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श्रद्धा शब्द सुमन श्रद्धांजलि- एक चिट्ठी दादा बालकवि बैरागीजी के नाम

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दादा आपकी जैसे ही सुन्दर, सूक्ष्म, एक कतार में अनुशासित, एक माला में गूथें मोतियों में पीरोई हुई भावपूर्ण शब्दों की चिट्ठी जब हाथ में आती थी, तब मन इतना प्रफुल्लित हो जाता था कि चिट्ठी को कई बार पढ़कर शब्दों के एक-एक भाव की गरिमा को मन की गहराई से समझना पड़ता था। चिट्ठी प्रेरक, शिक्षाप्रद, स्नेह से सिंचित होती थी। घर के, मित्रों के बारे मंे पूछताछ गौण होती थी। मेरे जैसे अनेक स्नेही, पाठकों, श्रोताओं ने आपकी चिट्ठी को संजोकर रखा हुआ होगा। परिचित/अपरिचित जिसने भी आपको चिट्ठी लिखी, उसका जवाब उसे ना मिला हो ऐसा कदापि संभव नहीं हुआ होगा। बदलते परिवेश में आपका इसके पीछे एक कारण यह भी था कि आप माँ हिन्दी भाषा के सशक्त पक्षधर थे। दादा आपकी चिट्ठी का तो सभी को बेसब्री से इंतजार रहता था। अंतिम साँस तक आपने पत्र लिखना जारी रखा। 88 वर्ष की पकी उम्र में आपकी कलम कभी थकी नहीं थी। आप पत्र पत्रिकाओं मंे निरंतर साहित्य साधना में तल्लीन रहते थे।
दादा जिस समय मुझे आपके विदाई की खबर मिली मैं परिवार सहित माँ के उत्तम कार्य हेतु हरिद्वार गया हुआ था। मन स्तब्ध, चेतन्य शून्य हो गया। सोचा खबर गलत हो जाये। पर जब अनेको फोन की घंटिया बजना शुरू हो गई तब उम्मीद की किरण जैसे लुप्त हो गई। सोच रहा था कि हरि के द्वार ये कैसी हरि की इच्छा है। मौन मुखर होकर हम सबको प्यार बांटकर आप अलविदा कह गये।
आप मेरे पिता पूज्य कन्हैयालालजी के सहपाठी थे। वर्ष 1983 में जब मैंने कविताएं लिखना, रेखांकन बनाना शुरू किया तब पिताजी मुझे आपसे मिलवाने मनासा ले गये। कविताओं से ज्यादा आप मेरे रेखांकन से प्रभावित होकर पिताजी से बोले- कानजी (वे इसी नाम से उन्हें पुकारते थे) इसमें संभावनाएं है जो माँ सरस्वती ने दी है। मेरे सर पर स्नेह हाथ रख बोले निरन्तर अभ्यास करो, उनका आशीर्वाद मेरी प्रेरणा बना। एक समय मेरे जीवन में ऐसा आया जब दादा आपकी कालजयी रचनाओं मंे मेरे रेखांकन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। मेरे लिये सौभाग्य की बात यह थी कि एक राष्ट्रीय कवि की रचनाओं में मुझ जैसे अदने से व्यक्ति को स्थान मिला। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में विशेष विशेषांकों में दादा आपकी रचनाओं के साथ मेरी रचनाएं छपी। तब आपने मुझे फोन कर अपना आशीर्वाद दिया। आपने मुझ जैसे कई नवोदित कलमकारों को तरासने का कार्य किया। आप मेरे लिये एक साहित्य की पाठशाला थे। दादा, आपने मुझे सहज भाव से चार-पांच साक्षात्कार दिये। जो राष्ट्रीय स्तर पर समाचारों पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। जिससे मेरी लेखनी को बल मिला। उनमें से एक साक्षात्कार आपके सुमधुर फिल्मी गीतों के सफर को लेकर था।
10 फरवरी 2018 आपके 88वें जन्मदिन के संदर्भ में दादा आपका पत्र दिनांक 28.02.2018 को मुझे प्राप्त हुआ। जिसमें आपने लिखा था- प्रिय लालबहादुर खुश रहो। कल की डॉक में मुझे होशंगाबाद के एक स्नेही मित्र ने मुझे लिखा आपका आलेख जो भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह-सवेरे के 18.02.2018 के अंक में छपा है, मुझे उपलब्ध करवा दिया है। लालबहादुर तुमने उसमें अच्छे प्रसंगों/भाषा शिल्प का उल्लेख किया है। बहुत ही प्रसन्नता की बात है। आपका इतना लिखना मेरे लिए एक ईश्वरीय साहित्यिक प्रसाद जैसा रहा है।
