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1436 सालों से मनाई जा रही है ईद, जानिए इसका महत्व

मुसलमानों का त्योहार ईद-उल-फितर आज यानि सोमवार को भारत में मनाया जा रहा है। ईद रमजान का महीना खत्म होने पर मनाई जाती है। ईद से पहले एक महीने तक मुस्लिम समुदाय के लोग रोजे रखते हैं। इसके बाद नया चांद दिखने पर ईद मनाई जाती है। भारत में रविवार को चांद दिख गया था, जिसके बाद सोमवार को ईद मनाई गई। हालांकि सऊदी अरब में शनिवार को चांद दिख गया था, जिसके बाद रविवार को वहां कुछ जगहों पर ईद मनाई गई। ईद को भाई-चारे का त्योहार माना जाता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग नए कपड़े पहनते हैं और घरों में लजीज पकवान बनाया जाता है। इसके अलावा इस दिन मस्जिद में जाकर ईद की नमाज पढ़ी जाती है। ईद के दिन सभी गिले-शिकवे भूलकर रिश्तेदारों और दोस्तों को गले लगाया जाता है। रिश्तेदार एक दूसरे के घर जाते हैं और ईद की बधाईयां देते हैं।

एक साल में दो ईद मनाई जाती हैं। पहली ईद को ईद-उल-फितर कहा जाता है तो वहीं दूसरी को ईद-उल-अजहा(बकरीद) कहा जाता है। बकरीद पर मुस्लिम समुदाय के लोग जानवर की कुर्बानी देते हैं। कुर्बानी का गोश्त बांटा जाता है। इसके अलावा इस दिन भी गरीबों को दान दिया जाता है।

मुस्लिम समुदाय के लोग ईद-उल-फितर से पहले पूरे एक महीने रोजे रखते हैं, इस दौरान ये लोग कुछ भी नहीं खाते-पीते। सुबह सहरी से पहले जो खाना होता है वह खा लेते हैं और उसके बाद फिर शाम को इफ्तार के बाद खाया जाता है। इसके साथ ही कहा गया है कि रमजान के दौरान नेकी के काम ज्यादा से ज्यादा करने होते हैं। कहा गया है कि इस दौरान कोई भी अच्छा काम करता है तो उसका 70 गुना सबाब(पुण्य) मिलता है।

माना जाता है कि ईद का त्योहार 1436 सालों से मनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत सऊदी अरब के मदीना शहर से सन दो हिजरी में हुई थी। रमजान के महीने में अल्लाहताला को राजी करने के लिए दिन रात भूखे प्यासे रहकर की गई रोजे की इबादत, कुरान की तिलावत, नमाज और जकात फितरा समेत नेक काम करने की इबादत से खुश होकर अल्लाहताला की तरफ से खुशी का दिन तय किया गया,जिसे ईद कहते हैं।

रमजान में की गई इबादत का इनाम है ईद

खुदा के हुक्म से मुसलमान पूरे महीने रोजा रखते हैं और अल्लाहताला को राजी करते हैं। अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। गरीबों, बेवाओं, यतीमों के साथ हमदर्दी कर जकात फितरा, सदका देकर उनकी मदद करते हैं। रमजान के महीने में कमाई गई नेकियों के बदले ईद के दिन अल्लाहताला उन्हें इनाम से नवाजता है। यह इनाम ईद की खुशी की शक्ल में है। शव्वाल का चांद देखकर मनाई जाने वाली ईद की रात को हदीस में ‘इनाम की रात’ कहा गया है। इसलिए इस रात को भी शब-ए-कद्र की तरह इबादत करने का हुक्म है।

ईद के पहले यह त्योहार मनाते थे मुसलमान

ईद के पहले सऊदी अरब में ‘नीरोज’ और ‘महरजान’ नाम से दो त्योहार मनाए जाते थे। पैगंबर-ए-इस्लाम ने अपनी उम्मत को बताया कि तुम दो त्योहार मनाया करो। पहला ईद-उल-फित्र (ईद) और दूसरा ईद-उल-अजहा (बकरीद)। इसके बाद सन दो हिजरी से ईद का त्योहार मनाया जाने लगा। ईद के  दिन पड़ोसी, मेहमानों, रिश्तेदारों और दोस्तों का खास ध्यान देना चाहिए। एक दूसरों को हदिया और तोहफों का लेन-देन करना चाहिए। अगर साल भर किसी से लड़ाई या मनमुटाव रहा हो तो ईद के दिन गले मिलकर सभी गिले शिकवे दूर करने चाहिए।

