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SC के फैसले के बावजूद फिल्म पद्मावत का ये हिंसक विरोध लोकतंत्र पर हमला है… !

Story Highlights

  • निश्चित रूप से पद्मावत फिल्म सिर्फ आत्मसम्मान से नहीं जुड़ी हुई है। दरअसल लोकतंत्र के अनगिनत फायदों के साथ जो कुछ सबसे बड़े नुकसान जुड़े है उनमें तुष्टिकरण भी एक है। सरकारें अपना राजनीतिक हित और वोटबैंक साधने के लिए ऐसी चीजों को बढ़ने देती हैं जो धीरे-धीरे व्यापक स्तर पर फैल जाती हैं। छोटे संगठन जिनकी पूरी वकत बहुत छोटे स्तर तक सीमित होती है उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बहस का हिस्सा बना दिया जाता है। पद्मावत के साथ भी यही किया जा रहा है।

किसी को कोई हक नहीं है कि वह मानवीय सभ्यता की विनाश-गाथा कानूनी व्यवस्था को ताक पर रखकर लिखे

हंगामा मचा रहे कौन हैं ये लोग? इनके पास इतना वक्त क्यों और कैसे होता है? कहीं भी हिंसा या विरोध भड़कता है तो ऐसे लोग कहां से निकल आते हैं?

मंदसौर। ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रख कर बताना की सवाल पद्मावत का नहीं, संविधान से अदावत का है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद फिल्म की रिलीज पर प्रहार संवैधानिक प्रावधानों व कानून का शासन स्थापित रहने की प्रक्रिया की सीधी अवमानना, अपमान है। साथ ही कानून व्यवस्था के प्रबंधन में चूक करके कई असामाजिक संगठनों को हिंसा करने देने के राज्य सरकारों के फैसले से ऐसा लगता है जैसे सब कुछ प्रायोजित है। किसी खास बिरादरी के आडंबर को संरक्षण देने की आड़ में राज्य सरकारों द्वारा राजधर्म के अनुपालन में चूक करना संविधान की मर्यादाओं का हनन करने जैसा है। हिंसा के तांडव पर अपनाई जा रही यह चुप्पी देश के लोकतंत्र व अर्थतंत्र—दोनों के लिए खतरा है।

आज के इस बंद से नुकसान किसका हुआ है हमारे व्यापारी बंधुओं का और देश का हुआ क्या इससे फिल्म निर्माता का कोई नुकसान हुआ है क्या? नहीं फिल्म निर्माता ने तो पुरी फिल्म का बीमा करा रखा है तो हम नुकसान किसका कर रहे है अपने भाईयों का ही और जब मन्दसौर शहर व मध्य प्रदेश में फिल्म का प्रदर्शन ही नहीं हो रहा है तो इस बंद का कहा ओचित्य रह जाता है क्या केवल यह एक शक्ति प्रदर्शन है क्या? इसी प्रकार अगर चलता रहा तो हर समाज वर्ग कल अपनी बात के लिए आंदोलन करेगा और बंद की मांग करेगा मन्दसौर शहर वैसे भी इस महिने मे 3 बंद झेल चुका हैं। क्या मन्दसौर में व्यापार करना अब गुनाह हो गया है? सरकार को इस प्रकार होने वाले अस्विक्रत बंद के लिए कोई कानुन लाना चाहिए। सभी यह सोच रहे है कि जो बन्द हुआ वो सफल रहा लेकिन सभी ने डर के कारण बंद किया है कि काई हानि ना हो ना कि समर्थन में बंद हुआ है। इस और भी बंद करने वालो को सौचना चाहिए। हम एक दूसरे को इस प्रकार के बंद से क्या संदेश दे रहे है दिल में बडे सवाल खड़े करता है……..?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भीड़तंत्र ने मानो अगवा कर लिया है। यह परिपाटी काफी खतरनाक है जिसका सीधा असर लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। संवैधानिक आस्था का अंर्तग्रहण अबाध्य है जिसको हमें अपने विचारों में आत्मसात करना होगा। इन खबरों के वैश्विक प्रसार से देश की आर्थिक छवि को भी धक्का लगेगा और विदेशी निवेश सीधा प्रभावित होगा। ऐसे में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कानून व्यवस्था का अनुपालन सख्ती से सुनिश्चित करना चाहिए ताकि कुछ मुट्ठी भर छुटभैये लोगों के हाथों संवैधानिक व्यवस्था गिरवी न हो जाए और भारत के प्रत्येक नागरिकों का मौलिक व मानव अधिकार संरक्षित रहे। बजाए इसके सरकार एक तमाशबीन बन गई है।

