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25 साल पहले सीएम बनने से चूके थे नाथ, गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ किया काम

  • कमलनाथ संजय गांधी के लिए जेल गए थे, इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा माना था
  • वे छिंदवाड़ा से नौ बार से सांसद, सिर्फ 1997 में एक बार हारे
  • यूपीए सरकारों में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं कमलनाथ

नई दिल्ली.  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। कांग्रेस विधायक दल की बैठक में यह फैसला लिया गया। इससे पहले कमलनाथ और सिंधिया ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की। इस बैठक में सोनिया गांधी और प्रियंका भी मौजूद थीं। बैठक में कमलनाथ के नाम पर मुहर लगी। हालांकि, भोपाल में विधायक दल की बैठक के बाद इसका ऐलान किया गया।

 कमलनाथ के बारे में तीन किस्से
मप्र के विधानसभा चुनाव से पहले इसी साल मई में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था। वे छिंदवाड़ा से नौ बार के सांसद हैं। कानपुर में जन्मे कमलनाथ कांग्रेस के उन मौजूदा नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने गांधी परिवार की तीन पीढ़ी के साथ काम किया है।

1) इंदिरा गांधी ने उन्हें तीसरा बेटा बताया था
कमलनाथ संजय गांधी के स्कूली दोस्त बताए जाते हैं। वे 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से सांसद बने थे। इस चुनाव में प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा बताया था।

2) संजय गांधी का ध्यान रखने जानबूझकर जेल गए थे
आपातकाल के बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान संजय गांधी को एक मामले में कोर्ट ने तिहाड़ जेल भेज दिया। तब इंदिरा संजय की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं। कहा जाता है कि तब कमलनाथ जानबूझकर एक जज से लड़े। जज ने उन्हें भी अवमानना के चलते सात दिन के लिए तिहाड़ भेज दिया, जहां वे संजय गांधी के साथ रहे।

3) 25 साल पहले सीएम बनने से चूके 
72 साल के कमलनाथ मप्र की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से 9 बार से सांसद हैं। वे 1980, 1985, 1989, 1991, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014 में सांसद बने। 1993 में भी कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने की चर्चा थी। बताया जाता है कि तब अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे कर दिया। इस तरह कमलनाथ 25 साल पहले सीएम बनने से चूक गए थे।

1997 में छिंदवाड़ा से हार गए थे कमलनाथ
1996 में कमलनाथ पर हवाला कांड के आरोप लगे थे। उस वक्त पार्टी ने उनकी पत्नी को टिकट दिया था। वे चुनाव जीत गईं। लेकिन अगले साल उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1997 में यहां उपचुनाव हुए थे, इसमें कमलनाथ हार गए। कमलनाथ को सुंदरलाल पटवा ने हराया था।

यूपीए सरकारों में कई बार केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं कमलनाथ
कमलनाथ 1991 में राज्य पर्यावरण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), 1995-1996 टेक्सटाइल मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) मंत्री रहे। उन्होंने 2001-2004 तक कांग्रेस के महासचिव का पद संभाला। वे 2004-2009 तक यूपीए सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री रहे। 2009 में कमलनाथ सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री बने। 2011 में उन्हें शहरी विकास मंत्री बनाए गए। 2012 में उन्हें संसदीय कार्य मंत्री का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।

पूरे पांच साल काम करते हैं
नाथ राज्य के जातिगत समीकरणों में फिट नहीं बैठते, कुछ लोग इसे उनकी कमी भी मान सकते हैं. लेकिन छिंदवाड़ा क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ है. छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर 1980 से अब तक वही जीतते आए हैं. यहां उनकी अच्छी पकड़ की एक बड़ी वजह यह भी है कि कमलनाथ भोपाल में कम और छिंदवाड़ा में अधिक नजर आते हैं. वह सिर्फ चुनाव के दौरान नहीं, पूरे पांच साल काम करते हैं.

गांधी परिवार के वफादार
कमलनाथ को 1970 में संजय गांधी ने कांग्रेस में शामिल कराया था. तब से ही उन्हें गांधी परिवार का वफादार माना जाता है. इमरजेंसी में उनकी भूमिका के बाद “इंदिरा के दो हाथ, संजय गांधी और कमलनाथ” का नारा काफी चर्चित हुआ था. वह उन नेताओं में से एक हैं जिन्होंने राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए मनाया था.

9 बार रह चुके हैं सांसद
वह 1979 में पहली बार छिंदवाड़ा से सांसद चुने गए. इसके बाद 1984, 1990, 1991, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए.

आज तक सिर्फ एक बार हारे चुनाव
साल 1996 में जैन हवाला केस में कमलनाथ का नाम आने की वजह से उन्हें टिकट नहीं दी गई थी. तब उन्होंने पार्टी पर अपनी पत्नी अल्का नाथ को टिकट देने का दबाव बनाया, उस वक्त उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की धमकी तक दे दी थी. अल्का जीत गईं. इसके अगले ही साल कमलनाथ बीजेपी नेता और पूर्व सीएम सुरेंद्र लाल पटवा से चुनाव हार गए थे. यह किसी चुनाव में उनकी पहली और एकमात्र हार है.

