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सामाजिक समरसता


सामाजिक समरसता के क्षेत्र में मन्‍दसौर शहर ने अपना एक अलग ही मुकाम हासि़ल कर रखा है। शहर के सभी समाजों के बीच आपसी सामनजस्‍य बिठाने, एकता लाने व सभी समाज बंधु एक दुसरे समाज के लोगों का आदर सम्‍मान करे। इस दिशा में समाजिक समरसता मंच, मन्‍दसौर ने एक अच्छी पहल की है व इस पहल के परिणाम भी सामने आये है जिसके फलस्‍वरूप सभी समाज बंधु अपने पूरे समाज के द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में आमंत्रण पत्र जारी कर अन्‍य समाजों को भी न्‍योता देते है व एक दूसरे समाज की चल समारोह, रेलिया, महापुरूषों के त्‍यौहारों पर स्‍वागत-अभिनन्‍दन करतें हैं। इससे समाजों में परस्‍पर एकता का भाव देखने को मिलता है। मंदसौर समरसता मंच के माध्‍यम से वर्ष में दो बार होली व दिपावली मिलन समारोह आयोजित कर सामुहिक भोज सभी समाजों को एक साथ करवाता है। जिससे समाजों में भेदभाव दूर कर एकता का संदेश दिया जाता है। समरस्‍ता का मूल उद्देश्‍य ही भेदभाव-अस्‍पर्शता को दूर कर समाजों को एकत्रित करना व संगठित करना है ओर इस दिशा में मंदसौर ने इसकी परिभाषा को चरितार्थ करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है।

हम सब जानते है कि सामाजिक समरसता व्‍यवहार की बात हैं सामाजिक व्यवस्था में ‘समता’ यह एक श्रेष्ठ तत्व है। भारत के संविधान में इसे प्राथमिकता दी गयी है ओर इस तत्‍व शब्‍द का अर्थ यह समझाया गया है कि सभी को समानता का अधिकार प्राप्‍त है। परन्‍तु आज भी यह चरितार्थ नहीं हुआ है इसीलिए हम यहां सामाजिक समरसता के विषय पर चर्चा कर रहे है व सामाजिक समरसता आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।
जब सामाजिक जीवन में भेदभाव युक्त समाज रचना अपनी जड़ पकड़ लेती है। तो इस स्थिति का तुरंत इलाज किया जाना जरूरी सा जान पड़ता है क्‍योंकि यही रूढ़ीवादिता के रूप में आगे बढकर समाजों के बीच दूरियां पैदा करने का काम कर रही है। और भारतीय समाज के साथ यही हुआ है और हो रहा है। समता का यह सर्वश्रेष्ठ, सर्वमान्य तत्व हमने स्वीकार तो कर लिया, विचार बुद्धि के स्तर पर हमने मान्यता तो दे दी परंतु इसे व्यवहार में परिवर्तित करने में असफल रहे। ‘समता’ इस तत्व को सिद्ध और साध्य करने हेतु ‘समरसता’ यह व्यवहारिक तत्व प्रचलित करना जरूरी है। समरसता यह भावात्मक तत्व है और इसमें ‘बंधुभाव’ के तत्व को असाधारण महत्ता दी जाती है। बाबासाहब भीमराव अम्‍बेडकर तो कहा करते थे कि- ‘‘बंधुता यही स्वतंत्रता तथा समता का आश्वासन है। स्वतंत्रता तथा समता की रक्षा कानून से नहीं होती।’’

समरसतापूर्वक व्यवहार से स्वतंत्र, समता और बंधुता इन तीन तत्वों के माध्‍यम से सामाजिक समरसता तक हम पहुंच सकते हैं। परंतु दुर्भाग्य से इन तीन तत्वों के आधार पर हिन्दू समाज की रचना नहीं हुई है। जिस समाज रचना में उच्च तत्व व्यवहार्य हो सकते हैं, वही समाज रचना सब में श्रेष्ठ है। इस विषय पर स्‍वामी विवेकानन्‍द जी का मत था कि- ‘‘जिस समाज रचना में वे व्यवहार नहीं हो सकते, उस समाज रचना को भंग कर उसके स्थान पर शीघ्र नयी रचना बनायी जाये।’’ परन्‍तु अब यह करना असम्‍भव सा जान पड़ता है इस कारण इस व्‍यवस्‍था में अब सुधार करने की परम आवश्‍यकता महसूस की जा रही है। व इस दिशा में कार्य करने हेतु अनेक संगठन कार्यकर रहे हैं इनमें से एक हे ‘सामाजिक समरसता मंच’