पद्मावत रिलीज हो चुकी है और हल्ला मचाने वाले हल्ला मचा रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान, यूपी, गुजरात, जम्मू हर जगह जितनी अराजकता फैल गई है, उस पर गुस्सा आता है। जो धमकी महीनों से दी जा रही थी, सरकार उससे निबटने के लिए तैयार नहीं हो पाई। इसके बाद इन गुंडों ने गाड़ियां जलाने, मॉल्स पर पथराव करने के साथ-साथ बच्चों की स्कूल बस पर हमला कर दिया। बच्चों पर हमले से घटिया बात और क्या हो सकती है?

महज एक फिल्म को लेकर देश में जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसे देखकर खून खौल उठता है। विरोध कर रहे इन बेवकूफ अंधे लोगों से बस यही सवाल है- क्या उन्होंने फिल्म देखी है और क्या उन्होंने सड़कों पर हंगामा मचाने से पहले इतिहास पढ़ने की जहमत उठाई है?

नहीं, इनमें से 99% को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि फिल्म में क्या दिखाया गया है क्या नहीं। न ही इनका इतिहास से कोई लेना-देना है। इन्हें बस दंगा फैलाने, तोड़-फोड़ करने और लोगों में डर पैदा करने में मजा आता है क्योंकि ये कई आंदोलनकारी नहीं हैं, ये गुंडे हैं, मौकापरस्त बेगैरत लोग हैं। इनसे किसी तरह की समझदारी की उम्मीद करना बेमानी है।

रानी पद्मावती की ऐतिहासिकता पर किसी भी इतिहासकार की मुहर नहीं है। मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत के अलावा इसका विवरण भी कहीं खोजे नहीं मिलता है। हां यह जरूर है कि राजस्थान के कई इलाकों में रानी पद्मावती के कैरेक्टर को लोग आदर्श के तौर पर देखते हैं।

इन इलाकों में उन्हें बेहद सम्मान के साथ जोड़कर देखा जाता है। और इसी वजह से जैसे ही करणी सेना जैसे संगठन को पता चला कि रानी पद्मावती पर कोई फिल्म बनाई जा रही है तो फिल्म की शूटिंग के दौरान तोड़-फोड़ की गई फिर बाद में जब रिलीज की बारी आई तो महीनों से देशव्यापी विवाद चल रहा है।

अब इसमें सबसे दिलचस्प बात ये है कि विरोधकर्ताओं में से किसी ने फिल्म देखी नहीं है। लेकिन उन्हें पता है कि रानी के साथ फिल्म में अन्याय किया गया है! आखिर ये कैसी सोच है! जब फिल्म का डायरेक्टर इस बात की जिम्मेदारी ले रहा है तो आप किस पर भरोसा करेंगे? इसके अलावा फिल्म के ट्रेलर में जो राजूपतों की शान में कसीदे पढ़े गए हैं क्या वो विरोधकर्ताओं को झूठे लगते हैं। उस पर भी इनका कोई भरोसा नहीं है?

