समलेंगिकता क्या भारतीय संस्कृति में स्वीकार योग्य है?

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भारतीय समाज में जियो और जीने दो का भाव लिए यह समाज आदिकाल से हीं वसुधैव-कुटुम्बकम् में सहजीवन की कल्पना को साकार किया है। यही कारण है कि भारत सदियों तक विश्व गुरू के रूप में विश्व को दिशा देता है। पर आज हम कौन सी दिशा दे रहे है यह हमें सोचना होगा।
 
प्रकृति के इस नियम के विपरीत अपनी अवधारणा को समान लिगों बाले लोगों के साथ जोड़ना अमानवीय, अप्राकृतिक एवं असामाजिक है जैसे जैसे हम तथाकथित वैश्विकरण के अंधयुग में प्रवेश किया यह बंधन ढ़ीला पड़ता जा रहा है। किसी भी धर्म के धार्मिक ग्रन्थ में समलेंगिकता स्वीकार नहीं है उनमे इसका उल्लेख तक नहीं है। हमारे देश की पहचान हम धीरे धीरे खोते जा रहे है। आगे चल कर ऐसा होगा की जब एक सामान लिंग वाले रोड पर या कही सार्वजानिक स्थान पर कुछ गलत हरकत करते हुए पाए जायेगे और आप उनपर कोई ऊँगली नहीं उठा पाएंगे। आपके बच्चे आप से सवाल करेंगे तो आप जवाब नहीं दे पाएंगे। हम किस नई संस्कृति को जन्म दे रहे है यह सोचने वाला विषय है?
 
दो समान लिंग के व्यस्कों के बीच आपसी सहमती से बनाया गया शारीरिक संबध एक धृणित अप्राकृतिक अपराध है जिसे किसी भी दृष्टि से सही नही कहा जा सकता है। यह एक सामाजिक अभिषाप है जिसे देश संचार के धृणित प्रयोग से बल मिला है। यह अप्राकृतिक यौनाचार दो व्यस्कों की कुंठित मानसिकता की उपज है जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए। ऐसे समलैंगिक लोगों के कारण हीं आज समाज एड्स जैसे गंभीर बीमारियों के परिणामों से भुगत रहा इससे सिर्फ वह परिवार हीं नही बल्कि पुरा समाज प्रभावित हुआ है। उन्मुक्त वातावरण के पैरोकार प्रकृति के नियम के विरूद्ध जिस प्रवृति का पोषक बनें है वह भारतीय युवा के लिए अत्यन्त घातक है। आज इन्हीं उन्मुक्त वातावरण और तथाकथित प्रगतिशीलता ने देश को इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया। इस घृणित व कुंठित मानसिकता को समय समय पर भारतीय सिनेमा उद्योग ने भी हवा दिया है। निरतंर हो रहे सामाजिक मूल्यों के पतन में एसे विचार समाज के लिए घातक है। इस देश के लिए चाहे समलैगिकता हो लीव-इन-रिलेशन दोनों सामाजिक अभिशाप है। भारतीय सामाजिक चिन्तकों और बुद्धिजीवियों को इसके लिए आगे आना चाहिए। ऐसे समाज विध्वसंकों से बचाना भारतीय समाजशास्त्रीयों का राष्ट्रीय व नैतिक दायित्व है ताकि वो सरकार पर दबाव बनाये और कानून लेकर आये।
 
अधर्म की घिरी घटा कुचक्र हैं पनप रहे, पुण्य धर्म भूमि पर अधर्म कर्म बढ़ रहे।
व्यथा विशाल देश की आज हम समझ सकें, शुद्ध राष्ट्रभाव से देश यह महक उठे।।

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