डॉ. अम्‍बेडकर धर्म पर गहरा विश्वास रखने वाले थे। धर्म के कारण ही स्वातंत्र्य, समता, बंधुता और न्याय की प्रतिस्थापना होगी, यह उनकी मान्यता थी। धर्म ही व्यक्ति तथा समाज को नैतिक शिक्षा दे सकता है। धर्म को राजनीतिक हथियार के रूप में उन्होंने कभी इस्तेमाल नहीं किया। बौद्ध धर्म ग्रहण कर उन्होंने स्वातंत्र-समता-बंधुता-न्याय समाज में प्रतिस्थापित करने का एक मार्ग प्रस्तुत किया। इस पृष्ठभूमि पर ‘समरसता’ यह तत्व आज के जमाने का प्रमुख धर्म है और उसका उदघोषण है ‘बंधुभाव यही धर्म है’

शिक्षा सबके लिए जरूरी है, ऐसा बाबा साहब अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था। बाबा साहब अम्बेडकर दुनिया के एकमात्र व्यक्ति हैं जिनके चरित्र पर आज तक कोई लांछन नहीं लगा है। उनका जीवन सदैव निष्कलंक बना रहा। शूद्र पहले सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। जिस समाज को आज हम वंचित समाज कहते हैं वह कभी मुख्यधारा का समाज था। कुछ परिस्थितियां ऐसी बनी कि मुख्यधारा का समाज वंचित समाज हो गया। तथ्यों के आधार पर यह बात बाबा साहब अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘शूद्र कौन हैं’ में लिखा है। बाबा साहब ने यह भी बताया है कि शूद्रों के गौत्र कई सवर्ण जातियों के गौत्र के ही समान हैं। मीडिया को इस तरह के तथ्यों को समाज के सामने लाने में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। ताकि आज जिसे हम वंचित समाज कह रहे हैं, उसमें स्वाभिमान का भाव जाग्रत हो। वंचित समाज के संबंध में अन्य समाज की धारणा भी बदले। सामाजिक समरसता के संदर्भ में मीडिया की भूमिका को समझने के लिए राष्ट्रगान की पंक्ति ‘जन-गण-मन अधिनायक’ को ध्यान में रखना चाहिए। राजनीति के संदर्भ को जोड़ते जब समाज को आगे बढ़ाने की तैयारी की है तब मीडिया यह विभाजन क्यों करता है कि किस सीट पर किस जाति के अधिक मतदाता हैं? यह उचित नहीं है। मीडिया को जाति के आधार पर मतदाता, उम्मीदवार और पार्टियों को नहीं बांटना चाहिए। आज युवा जिस तरह जातिवाद से ऊपर उठकर सोच रहा है, आगे बढ़ रहा है उसे देखकर कहा जा सकता है कि नए भारत का जो निर्माण होने वाला है, उसमें सब भारतीय ही होंगे। हर किसी की जाति सिर्फ भारतीय होगी। समरस भारत ही समृद्ध भारत बन सकता है।

सामाजिक समता से ही सामाजिक एकता आएगी। जाति व्यवस्था से उत्पन्न विषमता को सामाजिक समरसता से मिटाया जा सकता है। लेकिन कुछ राजनीतिक लोग अपनी राजनैतिक सत्ता प्राप्ति करने हेतु इस सामाजिक आन्दोलन का उपयोग करते हैं। परिणामत: सामाजिक बुराई का खात्मा समाज के जागरूक नागरिकों द्वारा ही किया जा सकता है तब जाकर समाज में वास्तविक समरसता का भाव उत्पन्न होगा। लेकिन साथ ही सभी समाजों को चाहिए की वह अपने समाज व सभी महापुरूषों पर गर्व करें।

