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श्री रामकथा के दूसरे दिन विधायक सिसोदिया और कलेक्टर श्रीवास्तव ने किया पौथी पूजन, बड़ी संख्या में श्रदालुओं ने किया कथा का रसपान

जीवन की हर समस्या का समाधान मुस्कराहट है-आचार्य श्री रामानुजजी

मंदसौर। आचार्य श्री रामानुजजी महाराज ने कहा कि पैसा महत्वपूर्ण है लेकिन सबकुछ नही। पैसे से व्यक्ति चश्मा ला सकता है लेकि़न द्रष्टि नही, पैसे से वस्त्र खरीद सकते है परन्तु चरित्र नही, पैसे से नोकर ला सकते है लेकिन बेटा नही, सौन्दर्य प्रसाधन से चेहरे की सुंदरता ला सकते है लेकिन भीतर की सुंदरता नही लाई जा सकती है। इसलिए पैसे का जितना काम है उसे करने दो, लेकिन जो पैसे से नही मिलता उसे पाने के लिए प्रयत्न करिये।परमात्मा का नाम ही महत्वपूर्ण है उसी से प्रेम पूर्वक उसका नाम लिया तो अंधेरे से प्रकाश का मार्ग मिल जाएगा।

पूज्य आचार्यश्री रामानुजजी श्री हरिकथा आयोजन समिति के तत्वावधान में आयोजित श्री रामकथा में व्यास पीठ पर विराजित होकर कथा का रसपान करा रहे थे। कथा प्रारम्भ होने से पूर्व मुख्य अतिथि विधायक यशपालसिंह सिसोदिया एवं कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने पोथी पूजन कर आचार्यश्री का आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर आयोजन समिति अध्यक्ष नरेंद्र अग्रवाल, सयोजक मोहनलाल शर्मा जांगिड़, सहसंयोजक जे पी बटवाल, सचिव सुरेश सोमानी, कोषाध्यक्ष सत्यनारायण छापरवाल भी उपस्थित थे। आचार्य श्री ने जन्मदिन पर विधायक यशपालसिंह सिसोदिया का शाल ओडाकर सम्मान किया। कथा श्रवण कराते हुए आचार्य श्री रामनुजजी ने कहा कि व्यक्ति को मुस्कराना नही भूलना चाहिए। मुस्कराहट प्रेम का प्रतीक है, मुस्कराने से ही सारे काम हो जाते है। रामचरित मानस एक कल्पवृक्ष है, इसकी छत्र छाया में कुछ देने नही बल्कि लेने के लिए आते है। बाल्यकाल की कथा इसका मूल है, आयोध्याकाल इसका तना है और लंका फल है।पेड़ कितना भी बड़ा हो यदि उसका मूल मजबूत न हो तो बेकार है और तना मजबूत न हो तो उस पर फल टिक नही सकता। आचार्य श्री ने कहा कि भगवान श्री महावीर कहते है ऐसे वस्त्र क्यो उतारे जिसके बाद यह कहना पड़े की भगवान के नाम से कपड़े भी उतार दिए। भगवान को पाना है तो मन को भक्ति में लगाना पड़ेगा, परन्तु मानव का स्वभाव है वह छोड़ने की चीजों को ज्यादा पकड़ता है। फेसबुक पर हजारो लाइक करने वाले फेस टू फेस मिलते है तो राम- राम भी नही करते। मानव जीवन की केवल मुक्ति नही बल्कि सायुज्य मुक्ति का प्रयत्न करना चाहिए। लंका कांड सायुज्य मुक्ति का साधन है। भगवान राम ने लंका में राक्षसो का विनाश किया लेकिन वास्तव में तो प्रभु ने उन्हें सायुज्य मुक्ति दे दी। भगवान और भक्त के बीच कोई नही हो, वही तो भक्ति है। आपने कहा कि किताब पड़कर कुछ लोग खुद को बुद्दिमान समझते हैं, लेकिन असल बुध्दिमानी तो ज्ञान से प्रेम की चिगारी लेते है। आचार्यश्री ने कहा कि साधुता, सदचरित्र, अनुभव और परमानंद की कथा श्री रामकथा है। प्रभु नाम की महिमा इतनी होती है कि राम के नाम पर बैठना महोत्सव बन जाता है।संसार को छोड़कर प्रभु तक जाने में नाम ही सहायक बनता है। प्रत्येक साधक को अपने पैरों से केवल मंदिर तक जाना होता है। मंदिर में जाने के बाद साधक का उद्धार किस प्रकार करना है यह सोचने का काम परमात्मा का है। इसलिए जब तक चेहरे पर मुस्कराहट है यह दुनिया आपकी है, व्यक्ति कभी भी चिंता को अपने पास में फटकने मत देना। जीवन मे जब लगे कि अकेले हो गए तो श्री हरि की क्षरण में चले जाना। व्यक्ति को अपने मन से अहंकार निकालकर प्रेम की चिगारी जलानी चाहिये। आदि, व्याधि और उपाधि से बचने का साधन सत्संग है। चेहरे मुस्कराते है लेकिन सच्चाई यह है कि मन में बैठा राम मुस्कराता है। श्री रामकथा को जब हनुमानजी ने लंका में सुनाया तो वहाँ कभी नही मुस्कराने वाले लोगो को उन्होंने मुस्कराने की शिक्षा दे दी।

