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शोरित सक्सेना की कलम से

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आज जन्मदिन है हमारे प्रिय मित्र शोरित जी सक्सेना का, Shorit Saxena जो है तो आम लेकिन हम सब के खास चहिते भाई को जन्मदिन बहुत बहुत शुभकामनाएं


इस तस्वीर को गौर से देखेंगे तो आपको इन खिताबों को रोशन करने के लिए लगे बल्ब का कलर उडा हुआ दिखेगा। यह तस्वीर बताती है कि समय निकल जाने पर सुनहरे दिनों की रंगत भी फ़ीकी पड़ जाती है। आपके धुंधले वर्तमान और अनिश्चितताओ से भरे भविष्य से आपके सुनहरे भूतकाल का रंग लगभग उड़ जाता है….उड़े हुए कलर वाले बल्ब के साथ रखी यह शील्ड और मैडल अपनी धूल झड़ने का इन्तेजार करते है। और हम जानबूझकर यह धूल इसलिए नहीं झाड़ते क्योकि हम जानते है कि इस धूल के झड जाने से इस वर्तमान का धुंधलका कम नहीं हो जाएगा। शहर के बड़े लोगो के बीच आपका नाम लिया जाना और आपका सम्मानित होना और कुछ सालो में उसी भीड़ का एक हिस्सा हो जाना…खेर… समय आता ही बीतने के लिए है…वो सुनहरा बनकर आता है और बीत जाने के साथ धुंधला हो जाता है। फिर चाहे वो आपके खिताब ही क्यों ना हो, आज की असफलताओ के आगे बीते हुए कल की यह सफलताए भी ताख के उस बल्ब की तरह अपनी रोशनी खो देती है।


खुद को समझाना और किसी को समझना दोनों ही काम बहुत मुश्किल है। अपने बारे में बताना क्या और बताने से ही किसी ने जाना तो जाना क्या। इतना जरूर है कि शब्द पैशन भी है और प्यार भी। जो बात किसी से भी ना कही जा सके,वो लिखी जा सकती है। इसीलिए लिखते है, कभी अपने लिए, कभी सबके लिए।


प्यारी माँ, आज आप घर पे नहीं हो, दरअसल आपके बिन ये घर ही नहीं हैं। मदर्स डे पर कहा आपको एक लेटर लिखूं। अच्छा हुआ ये लेटर  ही पढ़ेंगे। मैं ये नहीं चाहता कि इसे पढ़ो, बहुत जल्दी रो देती हो न, इसलिए। माँ, क्या लिखूं, क्या धन्यवाद लिखूं, पर किस-किस बात के लिए। इसलिए माँ आज माफ़ी लिखता हूँ। प्यारी माँ, माफ कर दोगी ना, माफ़ कर दोगी ना, मेरी उन गलतियों को, जो तुम्हें भारी पड़ी, उन गलत चयनों को, जिनके परिणाम तुमने भोगे, उन विपदाओं को, जो तुमने झेली। माँ, क्या तुम वो आँसूं बहा दोगी, जो मेरी वजह से हैं, लेकिन मेरी ही ख़ातिर तुमने पलकों में छुपा रखे हैं। क्या वो गम जाहिर कर दोगी, जो मेरी वजह से मिले, लेकिन तुमने एहसास तक न होने दिया। क्या कान पकड़ कर डाटोगी, ये क्या किया क्या रे शानू। माँ, माफ़ कर दोगी ना, सोचा था, तुम्हारे जिंदगीभर के संघर्ष को कम कर दूंगा। लेकिन, मैंने तो उसे बढ़ा दिया, फिर भी तुमने उफ़्फ़ तक ना किया। सबके ताने सहे, सुने पर मुझे कुछ ना कहा। माँ, ये फिल्म भी ना थी, जिंदगी थी, तुम्हारे गले लगकर, रो भी तो न सकता था, कैसे बांटता तुम्हारे उस दर्द को। जिसका जिम्मेदार ही मैं था। सॉरी माँ, सॉरी… एक बुरे बेटे की अच्छी माँ होने के लिए। तुम प्लीज़ ये खत मत पढ़ना, पर मुझे माफ़ कर देना, कर दोगी ना, प्यारी माँ।