सामाजिक समरसता क्‍या है ?
‘सामाजिक समरसता’ एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा करना एवं इसे ठीक प्रकार से कार्यान्वित करना आज समाज एवं राष्ट्र की मूलभूत आवश्यकता है। इसके लिए हमें सर्वप्रथम ‘सामाजिक समरसता’ के अर्थ का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। संक्षेप में इसका अर्थ है सामाजिक समानता। यदि व्यापक अर्थ देखें तो इसका अर्थ है – जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता का जड़मूल से उन्मूल कर लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहार्द बढ़ाना तथा समाज के सभी वर्गों एवं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना। समरस्ता का अर्थ है सभी को अपने समान समझना। सृष्टि में सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और उनमें एक ही चैतन्य विद्यमान है इस बात को हृदय से स्वीकार करना।
यदि देखा जाये तो पुरातन भारतीय संस्कृति में कभी भी किसी के साथ किसी भी तरह के भेदभाव स्वीकार नहीं किया गया है। हमारे वेदों में भी जाति या वर्ण के आधार पर किसी भेदभाव का उल्लेख नहीं है। गुलामी के सैंकड़ों वर्षों में आक्रमणकारियों द्वारा हमारे धार्मिक ग्रन्थों में कुछ मिथ्या बातें जोड़ दी गई जिससे उनमें कई विकृतियां आ गई जिसके कारण आज भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। वेदों में जाति के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बतायी गयी है। जैसे कि ब्राह्मण का पुत्र वही कर्म करने से ब्राह्मण हुआ एवं शूद्र का पुत्र शूद्र क्योंकि जो व्यक्ति जैसा कार्य करता था उसी अनुसार उसे नाम दिया गया। समय के साथ-साथ इन व्यवस्थाओं में अनेक विकृतियां आती गई जिसके परिणामस्वरूप अनेक कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का जन्म हुआ। इन सबके कारण जातिगत भेद-भाव, छूआछूत आदि की प्रवृति बढ़ती गई। इसी के चलते उच्चवर्ग एवं निम्नवर्ग का जन्म हुआ। यह भेदभाव इतना बढ़ गया कि उच्च वर्ग निम्न वर्ग के लोगों को हेय दृष्टि से देखने लगा और वे अधिकाधिक पिछड़ते गए। मंदिरों में प्रवेश पर रोक, शिक्षण संस्थानों में भेदभाव, सार्वजनिक समारोहों में उनकी अनदेखी ऐसे कई कारण हैं जिसके कारण यह लोग उपेक्षित होते गये। उच्च वर्ग के लोग इन लोगों के घर आना जाना तो क्या उनके हाथ का पानी पीना भी धर्म भ्रष्ट हुआ मानने लगे। जाति-भेद का दोष ही है जिससे समरसता का अभाव उत्पन्न होता है। जब हम जाति के आधार पर किसी व्यक्ति का अपमान करते हैं तो इससे उसकी मानसिक क्षति होती है, मन में कुंठा का भाव उत्पन्न होता है। उसकी सोच केवल अपने तक ही सीमित हो जाती है और वह अपनी इस संकुचित सोच के आवरण में अपने देश या समाज का हित नहीं सोच पाता। जाति भेद के संदर्भ में यहां एक छोटी सी घटना उल्लेखनीय है। कई वर्ष पूर्व एक सेठ जी थे । वह छूआछूत को बहुत मानने वाले थे किन्तु उनकी धर्म पत्नी बिल्कुल विपरीत स्वभाव वाली थी। एक दिन घर पर पानी न होने के कारण पत्नि ने पानी पड़ोसी कुम्हार के घर से लाकर सेठ को दे दिया, इसका पता चलने पर सेठ जी बहुत क्रोधित हुए और पानी का गिलास दूर फैंक दिया। जब भोजन करने बैठे तो पत्नि ने केवल रोटी परोसी, सेठ जी ने पूछा कि सब्जी नहीं है तो उनकी पत्नी ने उत्तर दिया कि सब्जी तो फैंक दी क्योंकि सब्जी जिस हांडी में बनी थी वो हांडी कुम्हार के घर की बनी थी। उन्होंने जब दूध की मांग की तब भी यही उत्तर मिला। जैसे तैसे भोजन कर विश्राम के लिए चारपाई ढूंढने लगे तो सेठानी ने कहा वो तो मैंने तोड़ दी क्योंकि वह भी तो निम्न जाति के व्यक्ति ने बनायी थी। अब तो सेठ जी अत्यन्त क्रोधित हुए और बोले ऐसा कर कि सारे घर को ही आग लगा दे। इस पर सेठानी ने बड़े शान्त भाव से उत्तर दिया कि मैं भी यही सोच रही हूँ क्योंकि यह घर भी तो निम्न जाति के मजदूरों द्वारा ही तो निर्मित है। इस पर सेठ जी की आँखे खुली कि हम अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर हैं यदि वे लोग यह सब कार्य न करें तो इनके अभाव में जीवन कठिन हो जायेगा। इन लोगों के साथ भेदभाव या ईष्‍या द्वेष रखना बहुत बड़ी भूल है। इसके लिए उन्होंने सेठानी