चुनाव लड़ने में धन को रोड़ा नहीं बनने दिया
मध्य प्रदेश का चुनाव ऐसे समय में हुआ, जिस वक्त कांग्रेस पार्टी की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं रही. केंद्र की सत्ता से हटने के बाद कांग्रेस को बीजेपी की तुलना में चंदा मिलना भी काफी कम हुआ. कई बार मध्य प्रदेश में पार्टी कोष खाली होने होने की खबरें भी आईं. पार्टी सूत्र बताते हैं कि इस स्थिति में कमलनाथ सामने आए और उन्होंने पूरे विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी को आर्थिक रूप से मजबूती दिलाने में अहम भूमिका निभाई. वजह कि खुद कमलनाथ आर्थिक रूप से काफी मजबूत हैं. दो दर्जन से अधिक कंपनियों के मालिक हैं. मनमोहन सरकार में सबसे धनी केंद्रीय मंत्री होने का रिकॉर्ड रहा है. वर्ष 2011 में केंद्रीय मंत्री रहते कमलनाथ ने 2.73 बिलियन डॉलर यानी 2.73 अरब रुपये की संपत्ति घोषित की थी

लंबा सियासी अनुभव
राजनीतिक अनुभव के मामले में कमलनाथ के आगे ज्योरादित्य सिंधिया कहीं नहीं ठहरते. कमलनाथ  लोकसभा के अति वरिष्ठ सांसदों में शुमार हैं. मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से लगातार नौ बार सांसद होने का रिकॉर्ड है. कमलनाथ पहली बार सातवीं लोकसभा यानी 1980 में जीते. वह फिर 1985, 1989 और 1991 में भी जीते. जून 1991 में पहली बार वह केंद्रीय मंत्री बने. उन्हें पर्यावरण और वन मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार का पद मिला.1995 से 1996 में वह केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री रहे.1998 और 1999 में भी कमलनाथ विजयी रहे. 2001 से लेकर 2004 तक वह कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रहे. 2004 में फिर चुनाव जीते तो मनमोहन सरकार में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री हुए. 2009 तक इस पद रहे. 2009 में फिर से छिंदवाड़ा सीट से जीते तो यूपीए दो सरकार  में सड़क परिवहन मंत्री बने. 2011 में कैबिनेट फेरबदल हुआ तो कमलनाथ को शहरी विकास मंत्री बनाया गया.अक्टूर 2012 में कमनाथ को संसदीय कार्यमंत्री की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली.

संगठन पर मजबूत पकड़
करीब चार दशक की लंबी राजनीति में कमलनाथ मध्य प्रदेश की नस-नस से वाकिफ है. छिंदवाड़ा से लगातार नौ बार से सांसद और कई बार केंद्रीय मंत्री रहने के कारण कमलनाथ ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में मजबूत पकड़ बनाई. केंद्रीय मंत्री रहते, कार्यकर्ताओं से हमेशा जुड़े रहे और उनकी मांगों को पूरा करने पर जोर दिया. कांग्रेस सूत्र कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को अगर छोड़ दें तो कार्यकर्ताओं के बीच मध्य प्रदेश में आज भी दबदबा कमलनाथ का ही है.  यह दीगर बात है कि युवाओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया का ग्लैमर है.

गुटबाजी पर काबू पाया
जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेताओं में गुटबाजी चरम पर थी, विधानसभा चुनाव में इससे बड़े नुकसान की आशंका थी, तब पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसी साल अप्रैल मे उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था. पार्टी सूत्र बताते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कमलनाथ ने अपने राजनीतिक प्रबंधन शैली का इस्तेमाल कर रूठों को मनाने में सफलता हासिल की. काफी हद तक पार्टी में गुटबंदी खत्म करने में सफल रहे. कार्यकर्ताओं तक यह संदेश देने में सफल रहे कि जीत होने के बाद ही उन्हें फायदा हो सकता है,आपसी सिरफुटव्वल से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आखिर कमलनाथ का मंत्र पार्टी के काम आया और कमलनाथ, सिंधिया दोनों गुटों ने मिलकर काम किया. नतीजा जीत के रूप में मिला.

गांधी परिवार के नजदीकी रहे हैं कमलनाथ
नेहरू-गांधी परिवार के काफी करीबी वफादारों में कमलनाथ की गिनती होती रही है. कमलनाथ संजय गांधी के बचपन के दोस्त और दून स्कूल के दौरान क्लासमेट रहे हैं. इस वजह से इंदिरा गांधी से भी उनकी निकटता रही. कमलनाथ द इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नॉलजी ए मैनेजमेंट इंस्टीट्यूशन के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष रहे हैं. पीपीपी मॉडल और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, वर्ल्ड मार्केट को लेकर गहरी जानकारी रखते हैं. 2011 में दवोस में हुई वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में कमलनाथ अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं.

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