फिल्मों के लिए हमारे पास फिल्म प्रमाणन बोर्ड है लेकिन पद्मावती विवाद में ये संस्था बिल्कुल औचित्यहीन खड़ी है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया जिसमें उसने सभी राज्यों में बैन को खारिज कर दिया। लेकिन जैसे ही निर्णय आया उसके बिहार में एक सिनेमाघर में तोड़-फोड़ शुरू हो गई। तो क्या माना जाए एक फिल्म के मसले पर हमारे देश की संवैधानिक संस्था का कोई सम्मान रह गया है? कोई छोटा सा संगठन सेंसर बोर्ड और सुप्रीम कोर्ट से ऊपर हो गया? क्या हमारी सरकारों के लिए भी तय करने का समय नहीं है कि करणी सेना जैसे संगठनों के उत्पात को कैसे रोका जाए। वरना धीरे-धीरे हमारे लिए कला की स्वतंत्रता सिर्फ किताबों में पढ़ने की बात बनकर रह जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा की अभिवव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपने कई पूर्व में दिए गए फैसलों में स्पष्ट कहा है कि वैचारिक अतिरेकता और विरोधात्मक स्वर हिंसा का सहारा लेकर कलात्मक रचना का गला नहीं घोंट सकते। देश की सबसे बड़ी अदालत ने हमेशा से यह भी कहा है कि संवैधानिक दायरे में परिभाषित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पवित्रता और रक्षणियता सर्वोच्च है। हम किसी तुगलकी काल में नहीं जी रहे हैं। मानव सभ्यता के सबसे खूबसूरत क्षणों में हम इस समय जी रहे हैं जहां समरसता और सद्भावना जरूरी है। किसी बात पर असहमति महज होने से किसी सृजन की गर्भ में हत्या नहीं की जा सकती। यह पाप है। इसका विरोध या इस पर प्रतिबंध संवैधानिक और कानूनी दायरों में ही हो सकता है।

किसी को कोई हक नहीं है कि वह मानवीय सभ्यता की विनाश-गाथा कानूनी व्यवस्था को ताक पर रखकर लिखे। ऐसा होने से समाज में अराजकता और कानूनहीनता की स्थिति बनेगी जिसे संभालना असंभव हो जाएगा और कानूनी व्यवस्था के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था भी चौराहे पर खड़ी मिलेगी।

कल हमको गणतन्त्र दिवस मनाना है ओर आज हम गणतन्त्र की धज्जिया उड़ा रहे है। आज उसी लोकतन्त्र की आन बान ओर शान के लिए एकता ओर अखंडता का दिखावा करेंगे!

 

कहीं-कहीं तो तलवार के साथ तिरंगा भी लहराया गया है। शर्म करो! जिस आन-बान-शान की बात तुम कर रहे हो, उसे तो तुमने पहले ही नीलाम कर दिया। जिस हाथ में अराजकता की तलवार हो, उसे तिरंगा पकड़ने का कोई हक नहीं है।

एक लोकतांत्रिक विरोध पदर्शन के तरीके को `बंद’ का नाम दिया गया है। `बंद’ का अर्थ यह होता है कि यदि किसी शासकीय व्यवस्था के विरुद्ध किसी संगठन द्वारा `बंद’ का आह्वान किया गया है तथा जनता उस `बंद’ के आह्वान को अपना समर्थन दे रही है तो वह स्वेच्छा से अपनी दुकान, व्यापारिक पतिष्ठान, उद्योग, व्यापार, शिक्षा आदि को विरोध स्वरूप `बंद’ कर उस संगठन द्वारा आहूत `बंद’ में शामिल होकर व्यवस्था का विरोध करने वालों में स्वयं को भी सम्मिलित कर सकती है। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि आज तमाम संगठनों द्वारा समय समय पर उन गांधी वादी तरीकों का प्रयोग तो जरूर किया जाता है परन्तु वास्तव में उनमें अहिंसा के स्थान पर हिंसा तथा स्वेच्छा की जगह अनिच्छा व लोकतांत्रिक तौर तरीकों के इस्तेमाल के बजाए पूर्णतया जोर-जबरदस्ती व धक्के शाही वाले तरीकों का प्रयोग होता दिखाई देता है।

  • ब्रजेश आर्य 

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