जी को धन्यवाद भी दिया। यहां इस कहानी का अर्थ यह लेना चाहिए कि अपने आप में प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण है। समाज के रूप में हर व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक दूसरे पर निर्भर है। यह किसी एक व्यक्ति, जाति, वर्ण या समुदाय विशेष से न तो बन सकता है और न ही चल सकता है। समाज की सम्पूर्णता एवं उन्नति के लिए प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति, वर्ण या समुदाय का हो उसका सहयोग आवश्यक है। जिस प्रकार से शरीर का प्रत्येक अंग स्वतंत्र रूप से अस्तित्वहीन है अर्थात् विभिन्न अंग सामूहिक रूप से मिलकर ही शरीर का निर्माण करते हैं उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने आप में स्वतंत्र रूप से अस्तिवहीन है क्योंकि विकास सामूहिकता में ही होता है। व्यक्ति के वर्ण का नहीं कर्म का महत्व है।
किन्तु इन सभी कुप्रथाओं की जड़ें समाज में इतनी सुदृढ़ हो चुकी हैं कि इनका पूर्ण रूप से उन्मूलन करना निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस कार्य को करने के लिए अनेक वर्षों से कई संत, ऋषि समाज-सुधारक एवं कई समाज सेवी संस्थायें निरन्तर कार्यरत हैं। डा. अम्बेडकर ने इसे संवैधानिक रूप दिया जिससे समाज में समानता लाने के प्रयासों को काफी सफलता भी मिली है। प्रत्येक नागरिक को उसकी जाति, पंथ, आर्थिक एवं शैक्षिक क्षमता के आधार पर हर क्षेत्र में समान अधिकार दिये गये हैं। लोगों के पढ़े-लिखे हो जाने से विभिन्न विभागों में कार्यरत होने से आर्थिक समानता में तो वृद्धि हुई ही है इसी के साथ लोगों का स्थानांतरण होने लगा है। बड़े शहरों में लोगों को आस-पास के लोगों की जाति उच्च है या निम्न इससे कोई अन्तर नहीं होता। लोग आपस में घुलने-मिलने लगे हैं किन्तु अभी छोटे कस्बों एवं गांवों में यह समस्या पूर्ववत ही बनी हुई है।
इस दिशा में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ एक ऐसी संस्था है जो गत 90 वर्षों से यानि कि जब से इस संस्था का जन्म हुआ है निरन्तर कार्य कर रही है। इसके संस्थापक पंडित पूजनीय हैडगेवार जी अस्पृश्यता एवं जातिगत भेदभाव से पूर्णतय: दूर थे बल्कि कट्टर विरोधी थे। संघ में इस बात का कोई अन्तर नहीं है कि कोई कार्यकर्ता किस जाति से सम्बन्धित है। सभी का व्यवहार एवं मानसिकता समरसता पूर्ण है। 1932 में डॉ. हैडगेवार जी ने घोषणा की कि राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के सात वर्ष के कार्यकाल में ही संघक्षेत्र से जातिभेद एवं अस्पृश्यता पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है। इस घोषणा की सत्यता को 1934 में वर्धा के संघ शिविर में महात्मा गांधी ने भी जाना, जब उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं को एक ही पंक्ति में एक साथ भोजन करते देखा इस पर उन्होंने अपनी प्रसन्नता भी व्यक्त की। पंडित पूजनीय श्री गुरू जी ने भी कहा है कि- ‘‘हिन्दू समाज के सभी घटकों में परस्पर समानता की भावना के विद्यमान रहने पर ही उनमें समरसता पनप सकती है।’’ तृतीय सर संघचालक मा. श्री बाला जी देवरस जी ने भी कहा है कि- ‘‘If untouchability is not wrong, then nothing is wrong in this world, यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है तो इस संसार में कुछ भी गलत नहीं है इसे हर हाल में मिटाया जाना चाहिए।’’ वर्तमान सरसंघचालक मा. श्री मोहन भागवत जी ने भी दलितों को साथ लेकर चलने की ही बात की है। सामाजिक समरसता संघ की पाँच मुख्य गतिविधियों में से एक है और संघ के कार्यकर्ता इसे बढ़ाने की दिशा में निरन्तर कार्य कर रहे हैं। संघ आदिवासी क्षेत्रों में भी समरसता बढ़ाने हेतु प्रयासरत है। संघ के ही उप संगठन विश्व हिन्दू परिषद एवं सेवा भारती निम्न जातियों में सेवा एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। रा. स्वं संघ का तो काम पहले से ही यह रहा है जाति भावना से ऊपर ऊठकर समाज को संगठित करना। समग्र समाज को संगठित करने का कार्य कई वर्षों से हो रहा है। पंडित पूजनीय श्री गुरू जी ने तो इस हिन्दू (भारत) भूमि पर रहने वाले सभी व्यक्तियों को सहोदर कहा है-

