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सांसद बालकवि बैरागी : 10 फरवरी जन्म दिवस पर विशेष

प्रथम स्मरण- 10 फरवरी जन्म दिवस पर विशेष : ’’चाहे सभी सुमन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा’’

लाल बहादुर श्रीवास्तव (राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित)

चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा

उक्त पंक्तियाँ देश के प्रख्यात साहित्यकार कवि, सांसद बालकवि बैरागी की कविता ’अपनी गंध नहीं बेचूंगा’ उस समय के दौर की है जब राजनीति में पार्टियां खरोद फरोख्त करती हुई अधिक नजर आती थी। स्वार्थवश नेता दल बदल कर लेते थे लेकिन बालकवि बैरागी उन राजनीतिज्ञों में से एक थे जिन्होंने अन्त तक अपनी शुचिता को अक्षुण्य बनाए रखा। कभी मौका परस्ती का साथ नहीं देते हुए जीवनभर संघर्षशील रहे। सन् 1968 के समय की बात है जब बालकवि बैरागी म.प्र. विधानसभा में कांग्रेस के विधायक थे, संसदीय सचिव भी थे। अचानक दल बदल की आँधी चली, कांग्रेस की सरकार गिर गई। ग्वालियर घराने की राजमाता सिंधिया की उठापटक से श्री गोविन्द नारायणसिंह के नेतृत्व में संविद सरकार बनी, तब राजमाता विजियाराजे सिंधिया ने बालकवि बैरागी के पास एक संदेश भेजा कि दल बदलकर हमारी पार्टी में आ जाओ, तुम्हारा मंत्री पद बना रहेगा। ऐसी स्थिति में प्रायः राजनेता स्वार्थवश लुढ़क ही जाते है अनेक नेता लुढ़क कर राजमाता के पक्ष में कांग्रेस से चले गए। लेकिन बालकवि बैरागी ने एक अनूठा उत्तर उस समय की सर्वाधिक ताकतवर और प्रभावशाली नेता राजमाता सिंधिया को दिया – ’’राजमाता जी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ, पूरी विन्रमता के साथ आपका आदर करता हूँ, लेकिन मैं आपकी बात नहीं मान सकता। मैंने आज सुबह ही अपने हाथ पैरों के नाखून कांटे है, आपकी सारी शक्ति और सम्पदा भी इन्हें नहीं खरीद सकती। अतः मुझे भी खरीदने की मत सोचिएगा। यह चरित्र था साहित्यकार, राजनीतिज्ञ बालकवि बैरागी का। जिन्दगी भर स्वच्छ राजनीति की लेकिन राजनीति की ’काजल की कोठरी’ में अपने दामन पर कभी दाग नहीं लगने दिया।

वे राजनीति को अपना धर्म एवं साहित्य को कर्मक्षेत्र मानते थे। कभी एक दूसरे को इसमें समावेश नहीं होने दिया। छल, प्रपंच, आडम्बर से कोसो दूर। सबके चहेते चाहे वे विरोधी पार्टियों के सदस्य हो उन सबसे घुलमिलकर रहते थे। उन्हें अपनी रचनाधर्मिता पर माँ सरस्वती का वरदहस्त प्राप्त था। दोनों क्षेत्रों में वे अति विनम्र थे और दृढ़ भी। इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया तब उन्होंने इसका पुरजोर विरोध स्वयं इंदिरा गांधी के सम्मुख दर्ज करवाया और कहा आपात काल लगाना जनता को परेशानियों में डालने जैसा कार्य कांग्रेस ने किया है इसका परिणाम भी शीघ्र सामने आएगा और हुआ भी ऐसा ही। दिल्ली से कांग्रेस की सत्ता हाथ से निकल गई। इनकी दृढ़ता उन्हें कभी भी विचलित नहीं कर सकती थी। बड़ों को आदर देना, छोटों को आशीष, उनका सबसे बड़ा गुण था। दो बार म.प्र. शासन में कांग्रेस की सत्ता में मंत्री, राज्य सभा सदस्य एवं सांसद रहे। इंदिरा गांधी से लगाकर सोनिया गांधी तक उनके भाषणों के वे भाषण लेखक थे। प्रधानमंत्री से लेकर एक पान वाला तक उनका प्रशंसक था।

