Breaking News
सौंधनी स्थित यशोधर्मन का विजय-स्तम्भ

मंदसौर शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर सौंधनी में विजय स्तम्भ है जिसका निर्माण राजा यशोधर्मन ने कराया था राजा यशोधर्मन ने शक्तिशाली हूणों को पराजित किया था। एतिहासिक विजय की स्मृति में राजा ने वियज स्तम्भ बनवाया था। इस स्तम्भ की यह विशेषता है कि चालीस फीट ऊंचाई की यह लाट एक ही पत्थर से बनी हुई है। मान्यता है की इस स्तंभ की ऊंचाई इतनी है की इस स्तंभ पार दीप जलाया जाता था जो राजस्थान के चित्तोड के किले की आठंवी मंजिल से दिखाई देता था | इस सतम्भ की समय पर देखभाल नहीं होने के कारण यह खंडर हो गया है | और स्तंभ भी के भी दो भाग हो गए स्तम्भ का एक हिस्सा खड़ा है वही उसका दूसरा हिस्सा जमीन पर गिर गया | यह स्थल भारत के पयर्टन नक्शे पर तो है पर इसका प्रचार-प्रसार नहीं होने से पर्यटक नहीं आ रहे है। इसके प्रचार प्रसार के साथ इस क्षेत्र को रमणीय बनाने का प्रयास भी जरूरी है। वहीं सुरक्षा भी आवश्यक है।

इतिहास
यशोधर्मन् छठी शताब्दी के आरम्भिक काल में मालवा के महाराजा थे। छठी शती ई0 के द्वितीय चरण में मालवा प्रांत के स्थानीय शासक के रूप से आगे बढ़कर यशोधर्मन् पूरे उत्तरी भारत पर छा गया। उसका उदय उल्कापात की भाँति तीव्र गति से हुआ था और उसी की भाँति बिना अधिक स्पष्ट प्रभाव छोड़े वह इतिहास से लुप्त हो गया।

यशोधर्मन अवन्ती (मालवा) के शासक थे। यह मालव वंश (परमार) क्षत्रिय थे। यशोधर्मन मध्य भारत के एक शक्तिशाली राजा थे। इनका राज्य काल वि.सं. ५५७ से ६०७ (ई.स. ५०० से ५५०) के लगभग था। गुप्त वंश की शक्ति क्षीण हो जाने पर मध्यभारत के इतिहास में यशोधर्मन उल्का की भाँति चमक उठे। इनके सैनिक अभियान और विजय का वर्णन दशपुर (मन्दसोर) अभिलेख में लिखा है। इन्होंने उन प्रदेशों को भी जीता जिन पर गुप्त सम्राटों का आधिपत्य नहीं था। इन्होंने हृणों को भी युद्ध में पराजित किया। इनका राज्य लोहित्य (ब्रह्मपुत्र) से लेकर महेन्द्र पर्वत तक और गंगा से स्पृष्ट हिमालय से लेकर पश्चिम में समुद्र तट तक था|

यशोधर्मन ने वि.सं. ५८५ (ई.स. ५२८) के लगभग हूण राज़ा तोरमाण को परास्त किया था। हूण मूलतः आर्य थे और बाद में वे मध्य एशिया में चले गए थे। वैदिक धर्मानुसार न चलने के कारण ये मलेच्छ कहलाए। हुणों ने सम्पूर्ण मध्य एशिया और भारत की राजनीति को प्रभावित किया। हूण बड़े शूरवीर थे। गुप्त शासकों की शक्ति क्षीण होने पर लगभग पाँचवी ईस्वी शदी में टिड्डी-दल की तरह हूण पश्चिमोत्तर और मध्य भारत में छा गए थे। इनका नेता तोरमूण था जिसकी राजधानी साकल (सियालकोट) थी। उसने मध्य भारत को जीत लिया था। भारत आने पर तोरमाण और उसके आश्रितों ने शैव धर्म अपना लिया था। तोरमाण के पश्चात् उसका पुत्र मिहिरकुल हुणों का राजा बना। तोरमाण और मिहिर कुल अत्यन्त क्रूर शासक थे तथा निर्दोष लोगों पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे। उनकी भयानक आवाज जहाँ भी सुनाई देती थी, लोग कॉप जाते थे। उन्होंने अपनी राक्षसी क्रूरता से लोगों का वध किया, आग लगाई तथा सर्वनाश किया। वह बौद्धों का घोर शत्रु था। उसने अधिक संख्या में बौद्धों को मरवा डाला और बौद्धविहारों को जलवा दिया था। मिहिर्कुल इतना पराक्रमी था कि उसने भगवान शिव के अतिरिक्त और किसी के समक्ष सिर नहीं नवाया।

यशोधर्मन ने वि.सं. ५८५ (ई.स. ५२८) के लगभग मिहिरकुल को परास्त किया। मिहिरकुल ने पराजित होकर कश्मीर में शरण ली। इस तरह यशोधर्मन ने हूणों के अत्याचार से देश को मुक्त कराया। मिहिरकुल को राजा यशोधर्मन ने मुलतान के आस-पास पराजित किया था।