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श्री पशुपतिनाथ मूर्ति क्षरण प्रसंग: ऐसा ठोस निर्णय आवश्यक है जिससे भक्तों की भावना भी आहत ना हो और मूर्ति भी अक्षुण्य रहे-बंशीलाल टांक

विगत कुछ वर्षों से मंदसौर का विश्वप्रसिद्ध भगवान श्री पशुपतिनाथ मंदिर जिस प्रकार विवादों के घेरे में लिया जाकर थोड़े-थोड़े समय के अंतराल से मीडिया की सुर्खियां बन जाता है यह न मंदिर के हित में और न ही नगर के हित में। मंदिर की विधिवत प्रबंध समिति है। मंदिर के हित-अहित का समस्त दायित्व प्रथमतया मंदिर प्रबंध समिति पर ही निर्भर करता है। परन्तु इससे बढ़कर मंदिर का अहित और क्या होगा कि जिस मंदिर की ख्याति नेपाल के श्री पशुपतिनाथ मंदिर के समान ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक बढ़चढ़कर भारत ही नहीं भारत से बाहर दूर-दूर तक दूसरे देशों तक फैल चुकी है यहां तक कि मुस्लिम खाड़ी प्रदेशों के श्रद्धालु भी इस मंदिर की चौखट पर आते है, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रतिमाह खोले जाने वाले मंदिर के भण्डारगृह में से निकलने वाली विदेशी मुद्राएं जिनमें खाड़ी प्रदेश राष्ट्रों की मुद्राऐं भी सम्मिलित रही है।  मंदिर के राष्ट्रव्यापी विस्तृत प्रचार-प्रसार के संबंध में स्थानीय प्रेस तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। मंदिर निर्माण से लेकर चाहे मनोकामना अभिषेक हो अथवा विगत 8 वर्षों से श्रावण मास के अंतिम सोमवार को महाकाल उज्जैन की तर्ज पर नगर में निकलने वाली भगवान श्री पशुपतिनाथ की शाही सवारी तथा प्रत्येक पर्व उत्सव पर आयोजित होने वाले महाभिषेक सभी को मीडिया ने पूर्ण श्रद्धा-सम्मान एवं समर्पित भाव से प्रचारित-प्रसारित कर भगवान श्री पशुपतिनाथ मंदिर की प्रसिद्धी को दूर-दूर तक फैलाने में अहम् भूमिका का निर्वहन करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी है। राष्ट्रीय न्यूज चैनल ‘‘आज तक’’ के प्रातःकाल 6.30 बजे से 7 बजे तक प्रतिदिन प्रसारित होने वाले स्थायी धार्मिक एपिसोड ‘‘धर्म’’ के अंतर्गत भारत के सुप्रसिद्ध समस्त धार्मिक तीर्थ स्थलों के दिग्दर्शन कराये जाने के तहत 9 जून 2014 को ‘‘देवों में देव मंदसौर के अष्टमुखी महादेव’’ शीर्षक से भगवान श्री पशुपतिनाथ मंदिर से लेकर मंदिर के गर्भगृह में होने वाली पूजा-आरती आदि के दर्शन के साथ ही दिनभर संचालित पूजा विधान आदि के संबंध में संज्ञान लेकर ‘‘आज तक’’ के स्थानीय संवाददाता ने बहुत ही सुनियोजित तथा सुव्यवस्थित ढंग से टी.वी. में दिग्दर्शन कराया था। जिसका लाभ इंटरनेट आदि के माध्यम से संपूर्ण विश्व ने लिया होगा। इस प्रकार एक तरफ जहां मंदिर को द्वादश ज्योर्तिलिंग की तरह ही त्रयोदश-तैरहवें ज्योर्तिलिंग के रूप में ख्याति प्राप्त कराने के प्रयास हो रहे हो, वहीं दूसरी और मंदिर में नित्य नये अथवा बन्द पड़े पुराने विवादों का उभरना  उचित प्रतीत नहीं होता इससे जहां मंदिर की प्रतिष्ठा को धक्का लगता है वहीं श्रद्धालुओं, नगरवासियों के मन में क्षोभ होना भी स्वाभाविक है।  