन नहीं रह पाया जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शिवना की बाढ़ में बहकर किनारे पर खानपुरा से लेकर मुक्तिधाम और आगे तक इकट्ठा पोलीथीन सम्बार बता रहा है। शिवना की बाढ़ के नुकसान से तो देर-सबेर हम उबर जायेंगे परन्तु यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इस प्लास्टिक पन्नी की बाढ़ में ऐसे बहकर जायेंगे कि फिर कहीं पता ही नहीं चलेगा कि इस ‘‘सुजलाम् सुफलाम्-मलयज शीतलाम-शस्य शामलाम्‘‘ कहलाने वाली वसुन्धरा को पोलीथीन रूपीकाल ग्रसित न कर जाये।

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