बालकवि बैरागी एक राजनेता ही नहीं श्रेष्ठ संचालक, एक कुशल वक्ता के साथ-साथ श्रेष्ठ गद्य लेखक भी थे। उनकी कालजयी रचनाएं इतिहास के पन्नों पर अजर अमर रहेगी। उन्होंने 26 फिल्मों के सुमधुर गीत लिखने के साथ-साथ कई फिल्मों में पटकथाएं लिखी। भादवामाता, रानी लालपरी फिल्म के गीत व पटकथा लिखी। वे राष्ट्र के ऐसे मंगल कवि थे और रहेंगे, जिनकी रचनाओं ने देश विदेश में बड़ी धूम मचाई। मालवी भाषा को देश भर में अपनी श्रृंगार रचना ’पनिहारिन’ से शीर्ष पर पहुंचाने वाले राष्ट्रकवि बालकवि बैरागी हिन्दी भाषा के सशक्त हस्ताक्षर थे। उनका वर्षा गीत ’’बादरवा अईग्या,’’ लखारा लोकगीत ग्रामीण महिलाओं के कंठों का मधुर लोकगीत बना। संगीतकार जयदेव ने रेशमा और शेरा फिल्म के लिए तू चंदा मैं चाँदनी गीत बैरागीजी से लिखवाया जो सुनील दत्त और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया उसे स्वर सम्राज्ञी लता मंगेश्कर ने दिया था उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ और आज भी है। सन् 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध में जब करारी हार पाकिस्तान को मिली तब इसकी खुशी में लाल किले की प्राचीर पर हुए कवि सम्मेलन में तत्कालिक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के सम्मुख जब यह कविता

’’जबकि नगाड़ा बन ही गया सरहद पर शैतान का

तो नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का’’

सुनाई तब प्रधानमंत्री शास्त्रीजी बड़े प्रभावित हुए और उन्होंने गले लगा लिया। महावीर स्वामी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था। यही कारण था कि वे 20-25 देशों में घुमने के दौरान भी महावीर स्वामी की आहार संहिता का परिपालन करते थे। अभावों में रहकर जीवन भर संघर्ष कर उन्होंने अपने को इतना अनमोल रत्न बना लिया था। उनका जीवन एक कल्प ऋषि मुनि की तरह था। उनका सान्निध्य पाकर पत्थर दिल भी पारस हो जाया करते थे। वे डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन और रामधारीसिंह दिनकर के प्रिय शिष्य रहे। जब कवि दिनकरजी विदा हुए तब बैरागी जी की कलम ने श्रद्धांजलि लिखी-23 अप्रेल की रात दिनकर ने तिरूपति मंदिर में जाकर भगवान विष्णु के दर्शन किए और मंदिर प्रांगण में कविता सुनाने लगें। अश्रु धार निकली तो पूरा प्रांगण रोया, फिर रामेश्वरम् में कविता पाठ किया, फिर सोये तो न उठें – अखबार ने अगले दिन लिखा ’हिन्दी का सूरज दिनकर डूब गया उन्हें प्रातः प्रणम्य दिनकर को शत शत नमन्।

’’क्या कहा। क्या कहा, कि दिनकर डूब गया

दक्षिण के दूर दिशांचल में, क्या कहा कि गंगा समा गई।

रामेश्वर के तीरथजल में। क्या कहा। क्या कहा

कि नगपति नमित हुआ ? तिरूपति के घनी पहाड़ों पर

क्या कहा। क्या कहा। कि उत्तर ठिठक गया?