विवाद प्रायः मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति पूजा-अभिषेक आदि को लेकर होता रहता है। मूर्ति क्षरण को रोकने के लिये कभी रैलिंग लगाई जाती है तो कभी नियमों के तहत अभिषेक आदि को प्रतिबंधित किया जाता है। इतना ही नहीं मूर्ति के नीचे के चारों मुख को नया स्वरूप प्रदान करने के लिये अपनाई जाने वाली विधि भी विवादों के घेरे से अछूती नहीं रही। 2009-10 में तत्कालीन प्रबंध समिति के अध्यक्ष कलेक्टर श्री जी. के. सारस्वतजी जिनके द्वारा मनोकामना अभिषेक प्रारंभ किया गया था, मंदिर को नवश्रृंगारित स्वरूप प्रदान करने के लिये और मूर्ति के नीचे के चारों मुख को ऊपर के चारों मुख की तरह सुन्दर रूप देने के लिये उन्हें मशीनों से तराशा भी गया था। मंदिर में स्थापित किसी भी मूर्ति को सुन्दर स्वरूप प्रदान करने के लिये मशीनों तथा चीनी-हथोंड़ों से तराशना आदि कार्य किया जाता है परन्तु यह तभी तक होता है जब तक विधिवत मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होकर उसे मंदिर में प्रतिष्ठित नहीं किया जाता है। एक बार जहां प्राणप्रतिष्ठा होकर मंदिर मंे मूर्ति को विराजित कर दिया जाता है फिर मूर्ति पर चीनी, हथोड़ा अथवा विद्युत मशीन आदि का उपयोग करना तो दूर रहा, यदि मूर्ति पर जोर से एक फूल का प्रहार भी कर दिया जाए तो उसे भी अपराध माना गया है।  दहीं आदि के अभिषेक करने से मूर्ति के क्षरण को रोकने के लिये औंकारेश्वर की तरह यदी रोक लगाई जाती है तो इसमें अनुचित क्या है? औंकारेश्वर तो लिंग रूप में है, फिर भी रोक लगा दी गई है। जबकि श्री पशुपतिनाथ की प्रतिमा मात्र एक शिवलिंग नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से मूर्ति रूप में प्रतिष्ठित है इसलिये होना तो यह चाहिये था कि गर्भगृह में पूजा एवं प्रवेश का अधिकार रामेश्वरम्, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, जगन्नाथ, द्वारकाधीश, तिरूपति, श्रीनाथ आदि कई प्रसिद्ध शेव एवं वैष्णव मंदिरों की तरह केवल पुजारी का ही होना चाहिये। गर्भगृह में श्रद्धालुओं को केवल दर्शन तक ही सीमित रखा जाना चाहिये। परन्तु संभवतया यह पहला ऐसा शिव प्रतिमा मंदिर है जहां मुख्य प्रबंध समिति द्वारा नियुक्त पुजारियों के अतिरिक्त प्रातःकालीन, संध्याकालीन, शयनकालीन तीन-तीन आरती मण्डल भी इसमें सहभागी होते रहे है। केवल एक मध्यान्ह कालीन मण्डल बचा है यदि वह भी होता तो फिर भगवान श्री पशुपतिनाथ को दिन में 1 बजे से 2 बजे तक 1 घण्टा जो विश्राम समय होता है, उसका अवसर भी श्री पशुपतिनाथ को नहीं मिल पाता।  आरती मण्डल चाहे पंजीकृत हो या अपंजीकृत इनके द्वारा शाही सवारी से लेकर 56 भोग आदि आयोजन एवं उत्सवों पर सहभागिता ने मंदिर की शोभा को ही द्विगुणित किया है, समय-समय पर मंदिर पर होने वाले उत्सवों में इन मण्डलों का विशेष सहयोग-सहभागिता सराहनीय होकर समझ में तो आती है परन्तु इसके अतिरिक्त अभिषेक, पूजन आदि विधान मंदिर में नियुक्त पुजारियों पर नहीं छोड़कर उनमें भी यदि हाथ बंटाने लगेंगे तो फिर अन्य श्रद्धालु अपने को क्यों पीछे रखना चाहेंगे।  मंदिर व्यवस्था संबंधी विवादों से ही व्यथीत होकर पत्रकार श्री जगदीश पुरस्वानी ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए मंदिर को एक प्रकार से प्रयोगशाला कहकर अपनी व्यथा दैनिक गुरू एक्सप्रेस में व्यक्त की थी। मंदिर प्रबंध समिति का भी व्यवस्था संबंधी पूर्ण संज्ञानता का अभाव कहिये अथवा संज्ञान होने के बावजूद ठोस निर्णय को क्रियात्मक रूप में अंजाम नहीं देना भी अनावश्यक रूप से विवादों को जन्म देता रहा है।  