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संगठन के अभिभावक थे यजुर्वेदी जी

हमारे श्री विश्वनाथ जी यजुर्वेदी इस नश्वर संसार से विदा लेकर ईश्वर की शरण में चले गए। उनके विदा लेने के साथ ही मंदसौर और नीमच जिले के सामाजिक जीवन का एक और नक्षत्र अनंत में विलीन हो गया। वास्तव में वे उस पीढी के एक मजबूत हस्ताक्षर थे जिनकी निष्ठा, कर्म और परिश्रम के धरातल पर इस पूरे क्षेत्र में संगठनात्मक उपलब्ध्यिों की फसल लहलहा रही है। समाज जीवन में कार्य करने वाले लोग समयानूकूल और परिस्थितिजन्य आधार पर अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन पर यह जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही आ जाती है श्री विश्वनाथ जी यजुर्वेदी ऐसे ही लोगों में से एक थे। अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए संगठन और विचाराधारा पर किस मजबूती के साथ अडिग रहते हुए खडा रहा जा सकता है इसका अप्रतिम उदाहरण उन्होने अपने संपूर्ण जीवन में प्रस्तुत किया। कोई चाह नहीं, कोई मांग नहीं और सबसे बडी बात कोई अपेक्षा भी नहीं निस्वार्थ भाव से, पूरी लगन से, पूरी ध्येय निष्ठा के साथ संघ कार्य में उनकी संलग्नता इसी बाता से प्रमाणित होती है कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्यभारत प्रांत के सह प्रांतकार्यवााह बने। सफेद धोती कुर्ता उनकी पहचान था तो धोती का एक कोना हाथ में उनकी शैली जो हर किसी को प्रभावित करती थी। आज अनूकूल परिस्थितियों में काम करने वाले संगठन के कार्यकर्ताओं को अंदाजा भी नहीं है कि किन विपरीत और कठिन परिस्थितियों में यजुर्वेदी जी ने संगठन की मशाल को थामे ही नहीं रखा बल्कि उसे आगे भी सौंपा। एक सफल और ज्येष्ठ अभिभाषक के रूप में मंदसौर और नीमच जिले में ख्याति प्राप्त यजुर्वेदी जी का अधिंकाश कार्यक्षेत्र मंदसौर ही रहा बाद में वे मनासा में निवास करने लगे थे लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पडता। हमारे यहॉं मान्यता है कि जहॉं राजा होता है वहीं उसका राज्य होता है इस मान्यता को यजुर्वेदी जी के साथ जोड दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संगठन मर्मज्ञ के रूप में उनकी ख्याति, उपस्थिति और विश्वसनीयता ऐसी थी कि उनसे राय लिये बिना इन दोनों जिलों में कोई कार्य शायद ही होता हो। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री सुदंरलाल जी पटवा हों या श्री कुशाभाउ ठाकरे, संघ के वरिष्ठ प्रचारक बाबा साहेब नातू हों या प्रभाकर जी केलकर, संघ के अन्य अनुशांगिक संगठनों के वरिष्ठ कार्यकर्ता हों या फिर सामाजिक क्षेत्र के अन्य प्रमुख व्यक्ति सभी श्री यजुर्वेदी जी की संगठनात्मक शक्ति से परिचित थे और उसी के अनुरूप उन्हे सम्मान देते थे। उनका और पिताजी श्री ओमप्रकाश जी पुरोहित का बहुत लम्बा साथ रहा। कोर्ट में भी और संघ कार्य में भी। आज उनके निधन से एक अपूरणीय क्षति इस अंचल को हुई है तो यह अनुभव करने के पीछे कारण हैं, वे कभी सक्रिय राजनीति में नहीं आए और ना ही उन्होने कभी ऐसी चेष्टा भी की हर समय संगठन के आदेश के पालन और संघ के कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों की चिंता करने की उनकी व्यवाहारिक आदत ने उन्हे सभी का अघोषित अभिभावक बना दिया था और संगठनात्मक अभिभावक के रूप में उन्होने अपनी भूमिका का बखूबी निर्वहन भी किया। सामाजिक क्षेत्र में संस्कारों के आग्रही विश्वनाथ जी का पूरा परिवार एक संघ परिवार के रूप में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन आज भी कर रहा है। प्रफुल्ल जी ने मंदसौर में अपने परम्परागत वकालात के व्यवसाय के साथ भारतीय जनता पार्टी में अपनी भूमिका बनाई है तो भाई सुनील मनासा में इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। श्री यजुर्वेदी ने अपने व्यक्तिगत जीवन में अपने बडे पुत्र अशोक के बिछोह को झेला परन्तु उनके पुत्र डॉ. हिमांशु को सेवा के क्षेत्र में अपने सामने राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिलते हुए देखने से उनके दुख में थोडी कमी आई होगी। अपने नाम विश्वनाथ के अनुरूप उन्होने इस क्षेत्र के सामाजिक जीवन में जो ख्याति प्राप्त की है वह कार्यकर्ताओं और जनमानस के दिलों पर हमेशा अंकित रहेगी। जब विश्वनाथ जी संघ के विभाग संघचालक थे तब मैं समर्पण शाखा का मुख्यशिक्षक था और संघ की कार्यपद्धति के अनुसार जब संघचालक शाखा पर आते हैं तो उपस्थित सभी स्वयंसेवकों को ध्वज की ओर मुख करके खडे रहना होता है तब तक जब तक कि संघचालक जी ध्वज प्रणाम ना कर लें। श्री यजुर्वेदी जी दैनिक रूप से समर्पण शाखा पर प्रार्थना के लिये आते थे और मुख्यशिक्षक के नाते मुझे रोज ध्वजाभिमुख की आज्ञा देनी होती थी वो स्मृति आज मानस पटल पर अंकित हुई। मेरे जैसे सैंकडों कार्यकर्ता इस मंदसौर, नीमच जिले के हैं जिनके साथ कोई ना कोई अनुभव श्री यजुर्वेदी जी का रहा होगा उन सभी की स्मृतियों को आज उनके देवलोकगमन ने झकझोरा है। संगठननिष्ठा क्या होती है? ये विश्वनाथ जी हम सभी को सिखा कर गए हैं उन्होने अपनी जिम्मेदारी का अपने संपूर्ण जीवन में ईमानदारी से निर्वहन किया और विरासत सौंप कर विदा ली है। विश्वनाथ जी संघ के कार्य की इस पूरे क्षेत्र में एक ऐसा मजबूत आधार स्तंभ अपने जीवन में रहे हैं जिसके हटने से निश्चित रूप से संगठन कार्य को नुकसान होता लेकिन उन्होने ऐसा नहीं होने दिया उन्होने अपने स्तंभ के साथ संगठनकार्य के लिये इतने स्तंभ खडे कर दिये कि वह मजबूत ही होगा उसके धाराशायी होने का क्षणमात्र भी अंदेशा नहीं है। श्री विश्वनाथ जी यजुर्वेदी के कर्तृत्व, व्यक्तित्व, आचरण और संगठननिष्ठा को कोटि कोटि प्रणाम और श्रद्धांजली।

– डॉ. क्षितिज पुरोहित, मंदसौर 9425105610

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