सन् 2011 में दादा जब दिल्ली से डॉ. वेदप्रताप वैदिक जी, पत्रकार अरूण वर्द्धन, राहुल देव सपरिवार आये, तब आपने मनासा से फोन कर मुझे कहा दिल्ली से मेहमान आये है। उन्हें नटनागर शोध संस्थान दिखाना है, इसलिये तुम्हें सबको लेकर सीतामऊ ले चलना हैं और मंदसौर में लंच मेरे साथ करना है। दूसरे दिन नियत स्थान पर मैं जब पहुंचा। एक तरफ खड़ा रहा। इतने लोगों में आपने मुझे ढूंढ निकाला और नजरें मिलते ही मंच पर बुलाकर मेहमानों से परिचय करवाया। दाल-बाफले, लड्डू का सेवन करते, लुत उठाते, मेहमान से बोले- रात के डिनर की छुट्टी। हम खिलायेंगे तो भी आप नहीं खा पायेंगे। यह भोजन ही इतना स्वादिष्ट है कि रात के डिनर की जरूरत ही नहीं पड़ती। बीच-बीच में दादा आप अपनी वाकपटुता से सभी को हंसने-हंसाने पर मजबूर कर देते थे।
‘सच को सच, खरा-खरा कहने से कभी नहीं चुकते थे। जब सीतामऊ जाने के लिये प्रस्थान करने लगे तो दो कारें हाऊसफूल हो चुकी थी। एक महाशय की तरफ दादा मुखातिब होकर बोले आपके रूचि का वहां कोई काम नहीं है- चलो लाल बहादुर तुम बैठों मेरे साथ। आपके इतने अगाध स्नेह से मेरा पूरा अंतर्मन भीग गया। आपसे मिले इस सम्मान से मैं अभिभूत हो गया। आपकी हृदयस्पर्शी सौम्यता सबका मन मोह लेती थी।
नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ पहुंचकर आपने इतिहासकार डॉ. रघुवीरसिंह के जीवन के बारे में सभी को बताया। 2-3 घण्टे वहां किताबों का अध्ययन किया। डॉ. वेदप्रताप वैदिकजी को उनका लिखा कोई आर्टीकल जो लगभग 40 वर्ष पूर्व लिखा गया था। जब संस्थान में देखने को मिला तो वे बहुत प्रसन्नचित्त हुए। दादा बोले- पूरे देश की शान है नटनागर शोध संस्थान। साथ ही संस्थान के प्रमुख डॉ. मनोहरसिंह राणावतजी की कुशलता पर पीठ भी थपथपाई। मैंने कुछ रेखांकन जब मेहमान पत्रकारों को दिखलाये तब वे मुझसे बोले आप यहां क्या कर रहे है ? आपको तो दिल्ली मे होना था। तब दादा बोले सरकारी नौकरी के साथ-साथ मातृ सेवा का दायित्व भी इसके कंधो पर है। इसलिये अभी दिल्ली दूर है। सम्पूर्ण परिवार की जानकारी आप सदैव रखते थे। सभी के हॉलचाल जरूर पूछते थे। आपकी स्मरण शक्ति अद्भूत थी। सीतामऊ से मंदसौर जाते समय आप अफीम के हरे भरे खेतों में मेहमानों को ले गये, उन्हें अफीम की खेती के बारे में पूरी जानकारी के साथ मन्दसौर की भौगोलिक जानकारी भी दी। मन्दसौर पहुंचते ही भगवान श्री पशुपतिनाथजी के दिव्य दर्शन करवाये। एक शिव भक्त के रूप में आपने भगवान पशुपतिनाथजी की अष्टमुखी मूर्ति का मुखारबिन्द अलौकिक वर्णन किया। दादा आप हिन्दी के प्रबल पक्षकार थे।  हिन्दी भाषा का अपमान कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। एक समारोह में जब मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे तब कम्पनी के सेल्समेन/दुकानदारों को प्रमाण पत्र तथा उपहार देकर सम्मानित किया गया। जब आपने उद्बोधन दिया तब सबसे पहले यह बात आयोजकों से की। आज मेरे हाथों बहुत गलत काम हुआ है। सदन में चुप्पी छा गई। जो प्रमाण पत्र मैंने दिये है वे सब हिन्दी में न होकर अंग्रेजी में हैं। मैं ठहरा हिन्दी का सेवक मातृभाषा का अपमान सहन नहीं कर सकता। जिन्हें भी ये प्रमाण पत्र प्राप्त हुए है वे घर जाकर अपने संस्थान में उल्टे टांग देना। पास खड़े आयोजकों को यह नसीहत भी दे डाली- भाई अगले सत्र से यह सब नहीं चलेगा।