‘‘हिन्दवे सोदरा सर्वे न हिन्दू पवितोभवेत्, मम दीक्षा हिन्दू रक्षा मम मंत्र: समानता’’

(सहोदर का अर्थ होता है : जो एक ही माता के उदर या गर्भ से उत्पन्न हुए हों। या सम्बन्ध के विचार से अपना और सगा जैसे सगा भाई या वैज्ञानिक क्षेत्रों में, वे सब जो एक ही मूल से उत्पन्न हुए हों और जिनमें परस्पर रक्त या वंश का सम्बन्ध हो।)

समरसता का अर्थ ही समाज को एकजुट करना एवं पारस्परिक भेदभाव को समाप्त करना है। सभी समाजों का मिलजुल कर एक शमशान – एक मंदिर – एक कुआ हो, व सभी जातियों को परस्‍पर ताकतवर बनाना। यह कार्य किसी एक व्यक्ति या संस्था का नहीं है। इसके लिए सामूहकि प्रयासों की आवश्यकता है। यह एक सामाजिक आन्दोलन है, इस बुराई का खात्मा जागरूक समाज के द्वारा ही किया जा सकता है। तभी जाकर समाज में वास्तविक समरसता का भाव उत्पन्न होगा। लोगों को जागरूक करने के लिए उनमें प्रेम एवं अपनत्व का भाव जगाने की आवश्यकता है। कुंठित मनों से विषमता की भावना को दूर करने की आवश्यकता है। यह भावना दूर करने के लिए उनके साथ परस्पर प्रेम एवं सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे सभी लोग जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्र की उन्नति में सहयोग करेंगे। इससे राष्ट्रीय एकता स्थापित हो सकेगा। यदि किसी राष्ट्र का समाज संगठित होता है तो बाहरी शक्तियां भी उस राष्ट्र के विरुद्ध किसी षड्यंत्र में सफल नहीं हो पाती। भारतीय संस्कृति तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को मानने वाली है। यदि यहां के लोगों को इस बात का आभास हो जाये और वे आत्म साक्षात्कार कर पायें एवं अपनी शक्ति को पहचाने तो भारत माता फिर से उसी सर्वोच्च सिंहासन पर स्थित होगी जहां कभी यह पहले आरूढ़ थी। भारत वर्ष फिर से एक बार विश्व गुरु होगा इसमें कोई संदेह नहीं। यह कार्य केवल बातों से नहीं प्रयासों से होगा। कई राजनीतिक लोग व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस विषय में बातें तो बहुत करते हैं किन्तु व्यवाहिक रूप में कुछ नहीं करतेे किन्तु उन्हें समझना होगा कि इस दिशा में उठाया गया प्रत्येक साकारात्मक कदम हमें सफलता की ओर प्रवृत करेगा। आवश्यकता है लोगों को परस्पर प्रेम एवं सहयोग के प्रति जागरूक करने की ताकि सामाजिक समरसता का अर्थ सही रूप में साकार हो सके।

