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मंदसौर आये बोस्टन यूनिवर्सिटी अमेरिका के प्रोफेसर बेंजामिन अफ़ीम पर शोध करने

Story Highlights

  • काले सोने की खेती यानी अफीम की पैदावार के मामले में देश और दुनिया में मशहूर, मंदसौर जिले में होने वाली अफीम की परंपरागत खेती पर अब अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों बेंजामिन ने शोध करना शुरू कर दिया है

  • अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेंजामिन सी गेल ने कहा
  • मंदसौर में अफीम की खेती का तरीका देखने आए गेल दंपती

मंदसौर। विश्व में अफीम की खेती के बारे में जानकारी एकत्र कर रहे अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में इंडियन हिस्ट्री के प्रोफेसर बेंजामिन सी गेल रविवार को मंदसौर आए। वे जिले में अफीम की खेती और डोडों से अफीम निकालने का तरीका देखने के बाद पुलिस कंट्रोल रूम पर दोपहर बाद पुलिस अधिकारियों व पत्रकारों से भी मिले। गेल ने यहां बताया कि ऑस्ट्रेलिया में काफी उच्च तकनीक से अफीम की खेती हो रही है। वहां डोडे से अफीम सीधे दवा कंपनियां ही निकालती हैं। भारत में अभी पुरातन तरीके से ही किसान अफीम एकत्र कर रहे हैं।

इंडियन हिस्ट्री का प्रोफेसर होने के कारण वे भारत में होने वाली अफीम की फसल पर भी शोध कर रहे हैं। इसके लिए पहले वे टर्की गए। वहां अफीम की खेती का तरीका देखा। फिर ऑस्ट्रेलिया में जाकर अफीम की खेती व खेत देखे। अब यहां आए हैं। प्रोफेसर गेल ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया में बड़े-बड़े फार्म में अफीम की खेती होती है। वहां लगभग दवा कंपनियां कांट्रेक्ट फार्मिंग करती हैं। वहां डोडों से अफीम निकालने के लिए आधुनिक पद्घति अपनाई जा रही है। सीधे खेत में खड़े डोडों से ही मशीन से अफीम खींच ली जाती है। उसके बाद फसल को खेत में ही नष्ट कर दिया जाता है। टर्की में भारत की तरह डोडे से पोस्तादाना भी निकालते हैं।

अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेंजामिन और उनकी पत्नी केटरिना पांच दिनों के लिए मंदसौर पहुंचे।रविवार को पुलिस कंट्रोल रुम पर एसपी मनोजसिंह की मौजूदगी में परिचर्चा के दौरान भारत दौरे को लेकर अपनी बात कही। प्रोफेसर बेंजामिन पूरी दुनिया के अलग-अलग देशों में घुम रहे है और अफीम पर शोध कर रहे है।

भारत में मंदसौर जिले में अफीम उत्पादन की जानकारी मिलने पर उन्होंने यहां आने का मन बनाया और यहां पहुंचे। आगामी दिनों में वह अफीम फैक्ट्री जाएंगे और अफीम उत्पादन करने वाले प्रमुख गांवों में पहुंचकर इस फसल से जुड़ी जानकारी एकत्रित करेंगे। उनके साथ पहुंची पत्नी भी अपने शोध से जुड़ी जानकारियां एकत्रित कर रही है। वह नदियां पर दुनिया भर शोध कर रही है।चर्चा के दौरान उन्होंने अलग-अलग देशों में अफीम उत्पादन और नदियों और भारत में इनकी स्थितियेंा के बारें में चर्चाकी। एक घंटे से अधिक समय तक चले चर्चा के इस दौर में अफीम से जुड़े कईमामलों पर दुनियाभर के कई देशों के बारें में जानकारी बताई। इस दौरान एएसपी सुंदरसिंह कनेश, सीएसपी राकेशमोहन शुक्ल, टीआई विनोद कुशवाह सहित अन्य मौजूद थे।