दक्षिण के ढोल नगाड़ो पर। कल ही तो उसका काव्य पाठ

सुनता था सागर शांत पड़ा, तिरूपति का नांद सुना मैंने,

हो गया मुग्ध रह गया खड़ा, वह मृत्यु याचना तिरूपति में।

अपने श्रोता से कर बैठा, वो वही कहीं वो समाधिस्थ

क्या कहते हो कि मर बैठा ? यदि यही मिलेगा देवों से

उत्कृष्ट काव्य का पुरस्कार, तो कौन करेगा धरती पर

ऐसे देवों को नमस्कार।

इतिहास अपने आप को दोहराता है उक्त पंक्तियाँ फिर से सजीव हो उठी हिन्दी माँ के सरस्वती पुत्र बालकवि बैरागी अपने गुरू दिनकर की तरह मौनव्रत धारें चुपचाप इंद्र सभा में दिनकर और सुमन के संग होने वाले कवि सम्मेलन में शरीक हो गए।

13 मई 2018 की सुबह वे पारिवारिक मित्र के पेट्रोल पंप के उदघाटन समारोह में पहुंचे। लगभग 40 मिनिट तक सबको हंसाया और गुदगुदाया। 3 बजे मनासा स्थित कवि नगर के आवास पर मित्रों के साथ गपशप की, फिर अपने शयन कक्ष में विश्राम के लिए चले गए। सायः 4 बजे उनका सेवक जब चाय लेकर पहुंचा वे एक हाथ सिर पर रख सो रहे थे उन्हें जगाया, वे नहीं उठे। ऐसा लग रहा था शांत मुद्रा में वे कोई कविता रच रहे हो। जब हिलाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तब तक आग की तरह देश भर में खबर फैल गई। साहित्य मनीषी बालकवि बैरागी मौन धारण कर चुपचाप अलविदा कह गए। देश विदेश में जिसने भी यह समाचार सुना अश्रुधारा बह निकली उनके निधन पर कवि सम्मेलन के सहपाठी नीरज ने उनके निधन पर कहा मेरे शरीर का आधा हिस्सा अनायास चला गया और कुमार विश्वास ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा – ’एक और दिनकर प्रकृति की गोद में हम सबको अपनी ओजस्वी रचनाओं का रसपान करा कर चुपचाप चल दिया।

बालकवि बैरागी का सूत्र वाक्य था – साहित्य मेरा धर्म है, राजनीति मेरा कर्म अपने धर्म और कर्म की शुचिता का मुझे पूरा ध्यान है। बांये हाथ से लिखता हँू ईश्वर ने मुझे बाये हाथ में कलम और पंड़ित जवाहरलाल नेहरू ने मेरे दाहिने हाथ में शहीदों के खून से रंगा तिरंगा थमाया, मैं दोनों की गरिमा को दाग नहीं लगने दूंगा। उन्हीं की ये पंक्तियां जिसका जीवन भर अनुसरण किया- ’’मैं मरूंगा नहीं-काम ऐसा करूंगा’’ नहीं पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया। बालकवि बैरागी एक राष्ट्र कवि के रूप में कृत्तिव और व्यक्तित्व को लेकर सदैव हम सबके दिलों में जिंदा रहेंगे। माँ सरस्वती पुत्र को शब्द श्रद्धा सुमन अर्पित उन्हीं के इस छंद से –

 

आज मैंने सूर्य से बस जरा सा यूँ कहा-

’’आप के साम्राज्य में इतना अंधेरा  क्यू रहा ?’’

तमतमा कर वह दहाड़ा-’’मैं अकेला क्या करूँ ?

तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ ?

आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो

संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लडू कुछ तुम लड़ों।

 

लालबहादुर श्रीवास्तव

शब्द शिल्प, एल.आई.जी. ए-15

जनता कॉलोनी, मन्दसौर म.प्र. 458001

मो. 9425033960

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