‘‘समरसता है ध्येय हमारा, बढ़े जगत में श्रेय हमारा’’

सामाजिक समरसता के प्रेरक संत रविदास का योगदान

संत रविदास ने अपनी वाणी के माध्यम से समाज में व्साप्त कुरीतियों पर करारी चोट की। संत रविदास का कहना था कि हमें सभी में समान प्राण -तत्व का अनुभव करना चाहिये। भारतीय संतों ने सदा अहिंसा वृति का ही पोषण किया है। संत रविदास जाति से चर्मकार थे। लेकिन उन्होनें कभी भी जन्मजाति के कारण अपने आप को हीन नहीं माना। उन्होनें परमार्थ साधना के लिये सत्संगति का महत्व भी स्वीकारा है। वे सत्संग की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनके आगमन से घर पवित्र हो जाता है।उन्होनें श्रम व कार्य के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की तथा कहाकि अपने जीविका कर्म के प्रति हीनता का भाव मन में नहीं लाना चाहिये। उनके अनुसार श्रम ईश्वर के समान ही पूजनीय है। संत रविदास के प्रभु किसी भी प्रकार की सीमाओं से नहीं बंधे हैं वे तो घट – घट व्यापी हैं। उनका मत है कि प्रभु ही सबके स्वामी हैं। वे उच्चकोटि के आध्यात्मिक संत थे। उन्होनें अपनी वाणी से आध्यात्मिक व बौद्धिक क्रांति के साथ- साथ सामाजिक क्रांति का भी आहवान किया। वे प्रभु राम को ही परम ज्योति के रूप में स्वीकारते थे तथा निर्गुण तत्व का मौलिक निरूपण करते थे। संत रविदास कवि होने के साथ – थ एक क्रांतिकारी व मौलिक विचारक भी थे। उन्होनें परमात्मा से संपर्क जोड़ने के लिये नामस्मरण,आत्मसमर्पण व दीनभावना का सहारा लिया तथा अपने पदों में समाज के दीनहीन वर्ग के उत्थान की कामना की। उनकी भक्ति का रूझान इतना बढ़ा कि वे प्रभु का मानसी पूजन करने लगे व प्रभु से प्राप्त पारसमणि को भी अस्वीकार कर दिया।
संत रविदास ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भारत भ्रमण किया तथा दीन हीन दलित समाज को उत्थान की नयी दिशा दी। संत रविदास साम्प्रदायिकता पर भी चोट करते हैं। उनका मत है कि सारा मानव वंश एक ही प्राण तत्व से जीवंत है। वे सामाजिक समरसता के प्रतीक महान संत थे। वे मदिरापान तथा नशे आदि के भी घोर विरोधी थे तथा इस पर उपदेश भी दिये हैं। चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी उनकी शिष्या बनीं वहीं चित्तौड़ में संत रविदास की छतरी बनी हुई है। मान्यता है कि वे वहीं से स्वर्गारोहण कर गये। समाज में सभी स्तर पर उन्हें सम्मान मिला। वे महान संत कबीर के गुरूभाई तथा मीरा के गुरू थे। श्री गुरूग्रंथ साहिब में उनके पदों का समायोजन किया गया है। आज के सामाजिक वातावरण में समरसता का संदेश देने के लिये संत रविदास का जीवन आज भी प्रेरक हैं।