दादा आपसे जुड़े ऐसे कई प्रसंग है जिनका जिक्र करू तो पन्ने कम पड़ जायेंगे। आपने राजनीति में रहकर एक कुशल राजनेता के रूप में कई प्रतिमान गढ़े। आप राजनीति को साहित्य से कोसों दूर रखते थे। आप सदैव कहते थे कि राजनीति मेरा कर्म है, साहित्य मेरा धर्म। अनेकोबार लालकिले की प्राचीर से आपने ओजस्वी कविताओं का वाचन किया। आप कवि सम्मेलनों के कुशल सूत्रधार हुआ करते थे। कवि सम्मेलनों में कविता सुनाने का आपका अंदाज इतना निराला था कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे। कवि नीरजजी को कवि मित्र और गीतकार प्रदीपजी एवं सुमनजी को अपना गुरू मानते थे।
राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आपने हिन्दी भाषा का परचम अपनी रचनाओं के माध्यम से फहराया। सभी प्रदेशों की सरकारों एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आपको अनेकों सम्मानों से विभूषित किया गया। एक कवि, गीतकार, राजनेता के रूप में आपने मंदसौर-नीमच जिले को राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान दी है वो सदैव स्मृति पटल पर अंकित रहेगी। दादा आपके नाम भर लेने से ही मंदसौर-नीमच जिले की पहचान बड़े शहरों में हो जाया करती थी।
पिछले माह की 22 तारीख को दादा मंदसौर आने वाले थे। एक दिन पूर्व फोन करके मुझसे कहा- पारिवारिक कार्यक्रम में आ रहा हूॅ। दूसरे दिन जब मैंने दादा को 12 बजे फोन लगाया तब मैंने कहा दादा आप कहां पर हैं ?
वे बोले- शास्त्री कॉलोनी में हूँ। परन्तु अभी तक लाल बहादुर का कहीं अता-पता नहीं है।
मैंने विनम्रता पूर्वक कहा- दादा बस 10 मिनिट में पहुंच ही रहे है।
प्रसंग संयोग का था उसी दिन वरिष्ठ पत्रकार डॉ. घनश्यामजी बटवाल को जनसम्पर्क विभाग मध्यप्रदेश शासन के द्वारा प्रदत्त पत्रकार कन्हैयालाल वैद पत्रकारिता पुरस्कार से मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित होकर लोटे थे। मैं डॉ. घनश्यामजी बटवाल, पत्रकार श्री ब्रजेशजी जोशी, फोटोग्राफर दिनेश जी कश्यप चारों आपका आशीर्वाद लेने शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन पहुंच गये। जब डॉ. घनश्याम बटवालजी ने सम्मान पत्र दिखाया, तो ढेर सारा आशीर्वाद उन्हें दे डाला।
दादा, आपके जन्मदिन पर अक्सर हम मनासा पहुंचकर आपसे मिलकर अभिभूत हो जाते थे। आज भी वैसा ही हुआ। आपसे मिलकर आपकी आत्मीयता में हम पूरी तरह से डूब गये थे।
ऐसा लगता था कोई वट वृक्ष की शरण में भरी तपती दोपहरी में हम ठंडी-ठंडी बयार का आनन्द ले रहे हो। वहीं विष्णु भैया से भी सौजन्य भेंट हो गई।
दादा कई मुद्दों पर आपने हमसे चर्चा की। दादा से जब भी मिलते तो उनका साथ छोड़ने का मन कभी नहीं करता था। हमारी विवशता थी, दादा को मनासा जाना था। दादा को प्रणाम करते हुए उनके असीम प्यार को, बाहों में समेटे हुए उनसे विदा हो गये। क्या पता था कि वे इतना प्यार, अनुराग लुटाकर चुपचाप मौन ऋषि की तरह जीवन उत्सव से महाउत्सव की यात्रा पर इतनी जल्दी निकल जायेंगे। 25 वर्ष पूर्व अपने पूज्य पिताश्री को खोया था। आज अपने साहित्यिक पिता को खो दिया है।
सदिया गुजर जायेगी, फिर ऐसा नूर चमन में पैदा न होगा।
जब तक धरा रहेगी, सूर्य पुत्र दादा आपकी लालिमा बरकरार रहेगी।
अब ना चिट्ठी सुन्दर हाथ में होगी
फिर भी आईने में आपकी मुस्कराहट होगी।
आपकी चिट्ठी के इंतजार में . . .
सदैव आपका
लाल बहादुर श्रीवास्तव
शब्द शिल्प, एलआईजी-ए15
जनता कॉलोनी, मंदसौर (म.प्र.)
मो.नं. 9425033960

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