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सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में SC/ST कर्मियों को आरक्षण जरूरी नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली : सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कर्मियों के पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। मामले पर सुनवाई करते हुए पांच जजों की पीठ ने इसे सात जजों की पीठ के पास भेजने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण पर नागराज मामले में फैसले को सही बताते हुए कहा कि इस पर दोबारा से विचार करने की जरूरत नहीं है।



शीर्ष अदालत ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए आंकड़े जुटाने की जरूरत नहीं है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य चाहें तो अपने यहां पदोन्नति में आरक्षण लागू कर सकते हैं। शीर्ष न्यायालय में याचिकाएं दायर कर अनुरोध किया गया था कि वह 2006 के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। इस फैसले में एससी-एसटी कर्मियों को पदोन्नत देने के लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ में जस्टिस कुरिएन जोसेफ, आरएफ नरीमन, एसके कौल और इंदु मल्होत्रा शामिल हैं। पीठ ने इस मामले में केंद्र सहित अन्य पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद गत 30 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

बता दें कि 2006 में पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के पिछड़ेपन पर संख्यात्मक आंकड़ा देने के लिए बाध्य हैं। कार्ट ने कहा कि इन समुदायों के कर्मचारियों को पदोन्नत में आरक्षण देने से पहले राज्य सरकारी नौकरियों में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व एवं प्रशासनिक कार्यकुशलता के बारे में तथ्य पेश करेंगे।

इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू कर अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय (एससी/एसटी) से आने वाले सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि जाति और पिछड़ेपन का ठप्पा अब भी समुदाय के साथ जुड़ा हुआ है।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पांच न्यायाधीशों वाली और प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ को सूचित किया कि ऐसा कोई फैसला नहीं है जो यह कहता हो कि एससी/एसटी समुदाय के समृद्ध लोगों को क्रीमी लेयर सिद्धांत के आधार पर आरक्षण का लाभ देने से इनकार किया जा सकता है।

वेणुगोपाल से पूछा गया था कि क्या क्रीमी लेयर सिद्धांत को लागू करके उन लोगों को लाभ से वंचित किया जा सकता है जो इससे बाहर आ चुके हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एससी/एसटी समुदाय के पिछड़े लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंच सके।

शीर्ष विधिक अधिकारी ने बताया कि हालांकि समुदाय के कुछ लोग इससे उबर चुके हैं लेकिन फिर भी जाति और पिछड़ेपन का ठप्पा अभी भी उन पर लगा हुआ है। पीठ में न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा भी हैं।

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