सुनो, मैं प्रणय निवेदन भेज रहा हूँ। पर तुम ठुकरा देना इसे। पढ़ना भी नहीं और भूला देना इसे। क्योंकि, तुम अट्टालिकाओं में रहने वालीं, मेरी चार दिवारी सिर्फ अपनापन देने वाली, तुम्हें छोटी-छोटी लगेगी। तुम्हें मखमली आराम है सुहाता, मेरे कांधों पे सर को टिकाना, तुम्हें चुभन ही देगा। तुम सदा मुस्कुराती रहतीं, भाव भरे ख़ुशी के आँसूं भी, तुम्हें गंवारा ना होंगे। तुम कारों की सवारी करती, दो पहिया पर सावन की फुहारें, कहाँ वो मौज देगी, मैं दे ही क्या पाउँगा तुम्हें, ना इटली-पेरिस दिखा पाउँगा, ना जन्नत जैसे किसी और देश की, सैर पर ले जा पाऊंगा। हीरे-मोती भी ना तुम्हें, दिला पाऊंगा। लेकिन सुनो, यदि तुम गलती से इस खत को पढ़ लो, ख़्वाबों से दूर हक़ीक़त को चुन लो, तो जान ये भी लो, जो हमारा घर होगा, वो स्वर्ग से सुन्दर होगा। मेरे कांधे का तकिया होगा। तुम्हारे आँसूं मेरे होंगे, मेरी मुस्कान तुम्हारी होगी। जितनी खुशियां होंगी, मिलकर सांझी होंगी। पुराने गम सारे छटेंगे, जो दर्द है वो भी बटेंगे, नए सपने मिलकर बुनेंगे, इंद्रधनुष से रंग घुलेंगे, मेरी ना तुम्हारी, हर बात हमारी होगी, सुनहरे ख़्वाब नहीं, सच्ची हक़ीक़त होगी, जिंदगी तुम संग बहुत, खूबसूरत होगी।


बड़ी मुश्क़िल से जान बचाकर लौटा हूँ, मैं अभी उसकी आँखों में डूबकर लौटा हूँ। गैलरी में आकर गीले बाल सुखाये थे उसने, मैं फिर बहारों की सैर कर लौटा हूँ। हाथ थामकर उसने किया था इज़हार, मैं अभी ख़्वाबों से जागकर लौटा हूँ। अपने हाथों से रक़ीब को गुलदस्ता दिया, मैं सारी रंजिशें फिर भूलाकर लौटा हूँ। उसने खड़े होकर अलविदा कहा था जहाँ, मैं उस चौराहे से मरकर लौटा हूँ।


हूँ प्रणय से वंचित मैं, घायल मन सा रक्तरंजित मैं। वो रुपनगर की रानी सी, कुरूप नगर का बाशिंदा मैं। वो रजत पालने में खेली, लोह पाए में जन्मा मैं। वह गुणों की आभा से युक्त, अवगुण लिए अभागा मैं। वह सलिला गंगा सी पावन, बारिश में बहता पानी मैं। वह हंसे तो खिलते पुष्प, उतर चुकी माला सा मैं। वह जैसे सौभाग्य किसी का, और सब के लिए अभागा मैं। वह सब की प्रार्थनाओं का स्वर, और बस एक बद्दुआ सा मैं। वह अमूल्य कोहिनूर जैसी राख बने कोयले सा मैं। वह अमेरिकन इंग्लिश एक्सेंट, ठेठ देसी भाषा सा मैं। वह पूनम के चंदा सी पूर्ण, और अमावस का अंधेरा मैं।   हूँ प्रणय से वंचित मैं, घायल मन सा रक्तरंजित मैं।