सामाजिक समरसता पर सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के विचार –
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने “सामाजिक समरसता” विषय पर व्याख्यान समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि देश के विकास के लिए सामाजिक एकता की आवश्यकता होती है और समाज में एकता की पूर्व शर्त है सामाजिक समता। जब समता आएगी तो सामाजिक एकता अपने आप आएगी। इसके लिए हमें शुरुआत स्वयं से करनी होगी।
सामाजिक समरसता के लिए समाज में जागरूकता लाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए जिसमें सभी समाज के लोग सम्मिलित हो, उन्होंने कहा कि हमारे समाज में विविधता है। स्वभाव, क्षमता और वैचारिक स्तर पर विविधता का होना स्वाभाविक भी है। भाषा, खान-पान, देवी-देवता, पंथ-सम्प्रदाय तथा जाति व्यवस्था में भी विविधता है। पर यह विविधता कभी हमारी आत्मीयता में बाधा उत्पन्न नहीं करती। विविध प्रकार के लोगों का समूह होने के बावजूद हम सब एक हैं। उन्होंने कहा कि समान व्यवहार, समता का व्यवहार होने से यह विविधता भी समाज का अलंकार बन जाती है। हमारे देश में सभी विविधताओं में सबसे अधिक चर्चा जातिगत व्यवस्था की होती है। जातिभेद के कारण ही सामाजिक समस्याएं पैदा होती हैं और ये समस्याएं विषमता को जन्म देती हैं, जिसके कारण संघर्ष होता है। इसलिए समाज से जातिभेद को दूर करना होगा। सवाल किया कि इसका उपाय क्या है? उन्होंने जोर देकर कहा कि इसका एकमात्र उपाय है – ‘सामाजिक समरसता’ उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए जातिगत व्यवस्थाओं को सही दिशा में काम करना चाहिए। जब तक सामाजिक भेदभाव है, तब तक देश में आरक्षण जारी रहना चाहिए और संघ इसे खत्म किए जाने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने कहा कि “सामाजिक भेदभाव जब तक है, तब तक सामाजिक आरक्षण चलेगा, ये संघ का कहना है। और सामाजिक भेदभाव समाप्त हुआ, अब आरक्षण निकालो, ये उनको कहना पड़ेगा जो सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं”।
सामाजिक समरसता के लिए भारतीय जीवन मूल्यों को आचरणीय बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समरसता की शुरुआत स्वयं से करनी होगी. “हजार भाषणों से ज्यादा असर एक कार्यकर्ता के व्यवहार का होता है।” इसलिए हमारा मन निर्मल हो, हमारा वचन दंशमुक्त हो, हमारे वचन से किसी को पीड़ा न हो। हम सबका व्यवहार सभी लोगों को अपना मित्र बनाने वाला होगा, तब समाज में समता का भाव विकसित होगा।
उन्होंने कहा कि अपने परिवार में ऐसा वातावरण बनाएं, जिससे सामजिक समरसता को बल मिले। हमारे देश के सभी पंथ-संप्रदायों ने, तथा समाज सुधारकों और संतों ने मनुष्यों के बीच भेदभाव का समर्थन नहीं किया है। समानता प्रत्येक पंथ की उत्पत्ति का मूल तत्व रही है, लेकिन बाद में समाज को जातियों या संप्रदायों में विभाजित कर दिया गया। भेदभाव लोगों के व्यवहार से भी पैदा होने लगा। उन्होंने भेदभाव खत्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया और उन परंपराओं को खारिज किया जो अनावश्यक हैं। उन्होंने कहा कि परम्परा के नाम पर इस भेदभाव को आगे और जारी रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन लोगों की भावनाओं को समझा जाना चाहिए जो हजारों वर्षों से पीड़ित रहे हैं। समाज के कई तबकों ने भेदभाव और अन्याय को लंबे समय तक सहा है। अब हमें भी कुछ वर्षों तक समझना और सहन करना सीखना चाहिए और अपने स्वयं के व्यवहार से वांछित बदलाव लाना चाहिए। रूढ़ी-परम्पराओं को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों पर परखा जाना चाहिए और जो परीक्षण में विफल साबित हों, उन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से ये रूढ़ी-परम्पराएं हजारों वर्षों से नहीं परखी गईं और इनका आंख मूंदकर पालन किया जा रहा है। परंपरागत कर्मकांड तो चलते आ रहा है, किन्तु जीवन मूल्यों की अनदेखी की गई। अपने व्यवहार में जब तक ये मूल्य प्रकट नहीं होंगे, तब तक समता का दर्शन समाज में नहीं हो सकता। हमें अपने जीवन में मूल्यों को मन, मस्तिष्क और व्यवहार में आचरणीय बनाना होगा। शिक्षा से सभी सामाजिक कुरूतियों का निवारण होगा। समाज में जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार होगा लोग शिक्षित होंगे तो सामाजिक समरसता बढ़ेगी और अस्पृश्यता अपने आप समाप्त हो जायेगी।