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धर्मराजेश्वर स्थित 1100 साल पुरानी खेजड़िया भूप की बौद्धकालीन गुफा में रिपेयरिंग कार्य शुरू

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शामगढ़ तहसील धर्मराजेश्वर के कारण प्रसिद्ध है। उसी तरह अब सुवासरा तहसील को भी प्रसिद्धि मिलने वाली है। यहां भी धर्मराजेश्वर की तरह की 1100 साल पुरानी बौद्धकालीन गुफाएं हैं। इन पर गुप्तकाल की छाप भी देखी जा सकती है। यहां राज्य पुरातत्व विभाग इन गुफाओं में आई दरारों को भरने और सफाई करने में जुटा है।

अब तक इस मामले में प्राथमिकता से धर्मराजेश्वर का ही नाम लिया जाता था। इसके बाद गरोठ तहसील के ही पोलाडूंगर की भी ख्याति थी। खेजड़िया भूप को भी पुरातत्व विभाग ऐसी ही ख्याति दिलाने के लिए काम कर रहा है। विभाग ने इसके लिए 20 लाख रुपए से अधिक खर्च करने का निर्णय लिया है। हालांकि इस राशि में सिर्फ मरम्मत ही हो सकेगी। इसके अलावा यहां सफाई भी की जा रही है। छह महीने में विभाग इस काम को पूरा कर देगा। साथ ही इसके प्रचार की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाएगा ताकि धर्मराजेश्वर की तरह ही व्यापक प्रसिद्धि मिले और लोगों का आवागमन यहां बढ़े।

धर्मराजेश्वर में भी की मरम्मत
धर्म राजेश्वर में भी गुफाओं की मरम्मत की जा चुकी है। यहां पांच साल से यह प्रयास जारी है। कुछ काम तो अभी भी जारी है। यहां काम केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने किया है। इसके चलते यहां काफी डेवलपमेंट हुआ है और अब हालात यह है कि यहां पर्यटन विभाग ने भी काफी व्यवस्थाएं जुटा ली हैं। इससे पर्यटकों की संख्या में भी बढ़ाेतरी हुई है।

खेजड़िया भूप सुवासरा से 12 किलोमीटर दूर राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसा है। इस गांव के जंगल में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा एक ही पत्थर को काटकर गुफाएं बनाई गई हैं। पुरातत्व विद् इसमें गुप्तकाल की कलाकृतियां भी होना बता रहे हैं। ये गुफाएं अर्धवृत्ताकार पहाड़ी हैं। यहां 28 गुफाएं हैं। इनमें लघु कक्ष, एकल कक्ष बरामदे के रूप में कुछ परस्पर गुफाएं भी हैं। यहां 10 बड़ी गुफाएं तथा एक स्तूप बना है।

यह हो रहा है काम
राज्य पुरातत्व विभाग के माध्यम से यहां मरम्मत करवाई जा रहा है। गुफाओं में दरारें आ गई हैं। इन पर यहीं के पत्थर और चूने को मिलाकर इन दरारों को भरा जा रहा है ताकि इनका प्राकृतिक रूप भी बरकरार रहे और इन्हें नुकसान भी ना हो। पुरातत्व संग्रहालय के प्रबंधक जेसी शर्मा ने बताया इस तरह से इन गुफाओं पर किसी प्रकार का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

धार्मिक आयोजन पर आते लोग
अभी केवल धार्मिक आयोजन जैसे शिवरात्रि, हरियाली अमावस्या पर ही श्रद्धालु आते हैं कालांतर में यहां शैव धर्म का प्रचलन बढ़ा और लोगों ने इसे भगवान शिव का मंदिर मान लिया। इस आधार पर यहां शिव भक्तों का हुजूम लगा रहता है। यहां बुद्धिष्ट सर्किट स्थापित होने के बाद यहां करीब पांच सौ पर्यटक रोज आने की संभावना है क्योंकि इसी तहसील में बसई में बुद्धिष्ट सर्किट में जिले के शामिल होने के बाद पर्यटकों के लिए एक सर्वसुविधायुक्त मोटल तैयार किया जा रहा है। इससे पर्यटकों के आने की संभावना बढ़ जाती है।

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