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स्कूल बसों की फीस के नाम पर पालकों की जेब पर डाका

Story Highlights

  • कहाॅं है जिला शिक्षा अधिकारी का एक साल पुराना आदेश
  • शिवराजसिंह के जनहित में जारी आदेश की धज्जियाॅं उडा रहे अधिकारी
  • स्कूल संचालकों की मनमानी वसूली पर कोई नियंत्रण नहीं
  • 276 रू. लेना चाहिये, वसूल रहे हैं 700 रू.
  • आरटीओ कर रहे हैं इंतजार किसी अनहोनी का

नवीन शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है और निजी विद्यालयों में पढने वाले छात्र छात्राओं के पालकों ने सीने पर पत्थर रखकर अपने बच्चों के स्कूलों ने इस सत्र में मनमाने तरीके से बढाई फीस के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है और निजी विद्यालयों के संचालक अत्यंत ही बेशर्मी से बल्ले बल्ले कर रहे हैं। ना तो पालक, ना ही शिक्षा विभाग और ना ही प्रशासन कोई भी इन विद्यालयों से ये पूछने की स्थिति में नहीं है कि आखिर फीस इतनी बढाई क्यों है? जाहिर है प्रशासन कहेगा कि हमारे पास कोई शिकायत नहीं है। शिकायत आएगी तो हम कार्यवाही करेंगे। शिक्षा विभाग कहेगा कि हम जाॅंच कर रहे हैं तथ्य मिलने पर कार्यवाही करेंगे और रही बात पालक की तो वह सीधे स्कूल से टकरा कर अपना माथा फोडने की बजाए स्कूल के फैलाए मकडजाल में ही उलझा रहना चाहता है क्योंकि निजी विद्यालय किसी भी हद तक गिर सकते हैं और उसके बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड कर सकते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि निजी शिक्षण संस्थानों को किसी का डर नहीं ना शिक्षा विभाग का और ना ही स्कूली शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश शासन का इसलिये तो शासन के आदेशों के पालन में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है और आदेशों की धज्जियाॅं उडाई जा रही है। निजी स्कूलों के द्वारा की जा रही मनमानी की लगातार मिलती शिकायतों पर मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने छात्र, छात्राओं और पालकों को राहत देने वाली एक अधिसूचना परिवहन विभाग के माध्यम से दिनांक 22 अप्रेल 2015 को मध्यप्रदेश राजपत्र में जारी की गई। जो स्कूलों द्वारा वाहन शुल्क की मनमानी वसूली पर नियंत्रण को लेकर थी।
उक्त राजपत्रित आदेश के परिपालन में जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा कलेक्टर कार्यालय में दिनांक 16 जुलाई 2016 को कलेक्टर महोदय की अध्यक्षता में बैठक आयोजित कर निर्णय लिया गया तथा स्कूल बसों के लिये 0.92 पैसे प्रति किलोमीटर की दर से किराये की दरें तय की गई। कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से दिनांक 19 जुलाई 2016 को आदेश क्रमांक /मान्यता/2016/2781 जारी भी हुआ। जिसमें समस्त अशासकीय संस्थाओं के प्राचार्य और प्रशासकों को निर्धरित दरों के बारे में सूचित किया गया और आदेशित भी किया गया कि वे निर्धारित दरों के अनुसार अपने विद्यार्थियों से शुल्क लें लेकिन उक्त आदेश को जारी हुए एक वर्ष से भी अधिक समय गुजर गया लेकिन ना तो स्कूल संचालकों ने, ना जिला शिक्षा अधिकारी ने, ना ही आरटीओ ने और ना ही जिला प्रशासन ने उक्त आदेश के पालनार्थ छात्र, छात्राओं और उनके पालकों को राहत मिले ऐसी कोई कार्रवाई करने का प्रयास किया और उसका परिणाम यह रहा कि इस शैक्षणिक सत्र के प्रारम्भ से ही स्कूलों ने निरंकुशता के साथ स्कूल बसों की फीस मनमाने तरीके से बढा दी और जिला शिक्षा अधिकारी के आदेश की धज्जियाॅं उडा कर रख दी।
