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समाज सेवक

जीवन की सार्थकता स्वयं से हटकर दूसरों के लिए सोचना भी है। यह संदेश यदि फलों से लदे वृक्ष, फूलों से लटकती डालियाँ दे सकती हैं तो फिर मनुष्य क्यों नहीं। तुलसीदासजी ने भी रामचरित मानस में कहा है- ‘परहित सरस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई’।

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