Eid 2017: आपसी भाईचारे और प्यार को बांटने का त्योहार है ईद, जानिए इसका महत्व

Eid 2017: रमजान माह की इबादतों और रोजे के बाद ईद-उल फितर का त्योहार जबरदस्त रौनक लेकर आता है. रमजान के महीने की आखिरी दिन जब चांद का दीदार होता है तो उसके बाद वाले दिन को ईद मनाई जाती है. इस बार यह त्योहार देश भर में 26 जून को मनाया जाएगा. इसका ऐलान शनिवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मौलाना डॉ. कल्बे सादिक ने किया. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना डॉ. कल्बे सादिक ने कहा कि इस साल 28 मई से रमजान शुरू हुआ था. ईद 26 जून को मनाई जाएगी. उन्होंने कहा कि ईद का चांद रविवार को दिखेगा, जिसके बाद देशभर में सोमवार को ईद मनाई जाएगी.

ईद की अहमियत 
माह-ए-रमजान में रोजेदारों ने रोजे रखने, पूरे महीने इबादत करने और गरीबों की मदद करने में कामयाबी पाई, ईद उसका भी जश्न है. ईद के रोज जो नमाज पढ़ी जाती है, वो बंदो की तरफ से अल्लाह को धन्यवाद होती है कि उसने उन्हें रोजे रखने की तौफीक दी.

ईद अल्लाह से इनाम लेने का दिन है. इस मुबारक दिन मुस्लिम समुदाय को लोग लजीज पकवान बनाते हैं. वह नए कपड़े पहनकर मस्जिद नमाज पढ़ने जाते हैं. नमाज के बाद सभी लोग गिले-शिकवे भूल कर एक दूसरे के गले लगते हैं और ईद की बधाई देते हैं.

ईद-उल-फितर नाम क्यों पड़ा
इस त्योहार का नाम ईद-उल-फितर इसलिए पड़ा क्योंकि ईद के दिन नमाज से पहले सभी मुस्लिम फितरा अदा करते हैं. जकात भी निकालते हैं. फितरे का अर्थ है- सुबह निर्धन एवं फकीरों को पैसे की शक्ल में फितरे की रकम देना. कहा जाता है कि दान या जकात ‌किए बिना ईद की नमाज नहीं होती.
मुस्लिमों के पाक महीने रमजान के 30वें दिन आखिरी रोजा के बाद चांद देखकर ईद मनाने की परंपरा है. माना जाता है कि रमजान माह के दौरान ही कुरान का अवतार हुआ था. इसलिए इस माह कुरान अधिक पढ़ी जाती है.

रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है. इस महीने के खत्म होते ही 10वां माह शव्वाल शुरू होता है. शव्वाल माह की पहली चांद रात ईद की चांद रात होती है. ईद का आना ही शव्वाल माह की शुरुआत होती है.

रमजान में मुस्लिम समाज द्वारा रोजा, तरावीह और तिलावते कुरआन के माध्यम से विशेष इबादतें की जाती हैं. मुस्लिम विद्वानों के मुताबिक, रमजान का पवित्र महीना मुसलमानों की जीवन शैली में सुधार और संतुलन स्थापित करने का भी अच्छा माध्यम है.
रोजा का महत्व
रोजा आपसी भाईचारे को बढ़ाता है. रमजान में सामूहिक रोजा इफ्तार के माध्यम से अपने पास-पड़ोस के लोगों के साथ बैठने का मौका मिलता है, जिससे पारस्परिक संबंधों में प्रगाढ़ता आती है. मुस्लिम विद्वानों के मुताबिक, रोजा एक ऐसी इबादत है जिससे रोजेदार के अंदर मानवता का भाव उत्पन्न होता है और उसका शरीर निरोग एवं स्वस्थ रहता है.

 

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