भगवान शिव के विवाह का प्रसंग सुनाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि चंचलता कभी भी व्यक्ति को गिरा सकती है, संसार के अलग- अलग रूप है।यदि धर्म का आसरा लेकर प्रवेश करते है तो जीवन यात्रा सुखमय बन जाती है। कामना से संसार की यात्रा करेगे तो अंत मे रोना पड़ेगा, यदि कामना को छोड़कर चरित्र की भष्म लगाकर यात्रा करोगे तो जीवन आनंदमय हो जाएगा। क्रोध वैकुंठ के दरवाजे तक पीछा नही छोड़ता है।जीवन मे जब कोई समस्याए सताने लगे, दुःख दामन पकड़ ले तो ओरभु की शरण मे चले जाना ।जीवन बहती हुई अस्तित्व की धारा है, जीवन अटपटा पहली जैसा है। अब आपके हाथ मे है इसे रोते-रोते बर्बाद करना है या हस कर उसका आनंद लेना है। केवल जीवन जीना सीखने की आवश्यकता है। इसके लिये धीरज पहली आवश्यकता है।समाज, जाती और कुल के प्रति हर व्यक्ति में गौरव होना चाहिए।परिस्थिति कैसी भी हो अपने माता-पिता और बड़ो को कम न समझे। आज विज्ञान के प्ररपंच में परिवार से ज्यादा दूसरे लोग अच्छे लगते है।लेकिन वास्तव में व्यक्ति परिवार की नजर में खरा उतरेगा तभी जीवन सफल होगा। माता- पिता अपनी कर्म क्षमता और पुरुषार्थ से जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते है। कपड़े, शिक्षा और अन्य आवश्यकता की चिंता करते-करते माता- पिता के पास बिना घी और दाल की रोटी होती है। उन्हें लगता है कि ये हमारा सहारा बनेगे, लेकिन युवा यह कहते नही थकते की आपने तो हमारा जीवन ही बर्बाद कर दिया। उस समय उनकी आँख में जो आंसू होते है वह अभिशाप बन जाता है। माता पिता के सेवा कर ली तो श्री हरि मिल जायेंगे। रामचरित मानस भटके हुए युवाओं को रास्ता दिखाने का साधन है।लेकिन यह भी सत्य है कि कथा को सुनने से मुक्ति नही मिलती। इसके लिए तो कथा को जीवन मे चरितार्थ करना पड़ता है। संसार के पहले सद्गुरु का नाम माता है, जिस पिता ने उंगली पकड़ कर रास्ता दिखाया, छत्र बनकर रक्षा की वह पिता देवतुल्य है। हर मर्ज की दवा धीरज है इसलिए जीवन में धीरज रखो, परिस्थिति अनुकूल न लगे तो मुस्करा दीजिये। इसलिए जीवन मे कभी मुस्कराना मत छोडि़ये। संत की महिमा और धीरज की व्याख्या करते हुए आपने माता अहिल्या का उदाहरण दिया और कहा कि जिस दिन दुःख में रहोगे संत प्रभु का हाथ पकड़कर आपके दरवाजे पर ले आएगा। धीरज रखने से माता अहिल्या का उद्धार प्रभु ने किया। इसलिए जब भी आवेश आ जाये तो हनुमान चालीसा या किसी स्त्रोत का सहारा लेकर धीरज रख लीजिए।

आरती का लाभ लिया
दूसरे दिन की कथा विराम अवसर पर आरती का समाजसेवी जगदीशचंद्र छापरवाल, डॉ कुशल शर्मा, श्याम जाखेटीया, प्रथवीराज सोनी,राव विजयसिंह,पुरुषोत्तम शिवानी, महेश गर्ग, जगदीश काबरा, जगदीश पालीवाल, रमेश ग्वाला, के.सी अग्रवाल, राधेश्याम काला, ललित बटवाल, नवीन शर्मा जांगिड़, राजेन्द्र तिवारी, श्रीमती शांतिदेवी अग्रवाल मल्हारगढ़, श्रीमती लीला देवी अग्रवाल मन्दसौर ने लाभ लिया। कथा उपरांत प्रसादी का वितरण विधायक यशपालसिंह सिसोदिया की और से किया गया।संचालन वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जोशी ने किया।

 

 

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