नगर अथवा मालवा क्षेत्र ही नहीं, महाकाल, औंकारेश्वर की तरह ही मंदसौर के भगवान श्री पशुपतिनाथ ने जहां पूरे प्रांत को गौरान्वित किया है, वहीं जैसा कि पूर्व में उल्लेख कर चुका हूॅ भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में भगवान श्री पशुपतिनाथ के साथ ही नगर का नाम उजागर हो रहा है। इसलिये इस मंदिर के संबंध में आरोपित-प्रत्यारोपित समस्त विवादों के घेरे से बाहर निकलकर प्रंबंध समिति तथा तीनों आरती मण्डल के पदाधिकारियों को एक साथ एक जाजम पर बैठकर समन्वयात्मक भावना से शांतिपूर्ण ऐसी पहल और हल निकालना चाहिये जिससे अनावश्यक रूप से मंदिर अथवा मूर्ति के संबंध में विवाद नहीं होने पाये। मंदसौर का आज विश्व पटल पर जो नाम हो रहा है वह भगवान श्री पशुपतिनाथ की विशाल अष्टमुखी प्रतिमा के कारण ही है। यदि विवाद होते रहे और भावना में बहकर नित्य किये जाने वाले अभिषेक के कारण मूर्ति का क्षरण होते-होते परिणामस्वरूप एक दिन यदि मूर्ति ही नहीं बचेगी तो फिर इतिहास के पन्नों तथा कालिदास के मेघदूत जैसी कुछ साहित्यिक कृतियों को छोड़कर मंदसौर भी पुनः वहीं पहुंच जाएगा जहां मंदिर स्थापना के 5 दशक पूर्व था।  मूर्ति क्षरण के संबंध में यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि वर्ष 2009 में तत्कालीन कलेक्टर श्री जी.के. सारस्वतजी द्वारा मूर्ति क्षरण का संज्ञान होने पर इसे रोकने हेतु उनके द्वारा ‘‘ऑर्चोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया’‘ के तत्कालीन आर्चोलॉजिकल केमिस्ट अधीक्षक श्री बी.आर. शर्मा औरंगाबाद (महाराष्ट्र) को पत्र लिखने पर उनके द्वारा 19 जून 2009 को मूर्ति क्षरण के कारण और उसे रोकने के उपाय संबंधी एक समीक्षात्मक प्रतिवेदन कलेक्टर को भेजकर उसमें तत्समय अनुमानतः 5 लाख रूपये व्यय होना बताकर लगभग 2 माह में कार्य पूर्ण किया जाना लिखा था। तत्पश्चात् कलेक्टर महोदय के अनुरोध पर एस.ए. भोपाल सर्कल भोपाल के श्री ए.वी.एस. चौहान असीस्टेंट ऑर्चाेलॉजिकल केमिस्ट तथा फोटोग्राफर श्री काशी नाथ के द्वारा भेजने पर ऑर्चोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया इंदौर डिविजन इंदौर के सुपरीडेंट ऑरची लॉजिकल केमिस्ट डॉ. आर.के. चतुर्वेदी द्वारा श्री पशुपतिनाथ निरीक्षण उपरांत विस्तृत समीक्षात्मक प्रतिवेदन दिया जाकर प्रतिवेदन के अंत में स्पष्ट संकेत दिये थे कि यदि मूर्ति को लम्बी उम्र तक अर्थात स्थायित्व प्रदान करना है तो अभिषेक में प्रयुक्त दूध, घी, शक्कर, जल आदि को मीनीमम अर्थात नियमित अनिवार्य अभिषेक के अतिरिक्त किये जाने पर प्रतिबंध का सुझाव दिया था।  समय की मांग को यह देखते हुए आवश्यक हो गया है कि भगवान श्री पशुपतिनाथ के श्री विग्रह के युग युगान्तर तक दिव्य दर्शन होते रहे, इसलिये प्रबंध समिति अध्यक्ष कलेक्टर महोदय के मार्गदर्शन में प्रबंध समिति को सर्वानुमति से ऐसा ठोस निर्णय लेना चाहिये जिससे भगवान श्री पशुपतिनाथ की नियमित सेवा करने वाले भक्तों की भावना भी आहत न हो और मूर्ति भी अक्षुण्य बनी रहे।

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