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संजय उघान में सुयश रामायण मण्डल द्वारा आयोजित श्रीमद भागवत  कथा का हुआ समापन, कथा के अंतिम दिवस श्रीकृष्ण सुदामा की मित्रता का वृतान्त कराया गया श्रवण

मंदसौर। श्री सुयश रामायण मण्डल जनता कॉलोनी के तत्वाधान में दिनांक 31 दिसम्बर से संजय गांधी में चल रही श्रीमद भागवत कथा का शनिवार को समापन हुआ। कथा समापन के अवसर पर 7 दिवस से व्यासपीठ पर विराजित होकर कथा का  रसपान  कराने वाली परम पूज्य श्री मजुलता दीदी का स्वागत व सम्मान भी किया गयां। श्री सुयश रामायण मण्डल के मार्गदर्शक परम पूज्य श्री दशरथ भाईजी व अन्य सदस्यो ने उन्हे शॉल श्रीफल भेट कर सम्मान किया। इस अवसर पर कथा समापन में पधारे अतिथियो ने भी भगवान श्रीराम का चित्र भेटकर व माला भेटकर सम्मान किया। कथा समापन पर श्री नाहरू भाई जैनरेट ने सामप्रदायक सोहार्द की मिसाल पेश करते हुए कथा आयोजन पर 21 हजार रू देने की घोषणा की। श्री सुयश रामायण मण्डल ने उनका भी सम्मान किया।  कथा समापन के अवसर पर सुयश रामायण मण्डल ने प्रसादी भी वितरित की। श्रीमद भागवत कथा के अतिम दिवस पपू श्री मंजुलता दीदी ने भगवान श्रीकृष्ण व उनके मित्र सुदामा की मित्रता का वृतान्त श्रवण कराया। श्रीकृष्ण व सुदामा ने एकसाथ विघा अध्ययन किया।

भगवान श्रीकृष्ण के मित्र गरिब ब्राहमण था। वे बडी मुश्किल से अपना जीवन निर्वहन कर पाते थे। प्रतिदिन गांवो से भिक्षा मांगकर लाते थे। बडी मुश्किल से उनका गुजाराहोता था। ऐसे गरीब मित्र का जब श्रीकृष्ण की दवारका में आगमन हुआ तो कृष्ण रूकमणी सहित सभी रानीयों ने उनका स्वागत सत्कार किया। श्रीकृष्ण ने कई दिनों तक उन्हे अपने राजमहल में आतिथ्य सत्कार प्रदान किया तथा उसी दौरान श्रीकृष्ण ने सुदामा परिवार के लिये जो भी संभव हो सकता था किया। श्रीकृष्ण सुदामा की मित्रता का यह वृतान्त हमे प्रेरणा देते है कि हम गरीब व जरूरत मंद मित्र की  सदैव सहायता करे। मित्रता को अमीरी गरीबी के तराजु में तौले मित्र कोई भी हो अमीर हो या गरीब हो उसकी मित्रता की कद करे। आपने कहा कि श्रीकृष्ण ने द्वारा द्ववाराधीश होने के बावजुद गरीब सुदामा का इतना आतिथ्य सत्कार किया जबकि हमारे घर पर कोई रिश्तेदार या मित्र आता है हम उसका आतिथ्य सत्कार नही कर पाते है। इसलिये जीवन में आतिथ्य सत्कार के अवसर ने नही चुके।

मृत्यु से डरे नही- परम पुज्य श्री मंजुलता दीदी ने कहा कि श्रीमद भागवत कथा में श्री शुकदेवजी ने मृत्यु से नही डरने का संदेश दिया। शुक्रदेव ने राजा परिक्षित को जीवन व मृत्यु का भेद बताते हुए मृत्यु के भय से दूर रहने की प्ररेणा दी। जीवन में यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से भयभीत रहता है। तो उसे सर्वप्रथम श्रीमदभागवत श्रवण करना चाहिए। यह ग्रंथ मानव के सभी प्रकार की जीवन एवं मृत्यु सम्बधित जिज्ञासाओं का समाधान कर देता है। शुक्रदेवजी महाराज ने राजा परिक्षित को जीवन व मृत्यु के रहस्य से अवगत कराते हुए ऐसा जीवन जीने की प्ररेणा दी जो मंगलकारी हो।

प्रचार प्रसार की भुख मन को  पीडा देती है- पपू भी मंजुलता दीदी ने कहा कि लोग मान सम्मान के ज्यादा भुखे है। वे लोग ज्यादा दुखी  रहते है।  कभी माला पहनाने नही बुलाया तो दुखी कभी पेपर में नाम नही आया तो दुखी लेकिनजो लोग मान सम्मान की लालसा नही रखते है वे अधिक सुख अनुभव करते है। इसलिये मान सम्मान की लालसा का त्याग करे तथा जीवन में ऐसा कर्म करे कि तुम्हे स्वत ही मान सम्मान मिले। आपने कहा कि महापुरूष अपमान से भी सम्मान देखते है। भगवान शिव का जब पार्वती से विवाह हुआ तो पार्वति से विवाह हुआ तो पार्वति के माता पिता शिव का सम्मान रूप देखकर चकित रह गये ऐसे में शिव ने इसे अपमान नही समझा और उससे भी सम्ममान की भावना देखी।

