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स्वतंत्रता संग्राम मे मंदसौर और मध्य प्रदेश का योगदान

स्वतंत्रता संग्राम में मालवा का जिक्र हो और उसमें मंदसौर का नाम नहीं हो तो इतिहास अधूरा ही लगता है। मंदसौर का किला भी अति प्राचीन रहा है और इस पर कब्जे के लिए अंग्रेजों का मुगलों से संघर्ष हुआ था। मुगल वंश के शहजादा फिरोज व उनकी सेना ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को पराजित कर दो अंग्रेज अधिकारियों के सिर काटकर मंदसौर किले के पश्चिमी द्वार पर टांग दिए थे। उसके बाद किले के इस द्वार का नाम मुंडी गेट हो गया और आज यह अपभ्रंश होकर मंडी गेट कहलाता है। बाद में अंग्रेजों ने भी पूरी ताकत से हमला कर फिर यहां कब्जा किया और देशभक्तों को इसी दरवाजे पर फांसी पर लटका दिया था।

मंदसौर का प्राचीन नाम दशपुर है और यहां का इतिहास भी काफी पुराना है। मंदसौर पर मराठा, मुगलों, खिलजी का शासन रहा है। किले का निर्माण हुशंगशाह गौरी ने 1400 ईस्वी में कराया था। तभी से इस पर मराठा शासकों में होल्करों व सिंधिया का शासन रहा था। 1818 में मल्हारराव होल्कर द्वितीय के सेनापति तांतिया जोग व अंग्रेज अधिकारी सर जान माल्कम के बीच इसी दुर्ग में इतिहास प्रसिद्ध संधि भी हुई थी। उसके बाद से अंग्रेजों के अधीनस्थ सिंधिया वंश का यहां शासन रहा।

इतिहासविद् कैलाश पांडेय ने बताया कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय सिंधिया वंश के शासकों से यह किला मुगल वंश के शहजादे फिरोज ने अपनी सेना के साथ हमला कर कब्जा कर लिया था। इसी दुर्ग में 26 अगस्त 1857 को उसका राज्यारोहण भी किया गया था। तब नीमच में छावनी से अंग्रेजों की सेना ने किले को वापस अपने कब्जे में लेने की तैयारी की। जीरन के पास शहजादा फिरोज व अंग्रेजों की सेना के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में भी जीत शहजादे फिरोज की सेना की हुई।

अंग्रेजों को पराजित कर उनकी सेना के दो अधिकारी कैप्टन रीड व कैप्टन टकर को पकड़कर शहजादे की सेना ने सिर को धड़ से अलग कर उनके सिर किले के पश्चिमी दरवाजे पर टांग दिए। तभी से इस दरवाजे को मुंडी गेट कहा जाने लगा। हालांकि इसके बाद फिर अंग्रेजों ने हमला किया और 92 दिन के शासन के बाद शहजादे फिरोज की सेना को फिर पराजित कर बाहर निकाला दिया। अपने अफसरों की मुंडिया किले के दरवाजे के सामने टांगने से नाराज अंग्रेजों ने यहां युद्ध में पकड़े गए क्रांतिकारियों को इसी दरवाजे पर फांसी पर लटका दिया।

क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने भूना था, नाम हो गया भुन्याखेड़ी

इसी प्रकार शहजादे फिरोज की सेना की अंग्रेजों से भिड़ंत का ही एक और किस्सा है। मंदसौर से हारने के बाद नीमच की तरफ भागते समय वर्तमान में कृषि उपज मंडी से थोड़ा आगे महू-नीमच राजमार्ग से सटे ग्राम भुन्याखेड़ी के यहां शहजादे फिरोज के साथ बचे- खुचे क्रांतिकारियों को दोनों तरफ से अंग्रेजों की सेना ने घेर लिया। यहां क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने बड़ी बेरहमी से गोलियों से भून दिया। उसके बाद से इस जगह का नाम भून्याखेड़ी हो गया। जो आज भी प्रचलित है। बाद में यहां एक शहीद पार्क भी बनाया गया था जो अब पूरी तरह उजाड़ हो गया है।

स्वतंत्रता संग्राम और मध्यप्रदेश

1857 की क्रांति में (मध्यप्रदेश) छोटी-छोटी रियासतों ने अपने बल-बूते पर अंग्रेजी सेना को लौहे के चने चबाने मजबूर कर दिया। हालांकि रियासतों में आपस में एकता की कमी का नुकसान इनको राजाओं को उठाना पड़ा। इस क्रांति के समय जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देशभर में घूम-घूम कर आजादी की लड़ाई की अलख लोगों में जगा रहे थे। सन् 1857 की क्रांति में मध्यप्रदेश का बहुत योगदान रहा। बुदेला शासक अंग्रेजों से पहले से ही नाराज थे। इसके फलस्वरूप 1824 में चंद्रपुर (सागर) केजवाहर सिंह बुंदेला, नरहुत के मधुकर शाह, मदनपुर के गोंड मुखिया दिल्ली शाह ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी।