मैं मांगता हूं तुमसे वही नफरत… तुम प्रेम नहीं करती मुझसे… मुझसे बिल्कुल भी लगाव नहीं है तुम्हें, मेरी बातों से बहलता भी नहीं दिल तुम्हारा, फिर भी यह नफरत से कुछ कम ही है। तुम आखिर प्रेम करो भी तो कैसे मुझसे, तुम कर चुकी हो वो तो, तुम्हारे अतीत में … शायद उससे बहुत ज्यादा, जितना आज में तुम्हें कर रहा हूं। मैं जानता हूं कभी तुमने भी किया होगा, किसी की एक आवाज सुनने का इंतजार कभी तुमने भी बहुत शिद्दत से खरीदे होंगे तोहफे, सुबह शाम करना चाही होगी बात।  मैं जानता हूं तुमने भी संजोये होंगे सपने, खाई होंगी साथ निभाने की कसमें, हमेशा सोची होगी एक ही बात, पूजा में दुआओं में होगा किसी का साथ। मैं जानता हूं तुम्हारे पास नहीं बचा, अब मुझे देने को कुछ, प्रेम तो बिल्कुल ही नहीं, क्योंकि वह तो खो चुकी हो तुम। लेकिन अब भी कुछ है तुम्हारे पास, जो सिर्फ है तुम्हारे ही पास, हां मैं तुमसे मांगता हूं, मैं मांगता हूं वहीं नफरत। इसी नफरत के साथ जी लो जिंदगी मेरे साथ, मैं ताउम्र बिता दूंगा, उस नफरत को प्यार में बदलने में, और देखना देख ही लेना एक दिन हम पा लेंगे, उस अतीत में खोए हुए प्यार को हमारे जीवन में।


मैं लिखता रहता हूं, वह पढ़ पाता नहीं। कितनी बातें करता हूं, वह सुन पाता भी नहीं। आंसू अक्सर पलकों पर अटकते हैं, दुपट्टे से वो अपने पोंछता ही नहीं। सोचता हूं सुन लूं और सुना लूं सब दिल की। पास पर वह आकर कभी बैठता भी नहीं। आता है सदियों जैसे लंबे घंटों के इंतजार पर, पल भर भी लेकिन फिर वो ठहरता ही नहीं। जानता सब है कितने गहरे जख्म हैं मेरे। मरहम तो दूर उन्हें कुरेदता भी नहीं। रात दिन राह तकता हूं, ख्वाबों में बुलाता हूं। आकर किसी मोड़ पर यूं ही क्यों मिल जाता नहीं।  सोचता हूं कि ना सोचूं उसे भुला भी दूं लेकिन। सोचकर उसके बारे में फिर कुछ और सोच पाता नहीं। घिरा हूँ अंधेरों से, अवसादों से, परायों से।  अपना है तो फिर क्यों ख़ुशी के दीप जलाता नहीं। खबर उसे ये कुछ नहीं, ये भी ख़बर है मुझे। मैं भी खत तो रोज लिखता हूँ, पर उसे पहुंचाता नहीं। मैं लिखता रहता हूं, वह पढ़ पाता नहीं। कितनी बातें करता हूं, वह सुन पाता भी नहीं।


तुम्हारी तस्वीर गढ़ रहा हूँ मैं, और अपना जीवन पढ़ रहा हूँ मैं। आँखें है ऐसी के डूब जाए समंदर। लेकिन सुकूं की एक बूंद का इंतेजार देख रहा हूँ मैं। कानों के झुमके जैसे सुंदरता के तराजू। लेकिन प्रेम के मीठे बोल बोले, उस आवाज की पुकार सुन रहा हूँ मैं।। तुम्हारी तस्वीर गढ़ रहा हूँ मैं, और अपना जीवन पढ़ रहा हूँ मैं। है जुल्फें जैसे हुई बिखरी साँझ की किरणें। पर जूड़ा बांध गुलाब सजा दे कोई। वो चाह सुन रहा हूँ मैं। हैं कंठ बिलकुल जैसे मयूरी सा सुन्दर। पर सूत्र मंगल और हो पुष्पहार, ऐसे भार को तैयार देख रहा हूँ मैं। होंठ बिल्कुल पंखुड़ियों से कोमल, लाली का उस पर सुर्ख रंग। पर बांसुरी के स्वरों में सधे प्रेम स्वर, अधर मिलन से प्रेम पूर्ण हो, वो प्यास लिख रहा हूँ मैं। तुम्हारी तस्वीर गढ़ रहा हूँ मैं, और अपना जीवन पढ़ रहा हूँ मैं। लाल-गुलाबी वो साड़ी जिसमें खिलते हर रंग। जैसे आसमान में इंद्रधनुषी छटा बिखरे संग-संग। किंतु पल्लू सर पर लेकर शीश झुके जिस संग। उसी पल्लू से वह साथ मांगता साड़ी का हर रंग। है तीखे नैन-नक्श, और पूर्ण हुई तस्वीर। है फिर भी कुछ अधूरी संग बिन यह तस्वीर। तो तस्वीर के बहाने हाथ मांगता हूं मैं। और अपने बेरंग जीवन में साथ मांगता हूं मैं।


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