जन्म लेने वाले सभी प्राणीयो की मृत्यु होती है- पपू श्री मंजुलता दीदी ने कहा कि जीवन में मृत्यु सभी को आनी है। जिसमें पृथ्वी पर जन्म लिया उसे एक न एक दिन मरना ही है। इसलिये ऐसा कर्म करो कि जब मृत्यु हो तो सगे सम्बधित पडोसी सब रो। ऐसा कोई कार्य तक करो कि तुम्हारी मृत्यु होने पर लोग कहे कि अच्छा हुआ धरती पर बोझ कम हुआ। जीवन में यदि तुम्हारी मृत्यु के बाद लोग खुशीया मनाये तो मान लेना चाहिए तुमने जीवन में पाप ही पाप किये हे।

प्रशंसा करने वालो से सावधान रहो- आपने कहा कि यदि कोई मित्र या रितश्तेदार तुम्हारी सदैव तारिफ करे तो उसे अपन शुभचिन्तक मत समझना क्योकि प्रशंसा करने वाले लोग कभी भी हमें वास्विकता का अनुभव नही होने देते है। तुम्हारे सामने तुम्हारी बुराई या दोष कराये तो उससे नाराज होने की बजाय उसे सच्चा मित्र मानो। कबीर दास जी ने भी ऐसे ही मित्रो को सच्चा मित्र बताया है। जो तुम्हारी बुराईया तुम्हे बताता हो ऐसे मित्रो की हमे सदैव कद्र करना चाहिए।

माता पिता की सेवा का अवसर ना चुके- परम पूज्य दीदी ने कहा कि जब तक माता पिता कमाते है तब तक संतान उनकी कद्र करती है लेकिन जब माता पिता बुढे हो जाते है तो संतान उनकी नही सुनती है। इसी प्रकार जब तक गाय दूध देती है हम उसे घर के आंगन में उसकी देख रेख करते है। लेकिन जब वह बुढी हो जाती है तो उसे कसाइ के पास बेच देते है या सडक पर छोड देते है। यह उचित न ही है वृद्ध माता पिता व गौवंश की देखरेख करना चाहिए। नैतिक कर्मव्य है हमें अपने कर्तव्य से कभी विमुख नही होना चाहिए।

शराब सेवन से बचे- परम पूज्य श्री मजुंलता दीदी ने कहा कि जहा शराब का सेवन होताहै तथा अनुसूचित आचरण करने वाली स्त्रियो निवास करती है वहॉ पाप अधिक होता है। मानव को यदि पाप से बचना है तो शराब व पर स्त्रीगमन से बचना चाहिए। शराब का अधिक सेवन शरीर को हानि पहुॅचाता है। इसिलये मान को इनसे बचना चाहिए।

पश्चाताप की भावना से पाप का फल आधा हो जाता है-पापकर्म होने पर पश्चाताप की भावना मन में रखना चाहिए। जीवन में यदि पाप होने पर पश्चाताप की भावना आती है तो पाप का फल आधा हो जाता है । मानव को अपने जीवन में प्रतिदिन पाप व पुण्य का चिंतन करने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए इसी से जीवन में पाप  पुण्य का बेलेन्स बना रहेगा।

संतो के सानिध्य का महत्व समझे- मानव को जीवन में संतो के सानिध्य का महत्व समझना चाहिए। क्योकि संतो का सानिध्य बहुत ही पुण्य उदय से मिलता है। पुण्य कर्म के उदय के बिना संतो का सानिध्य कभी भी मानव को नही मिल पाता है। जीवन में पुण्य कर्म है तो संतो का सानिध्य और दर्शन होता है। भागवान राम ने आपने अनुज भरत को आयोध्या के वनवास के दौरान चित्रकुट में संतो के सानिध्य की महिमा कही है।

इन्होने की भागवत पौथी की आरती- कथा समापन के अवसर पर पूर्व जिलाध्यक्ष श्री मानसिंह माच्छपूरिया, जिला सहकारी बैक के डायरेक्टर श्री भोपालसिंह सिसौदिया ने भागवत पौथी की आरती की और उसके बाद कथा समापन के उपलक्ष्य में आयोजित हवन में भी आहुति दी। शनिवार की कथा के शुभारंभ के मौके पर जांगडा पोरवाल समाज अध्यक्ष श्री प्रवीण गुप्ता ने भागवत पौथी का पूजन किया। शुक्रवार को भागवत कथा में विधायक श्री यशपालसिंह सिसौदिया व पूर्व न्यायाधीश श्री सक्सेना ने पहुॅचकर भागवत पौथी की आरती की।

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