आस्ट्रेलिया से लेकर मेक्सिको सहित अमेरिया, अफगानिस्तान सहित अन्य देश जहां पर अफीम की खेती होती है। वहां के अलग प्रकारों और इससे वहां होने वाले लाभ-हानि के बारें में उन्होंने बताया। उनका कहना था कि आस्ट्रेलिया में अफीम उत्पादन का काम बड़ी कंपनिया और वहां की मेकनिकल टीमें करती है। जो दवा कंपनियां करती है और इसका उपयोग वह दवाईयों में करते है, जबकि मालवा में यह काम किसान करते है और पट्टें पर आधारित करते है। ऐसे में यहां किसानों को इससे ज्यादा लाभ नहीं है। इंडिया का अफीम अब वल्र्डलेवल पर अन्य देश नहीं खरीदते है। पहले 40 प्रतिशत तक अफीम की खरीदी विश्व के दूसरे देशों में भारत से होती थी, लेकिन अब भारत से खरीदी जाने वाली अफीम की मात्रा सिर्फ५ प्रतिशत रह गई है।
अमेरिया में गांजा बड़ा अपराध नहीं है। गांजा अपराध की श्रेणी में नहीं होगा तो लोग इस नशे के आदि हो जाएंगे। इस पर उनका कहना था कि अपराध की श्रेणी में लाकर इसमें लोगों को पकडऩा उन्हें जेलों में रखने से लेकर उन पर होने वाले खर्चसे कम रुपयों में लोगों को इस नशे से दूर करने काम किया जा सकता है। वल्र्ड में कईदेश लोगों को इस अपराध में लाने की बजाए उसे इस नशे से दूर ले जाने पर काम कर रहे है। पहले भारत का 50 प्रतिशत अफीम चायना में जाता था, अब नहीं।उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अफीम की खेती यहां बंद होकर किसान वह खेती करे, जिससे उन्हें बड़ा मुनाफा मिले तो भी कोई बुराई नहीं है।

मसाला और औषधीय उत्पादित फसलों से इससे ज्यादा लाभ किसानों को यहां मिल सकता है। इसके अलावा अफीम यहां एक राजनीतिक मुद्दा होने के साथ अफीम से जुड़े विभिन्न मामलों और अलग-अलग देश में अफीम के बारें में अलग जानकारियां भी उन्होंने यहां साझा करते हुए यहां के बारें में जानकारी ली।अब आगामी दिनों में भी वह यहीं रहेंगे और गांवों में अफीम किसानों के बीच पहुंचकर इसके बारें में जानकारी हासिल करेंगे तो अफीम फैक्ट्री भी जाएंगे। इसके साथ ही पत्नी केटरिना ने भी बताया कि किस प्रकार नदियों को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। अन्य देशों में नदियों का प्रदूषण नहीं होता हैऔर यहां होता है। इसे कैसे दूर किया जा सकता है। नदियों को लेकर अन्य देशों और भारत में नदियों की स्थितियों पर किए गए शोध के बारें में भी उन्होंने यहां चर्चा की।

 

विश्व में भारत का हिस्सा था 40 प्रश, अब पांच प्रश पर आया
कंट्रोल रूप पर प्रोफेसर गेल के साथ ही एसपी मनोज कुमार सिंह ने भी बताया कि अब अमेरिका ने भी भारत से अफीम मंगाना बंद कर दिया है। इसका कारण भारत की अफीम में मार्फिन का प्रश कम होना है। 1980 के आसपास पूरे विश्व में अफीम उत्पादन में भारत का हिस्सा 40 प्रश था, जो अब घटकर 4-5 प्रश हो गया है। अमेरिका सहित कई देशों ने भारत से अफीम मंगाना बंद कर दिया है।

 

अंग्रेज कई प्रदेशों में उगाते थे अफीम
प्रोफेसर गेल को एसपी सिंह ने यह भी जानकारी दी कि अंग्रेज शासनकाल के दौरान देश के कई हिस्सों पं. बंगाल, बिहार, उड़ीसा व उप्र में भी काफी मात्रा में अफीम उत्पादन किया जाता था, पर धीरे-धीरे यह बंद हो गया। अब कुछ जिलों में यह सिमटकर रह गया है। अब अफीम उत्पादन मप्र में मंदसौर,नीमच, राजस्थान के चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, झालावाड़, कोटा व उप्र के गाजीपुर जिले में हो रहा है।

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