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श्री रामकथा के सातवे दिन बड़ी संख्या में श्रदालुओं ने किया कथा का रसपान

अच्छे संकल्प और विचार कर्म के लिए प्रेरित करते है-आचार्य श्री रामानुजजी

मंदसौर। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किसी को भी बदनाम किया जा सकता हैं।वासना आदमी को बदल देती है, विश्वास नही बदल सकता। अच्छे संकल्प, अच्छे विचार आते ही उस कर्म के लिए प्रेरित हो जाते है लेकिन अचानक से पलटकर वापिस आ जाते हैं, क्योकि वासना के बेटे काम, क्रोध, मोह, माया भी तो अपना काम करती है। मजबूरी और स्वभाव में बहुत अंतर है। व्यक्ति को स्वयं तय करना है कि राम स्वभाव है और रावण मजबूरी। हैम स्वयं तय करे कि हमे राम का स्वभाव बनना है या रावण की मजबूरी।

यह बात पूज्य आचार्यश्री रामानुजजी ने श्री हरिकथा आयोजन समिति के तत्वावधान में आयोजित श्री रामकथा में व्यास पीठ पर विराजित होकर कथा का रसपान कराते हूए कही। कथा प्रारम्भ होने से पूर्व सूरजप्रकाश तोमर परिवार ने पौथी पूजन कर आचार्यश्री का आशीर्वाद लिया।इस अवसर पर श्री हरिकथा आयोजन समिति अध्यक्ष नरेंद्र अग्रवाल,संयोजक मोहनलाल शर्मा जांगिड़, सहसंयोजक जे.पी . बटवाल,सचिव सुरेश सोमानी, कोषाध्यक्ष सत्यनारायण सोमानी भी उपस्थित थे। आचार्य श्री रामानुजजी ने कहा कि उस जमाने मे केवल एक मंथरा की वासना ने रामराज्य को रुकवा दिया। आज तो ढेरों मंथरा की वासना समाज मे है। रामकथा का उद्देश्य होना चाहिए समाज धीरे -धीरे वासना शून्य हो जाए। भगवान ने भागवत गीता में कहा कि आप जैसे लोगों के साथ बैठोगे वैसे ही बन जाओगें। जीवन मे रामराज्य की कल्पना करने वाले लोगो को सीखने की आवश्यकता है की आपकी मुस्कराहट करुणामयी बन जाए तभी तो अपनापन आपकी मुस्कराहट में दिखेगा।प्रचंड भौतिक विभीषिका में जी रहे लोगों को भीष्म पितामह ने कहा कि यदी वासना में जिओगे तो रामराज्य निकल जाए। चंद दिनों की सत्ता के लालच में लोग अपना, स्वाभिमान, अपना देश सब कुछ बेचने को तैयार हो जाते है। आपने कहा कि व्यक्ति के हाथ मे पैसा आता है तो उसमें घमंड आ ही जाता है, लेकिन रामायण सिखाती है जो विरक्त हो, निर्माेही हो ऐसे लोगो के पास बैठो, जो हमारी वासना युक्त बुद्धि को दूर कर सके क्योकि आज समाज मे किसी को सत्ता की तो किसी को संपत्ति की शराब चढि़ है, सब एक दूसरे को मारने के लिए तैयार खड़े है लेकिन याद रखना जो जैसा करता है उसे वैसा ही भोगना पड़ता है। श्री राम के वनवास की कथा सुनाते हुये आपने कहा कि वासना और वासुदेव साथ नही रह सकते, परमात्मा और पाखंड साथ नही रह सकते, पुरुषार्थ के बिना अनन्त तक पहुँचना असंभव है इसलिए पराई निंदा, दुसरो के प्रति राग, द्वेष और वासना के पुष्प पोथीजी को समर्पित करे, :योकि जहां भगवान होते हैं वहां सभी मुस्कराते है, जिसके मन मे लालच न हो वह जानकारी नही जुटाता वह तो केवल प्रस्तुत हो जाता हैं। राग, द्वेष से जब तक मित्रता होगी तब तक यदि राम मिल भी जाये तो भी रामराज्य नहीं मिलता। रामराज्य की स्थापना राजाओं से नही होगी, क्योकि रामराज्य की स्थापना राजनीति से नही बल्कि धर्मनीति से होती है। राम राज्य के लिये बातों की नही पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। आपने कहा कि आज देश को भरत की भांति एक संत की आवश्यकता है ताकि भारत मे फिर से रामराज्य की स्थापना हो सके।आपने कहा कि राघव के जितने मंत्र गा लिए, अनंत यात्रा में वे हमारे साथ चलेंगे।

श्री रामकथा के सातवे दिन पोथी पूजन और आरती का लाभ अनिता दीदी गुरू, अनिल संचेती डॉन गोशाला अध्यक्ष, योगेश गर्ग नीमच, पत्रकारगण सर्वश्री संजय लोढ़ा, राधेश्याम बैरागी, निलेश शुक्ला, दिलराज शर्मा, महावीर जैन, राजेश मालू, ओमप्रकाश बटवाल, पंकज जैन, आर.के.नायर, राजीव खोरिया, अनिल पाटीदार, जीएल शर्मा, विक्रांत ठाकुर, राजेन्द्र चाष्टा, डीएस चन्द्रावत, शंकरलाल शर्मा बडोदा, सावन सांखला, पंकज डागा, राजेन्द्रकुमार दुबे रतलाम, अरूण प्रकाशमोदी, विरेन्द्र त्रिवेदी, ब्रजमोहन गर्ग, सुनील कटलाना, गिरिश कटलाना, महेन्द्र जाजु, आनंदीलाल पण्डया, अनिल सोमानी निम्बाहेडा, इन्द्र झेलावत, वासू सोमानी, निर्मल छापरवाल, बहादुरसिंह भाटी झाबुआ, विश्वनाथ सोमानी, अर्पितसिंह सिसौदिया पिटगारा, अनिल मित्तल, शंकरलाल बडोदा, परसराम जांगीड़, बजरंगभाई जयपुर, मुरलीभाई, बालमुकन्द पारिक, रंजना पारिक किशनगढ़, श्रीमती वीणा उपेले आदि धर्मालूजनों ने लिया । संचालन ब्रजेश जोशी और संजय वर्मा ने किया।

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