यदि म.प्र. शासन के पालकों के हितों में लिये गए निर्णय के अनुसार तय किये गए प्रतिकिलोमीटर की दर से स्कूल बसों द्वारा लिये जाने वाले किराए और स्कूलों द्वारा लिये जा रहे वास्तविक किराए का तुलनात्मक अध्ययन करें तो यह दिखाई पडता है कि निजी स्कूल संचालक लगभग चार गुना अधिक राशि वसूल रहे हैं और वह भी बेखौफ होकर और बडी बेशर्मी से। यदि स्कूल बसों की ली जाने वाली फीस और उस मार्ग पर आने वाली लागत के बिन्दु से देखने पर भी यही दृश्य उपस्थित होता है कि निजी स्कूल संचालक पालकों की जेब पर जम कर डाका डाल रहे हैं। आइये इसको समझने का प्रयास करते हैं। शासन ने स्कूल बसों के लिये जाने वाले शुल्क की दर प्रति कि.मी.0.92 पैसे तय की है। इसका मतलब यह है कि यदि आपके बच्चे का स्कूल आपके घर से कितनी भी दूरी पर हो तो आपको निर्धारित दर के अनुसार 0.92 पैसे प्रति किलोमीटर की दर से राशि बस शुल्क के रूप में स्कूल को चुकानी है। इस हिसाब से मंदसौर नगर की 10 किमी की परिधि में आने वाले स्कूलों को आपसे मात्र 276 रूपये प्रतिमाह लेना चाहिये। आपके घर से 20 किमी दूरी वाले स्कूलों को आपसे 552 रूपये लेना चाहिये और स्कूल आपसे मनमाने तरीके से 600 रूपये से 800-900 रूपये तक वसूल रहा है। यदि आप इसके अगले किलोमीटर के दायरे में आते हैं तो आपको उस दर से बस का किराया चुकाना है। सीधा सा मतलब है जो जितनी दूर से आएगा वो उतना ज्यादा किराया चुकाएगा। यदि यह आदेश जारी हो जाता तो पालकों को बडी राहत मिलती और स्कूल संचालकों की बसों से कमाई करने की मंशा पर भी पानी फिर जाता लेकिन ऐसा हो ना सका। निजी विद्यालय के संचालकों का यह तर्क हास्यास्पद है कि हम बसें चला रहे हैं तो खर्चा भी तो आता है। कितना खर्च आता है? आइये इसको भी समझने का प्रयास करते हैं –
यदि एक स्कूल वाहन जो किसी भी कंपनी का कैसा भी माॅडल हो उसकी घोषित सीटींग कैपेसिटी के आधार पर गणना करें तो एक तीस सीटर वाहन यदि मंदसौर नगर में बच्चों को स्कूल लाने और वापस घर छोडने मेें 20 से 30 किलोमीटर चलता है और अधिकतम उसकी लागत सारे खर्च जोडने के बाद 15 रूपये प्रतिकिलोमीटर भी माने तो प्रतिदिन का खर्च 450 रू. पडता है और महीने भर का यह खर्च 13500 रूपये आता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि स्कूल बसें पूरे 30 दिन नहीं चलती हैं प्रत्येक माह में आने वाले 4 से 5 रविवार और अन्य शासकीय अवकाशों को गिने तो लगभग 24 दिन ये बसें बच्चों को लाती ले जाती हैं। 24 दिनों का यह खर्च आता है 10800 रूपये। अब देखिए निजी स्कूल संचालक 30 सीटर बस में ईमानदारी से 30 ही बच्चों को बैठा रहे हैं और उनसे लगभग 700 रूपये प्रतिमाह वसूल रहे हैं तो उन्हे 21000 रूपये मिलते हैं याने 30 दिनांे की लागत 13500 से 7500 रू. ज्यादा और यदि 24 दिन का हिसाब देखें तो आनेवाली लागत 10800 से लगभग दोगुना कमाई। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोई भी स्कूल बस की घोषित कैपेसिटी से ज्यादा ही बच्चे बस में बैठाते हैं यह संख्या 30 बच्चों की कैपेसिटि वाली बस में 40 से 50 तक रहती है। हम रोज स्कूलों की ठसाठस बसों को देख रहे हैं। आलम यह है कि जिन बस स्टापों पर बस आखिरी में पहुॅंचती है उन बच्चों को तो बस में सीट पूरे साल भर नसीब नहीं होती है क्योंकि अन्य छात्र छात्राऐं पहले से ही बैठे होते हैं। ये एक बस से सम्बन्धित आंकडें हैं जिन विद्यालयों के पास अधिक संख्या में बसें हैं वो तो और ज्यादा मस्ती में हैं। अब इस अनुपात में हिसाब आप स्वयं लगा लीजिये कि स्कूल बस की फीस चुकाकर आप कितना बडा धोखा खा रहे हैं और स्कूल संचालक शिक्षण शुल्क तो शिक्षण शुल्क बस के किराए में से भी बडा दाॅंव मार रहे हैं। शिक्षण शुल्क में से कमाना निजी शिक्षण संस्थानों का अधिकार हो सकता है लेकिन बस की सुविधा उपलब्ध कराना विद्यालय की जिम्मेदारी है और उसका वही शुल्क लिया जाना चाहिये जो शासन तय करे। मैने स्वयं शिक्षा विभाग और म.प्र. शासन के उक्त आदेशों के तहत अपने बच्चों के विद्यालय द्वारा वाहन शुल्क लिये जाने के सम्बन्ध में स्कूल संचालकों से चर्चा की तो मुझे बताया गया कि हमारे पास अभी तक कोई आदेश इस सम्बन्ध में नहीं आया है जब आएगा तब देखेंगे। तो आखिर जिला शिक्षा अधिकारी का आदेश क्रमांक /मान्यता/2016/2781 गया कहाॅं? कौन राज्य शासन की मंशा के अनुरूप पालकों को राहत देने हेतु स्कूल संचालकों पर कार्यवाही करेगा? क्या आरटीओ बसों की कैपेसिटिी से अधिक संख्या बैठाने पर स्कूलों को नोटिस देंगे? या किसी अनहोनी का इंतजार करेंगे? शासन के जनहित में जारी किये गए आदेशों पर कार्यवाही जिला प्रशासन करेगा और जिले के सभी जनप्रतिनिधि इस विषय का संज्ञान लेंगे और विभागीय समीक्षा मीटिंगों में प्रशासन से जवाब मांगेंगे क्योंकि उक्त पत्र की प्रतिलिपि क्रमांक/मान्यता/2016/2782 दिनांक 19 जुलाई 2017 आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, कलेक्टर महोदय, अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी जिला मन्दसौर, जिला परियोजना अधिकारी, समस्त संकुल प्राचार्य उमावि/हाईस्कूल तथा विकास खंड शिक्षा अधिकारी मंदसौर को भी प्रेषित की गई थी। लेकिन उक्त पत्र का कहीं से कहीं तक पता नहीं चल रहा है। यहाॅं प्रशंसा करनी होगी अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत संगठन के कार्यकर्ताओं की जिन्होने लगातार इस विषय पर अपनी बात मजबूती के साथ प्रशासन के सामने रखी है। पालक तो बस प्रशासन और जिम्मेदार लोगों से यही अपेक्षा कर सकते हैं कि उनको राहत दिलाने वाले आदेश का परिपालन कराया जावे। क्योंकि यक्ष प्रश्न यह है कि जिन दिनों में हमारे बच्चे स्कूल की बस से नहीं आ जा रहे हैं उन अवकाश के दिनों का शुल्क पालक क्यों दें? जिला प्रशासन को तुरंत ही बसों की किलोमीटर आधारित दर व्यवस्था को कार्यदिवसों में ही लिए जाने सम्बन्धी आदेश जारी करना चाहिये और उसका कडाई से पालन कराना चाहिये।

Post source : - डाॅ. क्षितिज पुरोहित 9425105610

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