इस प्रकार सागर, दमोह, नरसिंहपुर से लेकर जबलपुर, मंडला और होशंगाबाद के सारे क्षेत्र में विद्रोह की आग भड़की, लेकिन आपसी सामंजस्य और तालमेल के अभाव में अंग्रेज इन्हें दबाने में सफल हो गए।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 में मेरठ, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली, बैरक्पुर आदि के विद्रोह की लपटें यहाँ भी पहुंची। तात्या टोपे और नाना साहेब पेशवा के संदेश वाहक ग्वालियर, इंदौर, महू, नीमच, मंदसौर, जबलपुर, सागर, दमोह, भोपाल, सीहोर और विंध्य के क्षेत्रों में घूम-घूमकर विद्रोह का अलख जगाने में लग गए। उन्होंने सथानीय राजाओं और नवाबों के साथ-साथ अंग्रेजी छावनियों के हिंदुस्तानी सिपाहियों से संपर्क बनाए। इस कार्य के लिए “रोटी और कमल का फूल” गांव-गांव में घुमाया जाने लगा। मुगल शहजादे हुमायूँ इन दिनों रतलाम, जावरा, मंदसौर, नीमच क्षेत्रो का दौरा कर रहे थे। इन दौरों के परिणामस्वरूप 3 जून 1857 को नीमच छावनी में विद्रोह भड़क गया और सिपाहियों ने अधिकारियों को मार भगाया। मंदसौर में भी ऐसा ही हुआ। 14 जून को ग्वालियर छावनी केसैनिकों ने भी हथियार उठा लिए। इस तरह शिवपुरी, गुना, और मुरार में भी विद्रोह भड़का।

उधर तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर जीता। महाराजा सिंधिया ने भागकर आगरा में अंग्रेजों के यहाँ शरण ली। 1 जुलाई 1857 को शादत खाँ के नेतृत्व में होल्कर नरेश की सेना ने छावनी रेसीडेंसी पर हमला कर दिया। कर्नल ड्यूरेंड, स्टूअर्ट आदि सीहोर की ओर भागे, पर वहाँ भी विद्रोह की आग सुलग चुकी थी। भोपाल की बेगम ने अंग्रेज अधिकारियों को सरंक्षण दिया। अजमेरा के राव बख्तावरसिंह ने भी विद्रोह किया और धार भेपाल आदि क्षेत्र विद्रोहियों के कब्जे में आ गए। महू की सेना ने भी अंग्रेज अधिकारियों को मार भगाया।

मंडलेश्वर, सेंधवा, एड़वानी आदि क्षेत्रों में इस क्रांति का नेतृत्व भीमा नायक कर रहा था। शादत खाँ, महू इंदौर के सैनिकों के साथ दिल्ली गया। वहां बादशाह जफर के प्रति मालवा के क्रांतिकारियों ने अपनी वफादारी प्रकट की। सागर, जबलपुर और शाहगढ़ भी क्रांतिकारियों के केंद्र थे। विजय राधोगढ़ के राजा ठाकुर सरजू प्रसाद इन क्रांतिकारियों के अगुआ थे। जबलपुर की 52वीं रेजीमेंट उनका साथ दे रही थी। नरसिंहपुर में मेहरबान सिंह ने अंग्रेजों को खदेड़ा। मंडला में रामगढ़ की रानी विद्रोह की अगुआ थी। इस विद्रोह की चपेट में नेमावर, सतवास और होशंगाबाद भी आ गए। रायपुर, सोहागपुर और संबलपुर ने भी क्रांतिकारियों का साथ दिया। मध्यप्रदेश में क्रांतिकारियों में आपसी सहयोग और तालमेल का अभाव था इसलिए अंग्रेज इन्हें एक-एक कर कुचलन में कामयाब हुए। सर ह्यूरोज ग्वालियर जीत लिया। महू, इंदौर, मंदसौर, नीमच के विद्रोह को कर्नल ड्यूरेण्ड, स्टुअर्ट और हेमिल्टन ने दबा दिया। लेफिटनेंट रॉबर्ट, कैप्टन टर्नर, स्लीमन आदि महाकौशल क्षेत्र में विद्रोह को दबाने में सफल हुए। दो वर्ष में क्रांति की आग ठंडी पड़ी और क्रांतिकारियों को कठोर दंड दिया गया।

सन् 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी ने चौहानों की सत्ता दिल्ली से उखाड़ फैंकी। उसने अपने सिपहसालार कुतुबुद्दीन एबन को दिल्ली का शासक नियुक्त किया। गौरी और ऐबक ने सन् 1196 में ग्वालियर के नरेश सुलक्षण पाल को हराया। उसने गौरी की प्रभुसत्ता स्वीकार कर ली। सन् 1200 में ऐबक ने पुन: ग्वालियर पर हमला किया। परिहारों ने ग्वालियर मुसलमानों को सौंप दिया। इल्तुतमिया ने सन् 1231-32 में ग्वालियर के मंगलदेव को हराकर विदिशा, उज्जैन, कालिंजर, चंदेरी आदि पर भी विजय प्राप्त की। उसने भेलसा और ग्वालियर में मुस्लिम गवर्नन नियुक्त किए। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा के सभी प्रमुख स्थान जीते। एन-उल-मुल्कमुल्तानी को मालवा का सूबेदार बनाया गया।

भोपाल की बेगम ने दिया अंग्रेजो का साथ
जुलाई 1857 में शाद खान ने होल्कर की सेना के साथ छावनी रेसीडेंसी पर हमला किया, यहां से भागे अंग्रेज अफसरों को भोपाल की बेगम ने अपनी रियासत में संरक्षण दिया। उस समय एक तरह से हर रियासत में इस क्रांति की आग फैल चुकी थी।
तालमेल का आभाव
कुछ साल बाद क्रांति का रुख बदल गया। अंग्रेजी सेना ने इसे धीरे-धीरे असफल कर दिया। क्रांति के असफल होने का सबसे बड़ा कारण इन रियासतों के बीच आपस में तालमेल का ना होना माना जाता है। जह इस क्रांति को विफल किया जा रहा था तो इसमें भाग लेने वालों को खुलेआम फांसी पर लटकाया गया।